
आर्थिक मोर्चे पर मुँह चुराने वाली भाजपा सरकार को आर्थिक मोर्चे पर ही एक के बाद एक झटका लग रहा है। पहले ही देश मे लगतार बन्द होते उद्योग और संस्थाओं से सरकार परेशान थी क्योंकि इससे बेरोजगारी के आंकड़ो में लगातार वृद्धि हो रही है। अब सरकार को तब झटका लग जब GDP अपने निचले स्तर 5% पर पहुंच गया।
5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की बात करने वाली मोदी सरकार के लिए एक और निराश करने वाला आंकड़ा सामने आया है। पहली तिमाही (Q1) में जीडीपी 5.8 फीसदी से घटकर 5% रह गई है। मतलब इस सेक्टर में कुल 0.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है जो कि पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। मंदी की आशंका से जूझ रही अर्थव्यवस्था को इससे तगड़ा झटका लगा है। संभावना व्यक्त की जा रही थी कि ये आंकड़ा 5.3 से 5.6 फीसदी तक रह सकता है। पिछले साल इसी तिमाही में जीडीपी 8 फीसदी थी जो गिरकर 5 फीसदी रह गई है। कृषि, निर्माण और मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में खराब प्रदर्शन इस जीडीपी मे गिरावट की बड़ी वजह माना जा रहा है।
वित्त वर्ष 2019 की अंतिम तिमाही में यह 5.8 फीसद थी
सेंट्रल स्टैटिसटिक्स ऑफिस (CSO) ने शुक्रवार को वित्त वर्ष 2019-20 की अप्रैल-जून की तिमाही के लिए देश की आर्थिक वृद्धि के आंकड़े जारी किए।
इसके अनुसार, पहली तिमाही में GDP ग्रोथ घटकर 5 फीसद के स्तर पर आई है। वित्त वर्ष 2019 की अंतिम तिमाही में यह 5.8 फीसद थी। कई तरह के सर्वे में भी ऐसी ही संभावना व्यक्त की जा रही थी लेकिन जो आंकड़ें सामने आए हैं वो बहुत ही निराश करने वाले हैं। शायद सरकार को भी इस तरह के निराशाजनक आंकड़ों की आशंका नहीं थी।
ऑटो सेक्टर के हालात हुए बदतर
हालांकि सरकार ने खराब आर्थिक सेहत को ठीक करने के लिए पिछले दिनों कई उपायों की घोषणा की है हालांकि इसका असर अगली तिमाही तक ही दिखेगा। ऑटो सेक्टर में जो बदतर हालात हैं उनसे हर कोई वाकिफ है। कई ऑटो सेक्टर ने अपना प्रोडक्शन बंद कर दिया है और कई हजार नौकरियां भी चली गई हैं। कई अन्य सेक्टर में भी डिमांड की भारी कमी होने के चलते मार्केट में सुस्ती बनी हुई है। रिएलिटी सेक्टर में तो कई सालों से मंदी छाई हुई है।
बजट के प्रावधानों की घोषणा के बाद से शेयर बाजार में भी जो निराशा का माहौल
बजट के प्रावधानों की घोषणा के बाद से शेयर बाजार में भी जो निराशा का माहौल बना हुआ है। उससे वो अभी तक उबर नहीं पाया है। हालांकि वित्त मंत्री ने पिछले दिनों कई तरह की राहत और छूट की घोषणा की है और आरबीआई ने भी सरकार को 1.76 लाख करोड़ अपने रिजर्व से दिए हैं। बावजूद इसके अभी तक कोई सकारात्मक संदेश बाजार में अब तक दिखाई नहीं दिया है।
किसी बड़े आर्थिक मामलों के जानकार का सरकार में ना होना और सरकार द्वारा आर्थिक मामलों के जानकारों से मतभेद की स्थिति बनाए रखना कही ना कही सरकार के लिए मुश्किल खड़े कर रही है। आर्थीक मोर्चे पर सरकार की इस विफलता का खामियाजा देश की जनता को भुगतना पड़ रहा है।

































































