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क्या एमपी में गरीब के घर पैदा होना हुआ गुनाह?छिंदवाड़ा, इंदौर और बालाघाट के बाद अब रीवा में बच्चों की मौत का मातम

कटघरे में एमपी का स्वास्थ्य विभाग, स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग ने पकड़ा जोर

भोपाल। मध्य प्रदेश में बच्चों की मौत के मामले लगातार सरकार और स्वास्थ्य विभाग के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। छिंदवाड़ा, इंदौर और बालाघाट के बाद अब रीवा में जच्चा-बच्चा की मौत ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक के बाद एक सामने आ रही इन घटनाओं से स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है। तो, बच्चों की लगातार मौतों के कारण प्रदेश में स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग ने जोर पकड़ लिया है।

दरअसल, रीवा के गांधी मेमोरियल अस्पताल में डिलीवरी के दौरान महिला कल्पना मिश्रा और उसके नवजात की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही के आरोप लगाए। मामले में अधीक्षक और नर्सिंग स्टाफ पर कार्रवाई की गई है। हालांकि, कार्रवाई के बावजूद सवाल यह है कि आखिर अस्पताल में ऐसी स्थिति क्यों बनी और क्या सिर्फ कर्मचारियों पर कार्रवाई करने से स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियां दूर हो जाएंगी? ये कोई पहला मामला नहीं है जब लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते किसी मासूम की जान चली गई हो। इससे पहले छिंदवाड़ा, इंदौर और बालाघाट की घटनाओं ने भी आत्मा को झंझोर कर रख दिया था। सवाल सिर्फ एक है कि, क्या मप्र में गरीब के घर में पैदा होना गुनाह है ?

क्या कहती है भारत सरकार की रिपोर्ट

भारत सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024 के रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में जन्म लेने वाले 1 हजार बच्चों में 35 बच्चे अपना पहला जन्मदिन ही नहीं मना पाते। शिशु मृत्यु दर के मामले में मध्य प्रदेश देश में दूसरे स्थान पर हैं। जहां नवजात बच्चों की सबसे ज्यादा मौत होती है। मध्य प्रदेश में 28 बच्चों की मौत शुरूआत के 28 दिनों के अंदर ही हो जाती है। हालांकि पिछले 5 सालों में इन आंकड़ों में 11 अंकों का सुधार हुआ है, लेकिन इसके बाद भी मध्य प्रदेश राष्ट्रीय औसत से 11 अंक पीछे हैं।

छिंदवाड़ा, इंदौर, सतना और बालाघाट में बच्चों की मौत ने मचाया हड़कंप

इससे पहले बालाघाट में बैगा समाज के 26 आदिवासी बच्चों की मौत ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया था। बच्चों की मौत के बाद कांग्रेस ने सरकार और स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। हालांकि, मामले में सरकार ने छूटपुट कार्यवाही कर इतिश्री कर ली थी।

इंदौर में 2 मासूमों की चूहों के कुतरने से मौत के मामले ने भी सरकार को कटघरे में खड़ा किया था। प्रदेश के बड़े मेडिकल हब में शामिल इंदौर में ऐसी घटनाओं को लेकर अस्पतालों की व्यवस्थाओं और स्वास्थ्य विभाग की मॉनिटरिंग पर सवाल उठे। सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत में गरीब परिवारों को इलाज के लिए परेशान होना पड़ता है। अगर बड़े शहरों के अस्पतालों में भी मरीजों की सुरक्षा और इलाज को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो दूरदराज के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

छिंदवाड़ा में नकली सिरप से बच्चों की मौत का मामला भी पहले काफी विवादों में रहा था। घटना के बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं और इलाज को लेकर सवाल उठे थे। विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधते हुए स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए थे। अब रीवा की घटना के बाद विपक्ष इन तमाम मामलों को जोड़कर सरकार से जवाब मांग रहा है।

सतना जिला अस्पताल में थैलेसीमिया से पीड़ित मासूम बच्चों को कथित तौर पर एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाने का गंभीर मामला सामने आया। मामला दिसंबर 2025 में सामने आया था, जहां जिला अस्पताल में थैलेसीमिया का इलाज करा रहे बच्चों को एचआईवी पॉजिटिव रक्त चढ़ाया गया था। इस लापरवाही के कारण कई मासूम बच्चे एचआईवी से संक्रमित हो गए। इन बच्चों को बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है।

एमपी के भविष्य की मौत का जिम्मेदार कौन?

प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में है। हर घटना के बाद जांच और कार्रवाई की बात होती है, लेकिन कुछ समय बाद फिर किसी दूसरे जिले से ऐसी ही घटना सामने आ जाती है। ऐसे में सरकार की मंशा पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं कि, आखिर इन घटनाओं की स्थायी रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? क्या स्वास्थ्य विभाग केवल घटना होने के बाद कार्रवाई करने तक सीमित है या अस्पतालों की नियमित मॉनिटरिंग और जवाबदेही की कोई मजबूत व्यवस्था भी है? लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद अब स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ रही है।

सरकार के दावों और जमीनी हकीकत में अंतर

सरकार की ओर से प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही है। जहां लगातार अलग-अलग जिलों से बच्चों की मौत की घटनाएं सामने आ रही हैं। जो सरकार के तमाम दावों की पोल खोल रही हैं। अगर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी मजबूत है, तो गरीब परिवारों को इलाज के दौरान बार-बार ऐसे दर्द से क्यों गुजरना पड़ रहा है?

सवाल सिर्फ कार्रवाई का नहीं, व्यवस्था बदलने का है

रीवा में अधीक्षक और नर्सिंग स्टाफ पर कार्रवाई हुई है, लेकिन सवाल यही है कि क्या इससे पूरी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? अस्पताल में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की उपलब्धता, इमरजेंसी व्यवस्था, दवाओं और जरूरी संसाधनों की उपलब्धता, मरीजों की निगरानी और इलाज में प्रोटोकॉल का पालन, इन सभी पहलुओं की जांच जरूरी है। क्योंकि अगर व्यवस्था में कमी है तो केवल एक कर्मचारी को जिम्मेदार ठहराने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

गरीब के बच्चे की जिंदगी की कीमत क्या कम है?

इन घटनाओं का सबसे बड़ा असर उन गरीब परिवारों पर पड़ता है, जिनके पास महंगे निजी अस्पतालों में इलाज कराने का विकल्प नहीं होता। उनके लिए सरकारी अस्पताल ही सबसे बड़ी उम्मीद हैं। ऐसे में जब सरकारी अस्पताल में ही इलाज के दौरान किसी बच्चे या जच्चा-बच्चा की मौत हो जाती है, तो परिवार सिर्फ अपने किसी सदस्य को नहीं खोता, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर उसका भरोसा भी टूटता है। यही वजह है कि अब लगातार सरकार से जवाबदेही की मांग की जा रही है।

स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग

बच्चों से जुड़े तमाम मामलों और स्वास्थ्य विभाग की लचर व्यवस्था के लिए विपक्ष ने मप्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल को जिम्मेदार बताया है। ऐसे में अखिल भारतीय आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया ने मप्र सरकार को पत्र लिखकर स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग की है।

छिंदवाड़ा, इंदौर, बालाघाट और अब रीवा… मौत की इन घटनाओं ने सवाल एक ही खड़ा किया है—क्या मध्य प्रदेश में गरीब के घर पैदा होना ही गुनाह है?

सरकार और स्वास्थ्य विभाग के सामने अब चुनौती सिर्फ इन मामलों में कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की है।

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