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राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद में जबरदस्त घोटाला हुआ है। भला उस प्रधानमंत्री के राज में घोटाला कभी हो सकता है, जो न खाता हो, न खाने देता हो, सिर्फ़ योगा करता हो और करने देता हो! आप इसे बिगाड़ कर कहना चाहें तो कह सकते हैं, जो केवल-मात्र योगा को भोगा करता है, करवाता है। ऐसे ‘परम ईमानदार’ नेता की सरकार में – जिसकी पार्टी का अध्यक्ष उससे भी ज्यादा ईमानदार हो – घोटाला! छि: कितनी बदबू आ रही है, ये बात सुनकर भी! अरे राम मेरी तो नाक ही सड़ जाएगी इस बदबू से, कोई बचाओ मुझे! ऐसी गंदी बात आगे से मत करना मेरे सामने और करना हो तो मुझे पहले बता देना ताकि मैं यहां से चला जाऊं

पिछले सत्तर साल में आई है कभी ऐसी ईमानदारों की सिरमौर सरकार? फिर भी कहते हो, हर विमान पर एक हजार करोड़ का घोटाला हुआ है?

चलो मानने के लिए यह भी मान लेते हैं कि घोटाला हुआ! कितने का हुआ? 35000 करोड़ का हुआ!आप कहते हो, मोदीजी ने किया। मोदी जी कौन हैं? किसी ग्राम पंचायत के सदस्य हैं क्या? सरपंच हैं क्या? किसी नगरपालिका के अध्यक्ष, किसी नगरनिगम के महापौर हैं क्या? पुलिस चौकी के इंचार्ज हैं क्या? किसी विभाग के क्लर्क या सेक्शन आफिसर हैं क्या? बीडीओ, डिप्टी कलेक्टर, कलेक्टर, मंत्री-मुख्यमंत्री हैं क्या? क्या हैं देश के – प्रधानमंत्री हैं न! कोई छोटे-मोटे लल्लू टाइप पद पर तो नहीं हैं न! अब आए न लाइन पर। इतनी बड़ी हैसियत के इतने बड़े आदमी, जिनका कुछ पता नहीं, कब देश में रहते हैं, कब विदेश में –  क्या करोड़-दस करोड़-हजार करोड़ का घोटाला करेंगे? पद की गरिमा भी कोई चीज होती है या नहीं होती? होती है न! तब! मोदीजी ने एक बार भी – अपने वचनों से ही सही – पद की गरिमा गिरने दी है कभी? आप ऐसा कल्पना भी कर सकते हो कभी।

भाइयों-बहनों, गरीब मां के इस बेटे ने, इस चायवाले ने ऐसा किया कभी? वह  ऐसा कर सकते हैंं कभी? उनका खुला चैलेंज है कि कोई माई का लाल उनका एक भी भाषण दिखा दे, जिसमें एक भी शब्द पद की गरिमा के प्रतिकूल हो। उन्होंने एक भी काम किया हो कभी, कर्म से ही नहीं  बल्कि अपने वचनों से भी, जो पद की गरिमा को गिराता हो। विपक्ष एक भी उदाहरण दे दे, एक भी, तो अभी और यहीं भारत मां का यह लाल, यह लाड़ला, यह सपूत, यह भगत सिंह, यह चंद्रशेखर आजाद, अभी और यहीं फांसी पर चढ़ जाएगा। फंदा तैयार रखना रे भाइयों-बहनों। यह बात मैं उनकी तरफ से उनकी उपस्थिति में कह रहा हूं भाइयों-बहनों। उन्हें पुराना एक्सपीरियंस है फांसी के फंदे पर चढ़ने का। नोटबंदी के समय भी चढ़े थे या नहीं चढ़े थे? खुलेआम चढ़े थे कि छुपकर चढ़े थे? हुआ उनका एक भी बाल बांका और जो बाल पहले से आके-बांके थे, उनमें से एक भी सीधा हुआ? कोई चाहे तो पास आकर दूर से देख ले। उनकी चिंता करने की किसी को कोई जरूरत नहीं। वह स्वयं सक्षम है।

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