बीजेपी क्यों डरी हुई है उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर?

Uttar Pradesh Assembly 2022

2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अधिक समय नहीं बचा है। लेकिन तमाम राजनीतिक पार्टियां अपनी रणनीतियां बनाने में जुट चुकी हैं। जहां एक ओर विपक्षी पार्टियां, मुख्य रूप से कांग्रेस उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था को और बेरोजगारी के साथ संविदा कर्मियों की मांगों को मुद्दा बना रही है।‌‌

वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी तथा बीजेपी जिन्ना के जिनके सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश में लगी हुई है। इसके साथ ही बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती पिछले 5 सालों में किसी भी मुद्दे पर या फिर 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद देश के किसी भी मुद्दे पर सड़कों पर उतर कर जनता के लिए संघर्ष करती हुई नजर नहीं आई है। लेकिन वह भी 2022 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के दावे कर रही है।

महामारी के दौर में उत्तर प्रदेश की चरमराई हुई स्वास्थ्य व्यवस्था को कौन भूल सकता है? ऑक्सीजन के सिलेंडर की लिए लंबी-लंबी लाइनों में तड़पते लोगों की चीखें कौन भूल सकता है? महामारी के दौर में लाचार अस्पतालों की व्यवस्था को कौन भूल सकता है और उसके ऊपर से ऑक्सीजन की कमी की पोल खोलने वाले लोगों और अस्पतालों को एफआईआर की दी जा रही सरकारी धमकियों को क्या कोई भूल सकता है?

जिस समय लोग अपनी जरूरतों के लिए दर-दर भटक रहे थे, अपनों की जान बचाने के लिए लोगों के आगे हाथ फैला रहे थे, उस वक्त उत्तर प्रदेश की योगी सरकार खुद की छवि बचाने के लिए जनता के टैक्स के पैसे से अपना प्रचार करवा रही थी। बड़े-बड़े होर्डिंग में खुद को नंबर वन बता रही थी और अब उन्हीं दावों के सहारे 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ने की बारी आई तो योगी सरकार हिंदू-मुसलमान, तालिबान, पाकिस्तान तथा जिन्नाह के मुद्दे पर फिर से लौट आई।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद “अब्बा जान” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके चुनावों को धार्मिक एंगल देने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बयान के सहारे बीजेपी जनता के जरूरी मुद्दों को पीछे धकेल कर जिन्ना के नाम पर और हिंदू-मुसलमान के नाम पर उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ने की कोशिश कर रही है।

बीजेपी जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ने की कोशिश कर रही है, उससे साफ होता है कि उसे उत्तर प्रदेश में अपने काम पर भरोसा नहीं है या फिर शायद उन्होंने ऐसा कोई काम जनता के लिए किया ही नहीं है जिस पर जनता उन्हें वोट दें। जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश का विधान सभा चुनाव नजदीक आएगा बीजेपी के नेताओं की तरफ से धार्मिक बयानबाजी भी तेज होगी।

अब जनता को निर्णय लेना होगा कि क्या वह धर्म जाति के नाम पर ही वोट करेगी फिर से या फिर काम के आधार पर उन पार्टियों को मौका देगी जो जनता के मुद्दों को उठाते हैं और जनता की लड़ाई लड़ते हैं।

प्रियंका गांधी

एक तरफ बीजेपी है जो जनता के बीच धार्मिक बंटवारा कर के चुनावी लाभ लेने की कोशिश कर रही है। तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी है जो अपनी पिछली सरकारों में किए गए काम के नाम पर वोट लेने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस भी लगातार जनता की लड़ाई लड़ रही है। कांग्रेस हर उस मजलूम की लड़ाई लड़ रही है जिस पर सरकारी अत्याचार हो रहा है। चाहे वह किसी भी धर्म जाति का हो।

इस वक्त बीजेपी को खतरा समाजवादी पार्टी से नहीं है, क्योंकि बीजेपी को पता है कि धार्मिक एंगल के सहारे वह समाजवादी पार्टी को आसानी से चुनावी मात देने में कामयाब हो जाएगी। बीजेपी को मुख्य खतरा प्रियंका गांधी से दिखाई दे रहा है। क्योंकि प्रियंका गांधी लगातार सड़कों पर जनता के लिए संघर्ष करती हुई दिखाई दे रही है। प्रियंका गांधी लगातार उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था की पोल खोल रही है। प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में इस वक्त बीजेपी को बड़ी चुनौती देती हुई नजर आ रही हैं।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का कोई खास जनाधार नहीं था लेकिन प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस में एक तरह से जान फूंक दी है और महिलाओं में प्रियंका गांधी की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है, इस बात की चिंता है बीजेपी के नेतृत्व को लगातार सता रही है। क्योंकि प्रियंका गांधी उस मुद्दे को हवा दे रही हैं जो बीजेपी की दुखती रग हुआ करती थी। उत्तर प्रदेश में महिलाओं पर अत्याचार लंबे समय से हो रहा है। प्रियंका गांधी उसे भी मुद्दा बनाने में जुटी हुई है। जो बीजेपी के लिए चिंता का सबब है।

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