Saturday, September 12, 2026
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न्याय सत्याग्रह में सरकार पर जमकर गरजे डॉ. विक्रांत भरिया, एमपी में बीजेपी नहीं, तालिबानी राज

रीवा। बालाघाट में 30 आदिवासी बच्चों की मौत के मामले में सरकार की जवाबदेही तय करने और स्वास्थ्य मंत्री एवं उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला के इस्तीफे की मांग को लेकर रीवा में चल रहा अनिश्चितकालीन न्याय सत्याग्रह पांचवें दिन समाप्त हो गया। पांचवें दिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी धरना स्थल पहुंचे।

प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया को धरना स्थल से गिरफ्तार कर लिया। वहीं, प्रदर्शन कर रहे कांग्रेस नेताओं, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं पर वाटर कैनन और अश्रुगैस का इस्तेमाल किया गया।

‘एमपी में बीजेपी नहीं, तालिबान का राज’- भूरिया

कार्रवाई के बाद कांग्रेस ने सरकार पर तीखा हमला बोला। कांग्रेस की ओर से आरोप लगाया गया कि “मध्य प्रदेश में अब भाजपा का नहीं, तालिबान का राज चल रहा है।” कांग्रेस ने कहा कि पुलिस कार्रवाई से आंदोलन को दबाया नहीं जा सकता।

डॉ. विक्रांत भूरिया ने कहा कि राजेंद्र शुक्ला के इस्तीफे की मांग को लेकर संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि न्याय सत्याग्रह का यह अंत नहीं है और आंदोलन को अगले चरण में भोपाल ले जाया जाएगा।

भूरिया ने कहा कि “राजेंद्र शुक्ला, कान खोलकर सुन लो, हम आपकी पुलिस से डरने वाले नहीं हैं। जब तक आदिवासी बच्चों को न्याय नहीं मिलता, यह संघर्ष जारी रहेगा।”

उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव से सवाल करते हुए कहा कि जब प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं तो ऐसे व्यक्ति को स्वास्थ्य मंत्री क्यों बनाए रखा गया है। कांग्रेस ने राजेंद्र शुक्ला के इस्तीफे की मांग दोहराई।

भोपाल घेराव का ऐलान

डॉ. विक्रांत भूरिया ने कहा कि आंदोलन का अगला चरण भोपाल में होगा। कांग्रेस मुख्यमंत्री मोहन यादव का घेराव कर स्वास्थ्य व्यवस्था और बालाघाट में हुई मौतों को लेकर जवाब मांगेगी।

जीतू पटवारी ने भी मांगा स्वास्थ्य मंत्री का इस्तीफा

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल हो चुकी है। उन्होंने कहा कि आम नागरिक को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलना उसका मौलिक अधिकार है, लेकिन प्रदेश में लगातार स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी गंभीर घटनाएं सामने आ रही हैं।

पटवारी ने राजेंद्र शुक्ला से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की मांग की। साथ ही मुख्यमंत्री मोहन यादव से कहा कि अगर स्वास्थ्य मंत्री इस्तीफा नहीं देते हैं तो उन्हें बर्खास्त किया जाए।

कांग्रेस ने चेतावनी दी कि सरकार ने स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार नहीं किया तो यह मुद्दा आने वाले विधानसभा चुनाव में भी प्रमुखता से उठाया जाएगा।

सागर जहरीली शराबकांड पर उमंग सिंघार का सरकार पर हमला, बोले- ‘जिम्मेदार कौन, नेटवर्क किसके संरक्षण में?’

भोपाल। मध्यप्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब से हुई मौतों का मामला लगातार गरमाता जा रहा है। इस मामले को लेकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रदेश सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि सागर में हुई मौतों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है और जहरीली शराब की सप्लाई का नेटवर्क किसके संरक्षण में चल रहा था।

सिंघार ने दावा किया कि जहरीली शराब मध्यप्रदेश के बाहर से नहीं, बल्कि प्रदेश के अंदर से ही सागर पहुंची थी। उन्होंने यूपी से शराब आने की बात को गलत बताते हुए आरोप लगाया कि शराब धार से सागर तक पहुंची थी।

आबकारी विभाग और सागर एसपी पर उठाए सवाल

नेता प्रतिपक्ष ने शराबकांड में अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने आबकारी विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ सागर एसपी अनुराग सुजानिया को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। सिंघार का दावा है कि जिन-जिन स्थानों पर एसपी अनुराग सुजानिया की पोस्टिंग रही, वहां जहरीली शराब से जुड़े मामले सामने आए।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस के जिला संगठन ने पहले ही जहरीली शराब को लेकर शिकायत की थी, लेकिन शिकायत के बावजूद समय रहते कार्रवाई नहीं की गई। सिंघार ने सवाल किया कि आखिर मिथेनॉल डिस्टलरी तक कैसे पहुंचा और शराब में इसकी मिलावट कैसे हुई?

‘सागर गोल्ड को कुछ घंटों में क्लीन चिट कैसे?’

उमंग सिंघार ने रॉयल ब्रांड और सागर गोल्ड शराब को लेकर भी सरकार को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि मौतों के बाद कुछ ही घंटों में सागर गोल्ड को क्लीन चिट दे दी गई। सिंघार ने कहा कि पहले शराब पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी हुआ और बाद में उसे वापस ले लिया गया। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को सवालों के घेरे में बताया।

प्रह्लाद पटेल और उमा भारती पर भी साधा निशाना

सिंघार ने सागर शराबकांड को लेकर वीएचपी और आरएसएस के नेताओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने प्रह्लाद पटेल और उमा भारती का नाम लेते हुए कहा कि सागर में बड़ी संख्या में लोधी समाज के लोगों की मौत हुई है, लेकिन उनकी ओर से इस मामले में आवाज क्यों नहीं उठाई गई।

25 लाख रुपये मुआवजे की मांग

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि मृतकों के परिवारों को दिया जा रहा चार लाख रुपये का मुआवजा पर्याप्त नहीं है। उन्होंने प्रत्येक मृतक के परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की। साथ ही उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की।

हिंदू-मुस्लिम राजनीति का भी लगाया आरोप

उमंग सिंघार ने सरकार पर हिंदू-मुस्लिम राजनीति करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार मुसलमानों का डर दिखाकर हिंदुओं का वोट हासिल करना चाहती है। सिंघार ने इंदौर, छिंदवाड़ा, बालाघाट, मुरैना और अब सागर की घटनाओं का जिक्र करते हुए प्रदेश में हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े किए।

 

30 बैगा आदिवासियों की मौत के खिलाफ रीवा में अनिश्चितकालीन ‘न्याय सत्याग्रह’, स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग

रीवा। मध्यप्रदेश के बालाघाट में 30 बैगा आदिवासी बच्चों की मौत और रीवा में कल्पना मिश्रा की मौत को लेकर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसी के विरोध में आदिवासी कांग्रेस का अनिश्चितकालीन ‘न्याय सत्याग्रह’ दूसरे दिन भी जारी रहा। अग्रसेन चौक स्थित कमिश्नर कार्यालय के सामने चल रहे इस आंदोलन में स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग की जा रही है।

अखिल भारतीय आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया के नेतृत्व में चल रहे धरने में सोमवार को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, पूर्व नेता प्रतिपक्ष एवं विधायक अजय सिंह और पूर्व मंत्री एवं विधायक ओमकार मरकाम भी शामिल हुए।

पीड़ित परिवारों ने सुनाई अपनी पीड़ा

धरने में बालाघाट से पहुंचे पीड़ित परिवारों ने अपने बच्चों की मौत का दर्द साझा किया। तीन बच्चों के पिता राकेश मरकाम की चार वर्षीय बेटी माही, मंगलू कुसरे की डेढ़ वर्षीय बेटी गोरी और बरन सिंह मरकाम के आठ वर्षीय बेटे रोनू की मौत का जिक्र करते हुए परिजनों ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। पीड़ित परिवारों का कहना है कि स्वास्थ्य मंत्री का इस्तीफा ही उनके बच्चों को अंतिम श्रद्धांजलि होगी।

स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सरकार पर निशाना

आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया ने कहा कि बालाघाट में 30 आदिवासी बच्चों की मौत, छिंदवाड़ा का कफ सिरप मामला, इंदौर में नवजातों को चूहों द्वारा कुतरे जाने की घटना, सतना में HIV संक्रमित रक्त चढ़ाने का मामला और रीवा अस्पताल में कल्पना मिश्रा की मौत के साथ ही जीवित गिरिजा प्रसाद गुप्ता को मृत घोषित किए जाने की घटना प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

उन्होंने आरोप लगाया कि मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था ICU में पड़ी है और इसका इलाज स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे के बिना संभव नहीं है।

आदिवासी कांग्रेस ने आंदोलन के दौरान सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं—

– स्वास्थ्य मंत्री का तत्काल इस्तीफा लिया जाए।

– बालाघाट में तत्काल Health Emergency लागू की जाए।

– बालाघाट के प्रत्येक पीड़ित परिवार को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए।

आदिवासी कांग्रेस ने कहा है कि जब तक इन मांगों पर सरकार ठोस कार्रवाई नहीं करती, तब तक ‘न्याय सत्याग्रह’ जारी रहेगा।

कार्यक्रम का संचालन आदिवासी कांग्रेस की राष्ट्रीय समन्वयक अर्चना पोर्ते और विजय कोल ने किया। आंदोलन की अध्यक्षता मध्यप्रदेश आदिवासी कांग्रेस के अध्यक्ष रामू टेकाम कर रहे हैं।

स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर रीवा में आदिवासी कांग्रेस का अनिश्चितकालीन धरना

रीवा। मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी अस्पतालों में सामने आ रही कथित लापरवाही के विरोध में आदिवासी कांग्रेस ने रीवा में स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया है। आंदोलन का नेतृत्व मध्यप्रदेश आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया कर रहे हैं। वहीं, धरना में आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रामू टेकाम और स्थानीय नेताओं के अलावा आदिवासी विधायक भी शामिल हैं।

आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और झाबुआ से कांग्रेस विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया ने धरना स्थल पर पहुंचने से पहले रीवा आदिवासी कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष रहे दिवंगत अमित कोल के परिजनों से उनके निवास पर मुलाकात की।

इन घटनाओं को लेकर सरकार पर निशाना

आदिवासी कांग्रेस ने बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत, इंदौर के सरकारी अस्पताल में नवजात बच्चों को चूहों द्वारा कुतरे जाने की घटना, सतना में कथित तौर पर एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने के मामले और छिंदवाड़ा के कफ सिरप प्रकरण को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं।

कांग्रेस का आरोप है कि प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में लगातार गंभीर लापरवाही के मामले सामने आ रहे हैं और इसके बावजूद स्वास्थ्य व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है।

स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग

आदिवासी कांग्रेस ने इन घटनाओं की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करने की मांग करते हुए स्वास्थ्य मंत्री से तत्काल इस्तीफा देने की मांग की है। संगठन का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही के कारण किसी परिवार को अपने बच्चों की जान नहीं गंवानी चाहिए।

मृत बच्चों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग

आंदोलनकारियों ने बालाघाट में जान गंवाने वाले आदिवासी बच्चों के प्रत्येक परिवार को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा देने की मांग की है। इसके साथ ही प्रभावित परिवारों में कम से कम एक सदस्य को स्थायी रोजगार देने की मांग भी रखी गई है।

आदिवासी बहुल इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए विशेष स्वास्थ्य अभियान चलाने की भी मांग की गई है। संगठन ने अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर, नर्सिंग और मेडिकल स्टाफ, जरूरी दवाइयां, जांच सुविधाएं, ब्लड बैंक और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की मांग की है।

सरकार से ठोस कार्रवाई की मांग

आदिवासी कांग्रेस का कहना है कि केवल जांच की घोषणा करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकार को घटनाओं की जिम्मेदारी तय करने के साथ प्रभावित परिवारों को न्याय और उचित मुआवजा देना होगा। साथ ही प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करती, तब तक रीवा में अनिश्चितकालीन धरना जारी रहेगा।

क्या एमपी में गरीब के घर पैदा होना हुआ गुनाह?छिंदवाड़ा, इंदौर और बालाघाट के बाद अब रीवा में बच्चों की मौत का मातम

भोपाल। मध्य प्रदेश में बच्चों की मौत के मामले लगातार सरकार और स्वास्थ्य विभाग के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। छिंदवाड़ा, इंदौर और बालाघाट के बाद अब रीवा में जच्चा-बच्चा की मौत ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक के बाद एक सामने आ रही इन घटनाओं से स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है। तो, बच्चों की लगातार मौतों के कारण प्रदेश में स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग ने जोर पकड़ लिया है।

दरअसल, रीवा के गांधी मेमोरियल अस्पताल में डिलीवरी के दौरान महिला कल्पना मिश्रा और उसके नवजात की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही के आरोप लगाए। मामले में अधीक्षक और नर्सिंग स्टाफ पर कार्रवाई की गई है। हालांकि, कार्रवाई के बावजूद सवाल यह है कि आखिर अस्पताल में ऐसी स्थिति क्यों बनी और क्या सिर्फ कर्मचारियों पर कार्रवाई करने से स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियां दूर हो जाएंगी? ये कोई पहला मामला नहीं है जब लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते किसी मासूम की जान चली गई हो। इससे पहले छिंदवाड़ा, इंदौर और बालाघाट की घटनाओं ने भी आत्मा को झंझोर कर रख दिया था। सवाल सिर्फ एक है कि, क्या मप्र में गरीब के घर में पैदा होना गुनाह है ?

क्या कहती है भारत सरकार की रिपोर्ट

भारत सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024 के रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में जन्म लेने वाले 1 हजार बच्चों में 35 बच्चे अपना पहला जन्मदिन ही नहीं मना पाते। शिशु मृत्यु दर के मामले में मध्य प्रदेश देश में दूसरे स्थान पर हैं। जहां नवजात बच्चों की सबसे ज्यादा मौत होती है। मध्य प्रदेश में 28 बच्चों की मौत शुरूआत के 28 दिनों के अंदर ही हो जाती है। हालांकि पिछले 5 सालों में इन आंकड़ों में 11 अंकों का सुधार हुआ है, लेकिन इसके बाद भी मध्य प्रदेश राष्ट्रीय औसत से 11 अंक पीछे हैं।

छिंदवाड़ा, इंदौर, सतना और बालाघाट में बच्चों की मौत ने मचाया हड़कंप

इससे पहले बालाघाट में बैगा समाज के 26 आदिवासी बच्चों की मौत ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया था। बच्चों की मौत के बाद कांग्रेस ने सरकार और स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। हालांकि, मामले में सरकार ने छूटपुट कार्यवाही कर इतिश्री कर ली थी।

इंदौर में 2 मासूमों की चूहों के कुतरने से मौत के मामले ने भी सरकार को कटघरे में खड़ा किया था। प्रदेश के बड़े मेडिकल हब में शामिल इंदौर में ऐसी घटनाओं को लेकर अस्पतालों की व्यवस्थाओं और स्वास्थ्य विभाग की मॉनिटरिंग पर सवाल उठे। सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत में गरीब परिवारों को इलाज के लिए परेशान होना पड़ता है। अगर बड़े शहरों के अस्पतालों में भी मरीजों की सुरक्षा और इलाज को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो दूरदराज के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

छिंदवाड़ा में नकली सिरप से बच्चों की मौत का मामला भी पहले काफी विवादों में रहा था। घटना के बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं और इलाज को लेकर सवाल उठे थे। विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधते हुए स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए थे। अब रीवा की घटना के बाद विपक्ष इन तमाम मामलों को जोड़कर सरकार से जवाब मांग रहा है।

सतना जिला अस्पताल में थैलेसीमिया से पीड़ित मासूम बच्चों को कथित तौर पर एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाने का गंभीर मामला सामने आया। मामला दिसंबर 2025 में सामने आया था, जहां जिला अस्पताल में थैलेसीमिया का इलाज करा रहे बच्चों को एचआईवी पॉजिटिव रक्त चढ़ाया गया था। इस लापरवाही के कारण कई मासूम बच्चे एचआईवी से संक्रमित हो गए। इन बच्चों को बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है।

एमपी के भविष्य की मौत का जिम्मेदार कौन?

प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में है। हर घटना के बाद जांच और कार्रवाई की बात होती है, लेकिन कुछ समय बाद फिर किसी दूसरे जिले से ऐसी ही घटना सामने आ जाती है। ऐसे में सरकार की मंशा पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं कि, आखिर इन घटनाओं की स्थायी रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? क्या स्वास्थ्य विभाग केवल घटना होने के बाद कार्रवाई करने तक सीमित है या अस्पतालों की नियमित मॉनिटरिंग और जवाबदेही की कोई मजबूत व्यवस्था भी है? लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद अब स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ रही है।

सरकार के दावों और जमीनी हकीकत में अंतर

सरकार की ओर से प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही है। जहां लगातार अलग-अलग जिलों से बच्चों की मौत की घटनाएं सामने आ रही हैं। जो सरकार के तमाम दावों की पोल खोल रही हैं। अगर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी मजबूत है, तो गरीब परिवारों को इलाज के दौरान बार-बार ऐसे दर्द से क्यों गुजरना पड़ रहा है?

सवाल सिर्फ कार्रवाई का नहीं, व्यवस्था बदलने का है

रीवा में अधीक्षक और नर्सिंग स्टाफ पर कार्रवाई हुई है, लेकिन सवाल यही है कि क्या इससे पूरी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? अस्पताल में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की उपलब्धता, इमरजेंसी व्यवस्था, दवाओं और जरूरी संसाधनों की उपलब्धता, मरीजों की निगरानी और इलाज में प्रोटोकॉल का पालन, इन सभी पहलुओं की जांच जरूरी है। क्योंकि अगर व्यवस्था में कमी है तो केवल एक कर्मचारी को जिम्मेदार ठहराने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

गरीब के बच्चे की जिंदगी की कीमत क्या कम है?

इन घटनाओं का सबसे बड़ा असर उन गरीब परिवारों पर पड़ता है, जिनके पास महंगे निजी अस्पतालों में इलाज कराने का विकल्प नहीं होता। उनके लिए सरकारी अस्पताल ही सबसे बड़ी उम्मीद हैं। ऐसे में जब सरकारी अस्पताल में ही इलाज के दौरान किसी बच्चे या जच्चा-बच्चा की मौत हो जाती है, तो परिवार सिर्फ अपने किसी सदस्य को नहीं खोता, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर उसका भरोसा भी टूटता है। यही वजह है कि अब लगातार सरकार से जवाबदेही की मांग की जा रही है।

स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग

बच्चों से जुड़े तमाम मामलों और स्वास्थ्य विभाग की लचर व्यवस्था के लिए विपक्ष ने मप्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल को जिम्मेदार बताया है। ऐसे में अखिल भारतीय आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया ने मप्र सरकार को पत्र लिखकर स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग की है।

छिंदवाड़ा, इंदौर, बालाघाट और अब रीवा… मौत की इन घटनाओं ने सवाल एक ही खड़ा किया है—क्या मध्य प्रदेश में गरीब के घर पैदा होना ही गुनाह है?

सरकार और स्वास्थ्य विभाग के सामने अब चुनौती सिर्फ इन मामलों में कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की है।

बालाघाट में 26 आदिवासी बच्चों की मौत पर सियासत गरम, डॉ. विक्रांत भूरिया ने स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग की

भोपाल। बालाघाट में बैगा समाज के 26 आदिवासी बच्चों की मौत के मामले ने मध्य प्रदेश की सियासत गरमा दी है। कांग्रेस ने इस घटना को लेकर सरकार और स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अखिल भारतीय आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल के तत्काल इस्तीफे की मांग की है।

डॉ. भूरिया ने आरोप लगाया कि कुपोषण, मलेरिया और खसरा जैसी बीमारियों के कारण बच्चों की मौत प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली और सरकारी तंत्र की गंभीर लापरवाही को उजागर करती है। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मौत को महज एक घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

निष्पक्ष जांच और मेडिकल ऑडिट की मांग

कांग्रेस नेता ने बालाघाट मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराने की मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई किए जाने की बात कही।

डॉ. भूरिया ने सभी 26 मौतों का मेडिकल और प्रशासनिक ऑडिट कराने की मांग भी की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि बच्चों को समय पर इलाज और जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मिली थीं या नहीं।

बैगा क्षेत्रों में विशेष स्वास्थ्य अभियान की मांग

डॉ. भूरिया ने प्रभावित बैगा इलाकों में विशेष स्वास्थ्य और पोषण अभियान चलाने की मांग की है। उनका कहना है कि आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कुपोषण और संक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए सरकार को तत्काल प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

उन्होंने पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा देने की मांग करते हुए कहा कि 26 बच्चों की मौत सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि 26 परिवारों की अपूरणीय क्षति है।

‘दौरे और संवेदना से काम नहीं चलेगा’

डॉ. भूरिया ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि अब सिर्फ अधिकारियों के दौरे और संवेदना व्यक्त करने से काम नहीं चलेगा। इस मामले में जिम्मेदारी तय कर निर्णायक कार्रवाई करना जरूरी है। उन्होंने मुख्यमंत्री से स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे के साथ-साथ पूरे मामले में जवाबदेही तय करने की मांग की है।

ओरछा में बीजेपी प्रदेश कार्यसमिति की बैठक का पहला दिन, विकसित एमपी से बुंदेलखंड के विकास तक मंथन

ओरछा। मध्यप्रदेश के ओरछा में बीजेपी की दो दिवसीय प्रदेश कार्यसमिति की बैठक रविवार को शुरू हुई। श्रीराम राजा सरकार की पावन नगरी में आयोजित इस बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेवाल, प्रदेश प्रभारी डॉ. महेन्द्र सिंह, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल समेत पार्टी के कई बड़े नेता और पदाधिकारी शामिल हुए। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया और राष्ट्रीय प्रकोष्ठ संयोजक विष्णुदत्त शर्मा भी बैठक में मौजूद रहे।

बैठक के उद्घाटन सत्र की शुरुआत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने दीप प्रज्ज्वलन के साथ की। पहले दिन संगठन को मजबूत करने, विकसित मध्यप्रदेश के रोडमैप और बुंदेलखंड के विकास समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।

विकसित मध्यप्रदेश के विजन पर फोकस

बैठक के बाद बीजेपी प्रदेश महामंत्री राहुल कोठारी ने प्रेसवार्ता कर पहले दिन हुई चर्चाओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश लगातार विकास और विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रदेश कार्यसमिति की यह बैठक विकसित मध्यप्रदेश के संकल्प को आगे बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होगी।

बैठक स्थल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यों और उपलब्धियों को प्रदर्शित करने के लिए विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई है। इसमें विकसित मध्यप्रदेश के विजन को प्रमुखता से दिखाया गया है। साथ ही ओरछा लोक का मॉडल भी तैयार किया गया है, जो बैठक में आकर्षण का केंद्र रहा।

कार्यकर्ताओं ने सुनी ‘मन की बात’

प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम को भी एक साथ सुना। इस दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कार्यकर्ताओं से संगठन और सरकार के कामों को जनता तक पहुंचाने पर भी जोर दिया।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भारत के पुनरुत्थान के लिए किए जा रहे कार्यों और देश के विकास की दिशा पर चर्चा की। इसके साथ ही बैठक में राजनीतिक प्रस्तावों पर भी मंथन किया गया।

बुंदेलखंड के विकास पर बीजेपी का विशेष फोकस

प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में बुंदेलखंड के विकास का मुद्दा प्रमुखता से उठा। बीजेपी ने केन-बेतवा लिंक परियोजना को क्षेत्र के विकास के लिए बड़ा कदम बताया। प्रदेश महामंत्री राहुल कोठारी ने कहा कि केन-बेतवा परियोजना से बुंदेलखंड को नई दिशा और नई ताकत मिलेगी।

बीजेपी ने बैठक में केन-बेतवा परियोजना को लेकर कांग्रेस की ओर से लगाए जा रहे आरोपों की भी निंदा की। पार्टी का कहना है कि परियोजना के पूरा होने से बुंदेलखंड के विकास को बड़ा फायदा मिलेगा और क्षेत्र की तस्वीर बदलने में मदद मिलेगी।

सेवा संकल्प के तहत सामाजिक कार्यों पर भी जोर

बीजेपी का बुंदेलखंड को लेकर फोकस केवल विकास योजनाओं तक सीमित नहीं है। बैठक में सेवा संकल्प के तहत क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक गतिविधियां और जनसेवा से जुड़े कार्य करने पर भी चर्चा हुई। संगठन के स्तर पर इन गतिविधियों को आगे बढ़ाने की रणनीति पर भी विचार किया गया।

दूसरे दिन भी जारी रहेगा मंथन

बीजेपी प्रदेश कार्यसमिति की बैठक दो दिन तक चलेगी। पहले दिन संगठन, विकसित मध्यप्रदेश के विजन और बुंदेलखंड के विकास जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई। बैठक के कई सत्र अभी जारी हैं। दूसरे दिन संगठन को और मजबूत करने के साथ प्रदेश के विकास से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा होगी।

 

 

बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में एमपी के 6 चेहरे, टीम नितिन में मध्यप्रदेश का दबदबा

भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने सोमवार को अपनी नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान कर दिया। लंबे समय से चल रही संगठनात्मक कवायद के बाद घोषित की गई इस टीम में मध्यप्रदेश के छह नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। एमपी के नेताओं को मिली जगह को प्रदेश के लिहाज से बड़ी राजनीतिक और संगठनात्मक उपलब्धि माना जा रहा है।

नई टीम में मध्यप्रदेश से लाल सिंह आर्य, विष्णु दत्त शर्मा, गजेंद्र सिंह पटेल, बंसीलाल गुर्जर, कविता पाटीदार और आशीष अग्रवाल को जगह मिली है। इनमें अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की कोशिश दिखाई दे रही है।

किस नेता को मिली कौन सी जिम्मेदारी?

लाल सिंह आर्य को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। संगठन में लंबे अनुभव वाले आर्य की राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विष्णुदत्त शर्मा को सभी मोर्चों का संयोजक बनाया गया है। खजुराहो से लोकसभा सांसद शर्मा इससे पहले मध्यप्रदेश बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।

गजेंद्र सिंह पटेल को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया है। निमाड़ क्षेत्र से आने वाले पटेल लगातार दूसरी बार लोकसभा सांसद चुने गए हैं और आदिवासी क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पकड़ मानी जाती है।

बंसीलाल गुर्जर को बीजेपी किसान मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है। किसान राजनीति में सक्रिय गुर्जर को मिली यह जिम्मेदारी मध्यप्रदेश के ग्रामीण और किसान वोट बैंक के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है।

कविता पाटीदार को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। राज्यसभा सांसद पाटीदार को राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी मिलने से महिला नेतृत्व और मध्यप्रदेश के सामाजिक समीकरणों को भी प्रतिनिधित्व मिला है।

वहीं आशीष ऊषा अग्रवाल को मीडिया विभाग का सह-संयोजक बनाया गया है। संगठन और मीडिया के बीच समन्वय की जिम्मेदारी निभाने में उनकी भूमिका अहम होगी। अभी वे मप्र बीजेपी के प्रदेश मीडिया प्रभारी पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन पर फोकस

बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में सिर्फ मध्यप्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों और सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है। पार्टी के मुताबिक नई टीम में 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रतिनिधित्व मिला है। टीम में 10 महिलाओं और छह अल्पसंख्यक समुदायों के नेताओं को भी शामिल किया गया है। मध्यप्रदेश की बात करें तो नई टीम में मालवा-निमाड़, ग्वालियर-चंबल और बुंदेलखंड जैसे अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व दिखाई देता है। सामाजिक समीकरण के लिहाज से भी पार्टी ने विभिन्न वर्गों को राष्ट्रीय संगठन में जगह दी है।

‘टीम नितिन’ में अनुभव और नए चेहरों का मेल

नितिन नबीन की नई टीम में कई पुराने और अनुभवी नेताओं के साथ नए चेहरों को भी जगह दी गई है। राष्ट्रीय स्तर पर स्मृति ईरानी को महासचिव और वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। वहीं राम माधव की भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के तौर पर वापसी हुई है।ऐसे में मध्यप्रदेश से छह नेताओं को शामिल किया जाना प्रदेश बीजेपी के संगठनात्मक महत्व को भी दर्शाता है। खासतौर पर गजेंद्र पटेल को राष्ट्रीय महामंत्री और लाल सिंह आर्य को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसी अहम जिम्मेदारियां मिलना प्रदेश के लिए बड़ी बात है।

आने वाले चुनावों के लिहाज से अहम बदलाव

बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम का गठन ऐसे समय हुआ है जब पार्टी के सामने आने वाले विधानसभा चुनावों की बड़ी चुनौती है। नई टीम में संगठनात्मक अनुभव, युवा नेतृत्व, महिला प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय संतुलन पर जोर दिया गया है।

मध्यप्रदेश के छह नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी मिलने से प्रदेश बीजेपी के नेताओं की भूमिका अब राज्य से आगे राष्ट्रीय स्तर तक बढ़ गई है। ऐसे में इन नियुक्तियों का असर आने वाले समय में पार्टी की संगठनात्मक रणनीति और चुनावी तैयारियों में भी देखने को मिल सकता है।

विश्व आदिवासी दिवस पर BJP पर विक्रांत भूरिया का हमला, बोले- ‘आदिवासी सिर्फ चुनाव में याद आते हैं?’

भोपाल/दिल्ली। विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और झाबुआ विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया ने भाजपा पर निशाना साधा है। उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और भाजपा शासित राज्यों की सरकारों पर आदिवासी समाज की अनदेखी का आरोप लगाते हुए सवाल किया कि क्या भाजपा को आदिवासी समाज सिर्फ चुनाव के समय ही याद आता है?

डॉ. भूरिया ने कहा कि 9 अगस्त आदिवासी समाज के लिए महज एक तारीख नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व, संस्कृति, अधिकार और सम्मान से जुड़ा महत्वपूर्ण दिन है। ऐसे मौके पर देश के नेतृत्व से आदिवासी समाज के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान की उम्मीद रहती है।

भाजपा नेताओं की चुप्पी पर सवाल

भूरिया ने कहा कि उन्होंने यह देखने की कोशिश की कि विश्व आदिवासी दिवस पर देश के बड़े नेताओं ने आदिवासी समाज को किस तरह याद किया। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी ओर से आदिवासी समाज के लिए अपेक्षित संदेश दिखाई नहीं दिया।

उन्होंने मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, असम और गुजरात समेत भाजपा शासित राज्यों की सरकारों पर भी सवाल उठाए। भूरिया का आरोप है कि आदिवासी बहुल राज्यों में भी विश्व आदिवासी दिवस को लेकर वैसी संवेदनशीलता नजर नहीं आई, जिसकी समाज को उम्मीद थी।

‘चुनाव के समय याद आते हैं आदिवासी’

डॉ. भूरिया ने कहा कि चुनाव आते ही भाजपा नेता आदिवासी समाज के बीच पहुंचते हैं। आदिवासी महापुरुषों को याद किया जाता है और उनके सम्मान में कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। लेकिन जब आदिवासी समाज के अधिकारों की बात आती है तो यही नेता चुप नजर आते हैं।

उन्होंने सवाल किया, “क्या भाजपा के लिए आदिवासी समाज को याद करने की तारीख 9 अगस्त नहीं, सिर्फ चुनाव की तारीख है?”

‘भाषण नहीं, अधिकारों पर चाहिए काम’

भूरिया ने कहा कि आदिवासी समाज को केवल भाषणों, तस्वीरों और चुनावी वादों से सम्मान नहीं चाहिए। समाज की असली जरूरत जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा के साथ शिक्षा, रोजगार और संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करना है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सरल जरूर है, लेकिन अब वह पहले से कहीं ज्यादा जागरूक है। वह देख रहा है कि कौन उसके साथ खड़ा है और कौन सिर्फ चुनाव के समय उसके बीच पहुंचता है।

‘चुप्पी भी याद रखी जाएगी’

डॉ. भूरिया ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस पर जो लोग चुप रहे, उनकी यह चुप्पी भी आदिवासी समाज याद रखेगा। उन्होंने कहा कि आदिवासी कांग्रेस समाज के अधिकारों और सम्मान की लड़ाई को आगे भी मजबूती से उठाती रहेगी।

भूरिया ने कहा कि आदिवासी समाज को सिर्फ वोट बैंक समझने वालों को यह समझना होगा कि आदिवासी समाज सब देख रहा है, सब समझ रहा है और सब याद रखेगा।

मानगढ़ धाम पर सरकार का यू-टर्न? संसद के जवाब पर डॉ. विक्रांत भूरिया ने उठाए बड़े सवाल

नई दिल्ली।  क्या सरकार मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक बनाने के अपने वादे से पीछे हट रही है?

यह सवाल संसद में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्रालय द्वारा दिए गए उस लिखित उत्तर के बाद खड़ा हुआ है, जिसमें कहा गया है कि राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने का कोई प्रस्ताव फिलहाल विचाराधीन नहीं है।

इस मुद्दे को सबसे मुखरता से उठाते हुए अखिल भारतीय आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया ने केंद्र सरकार के रुख पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि यदि राष्ट्रीय स्मारक बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं है, तो वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मानगढ़ धाम से किए गए सार्वजनिक वादे का क्या हुआ?

आदिवासियों के ‘जलियांवाला बाग’ को अब भी इंतजार

मानगढ़ धाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और आदिवासी इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे लंबे समय तक मुख्यधारा के इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिला। 17 नवंबर 1913 को समाज सुधारक गोविंद गुरु के नेतृत्व में हजारों भील आदिवासी यहां एकत्र हुए थे। ब्रिटिश सेना ने सभा पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं, जिसमें विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार बड़ी संख्या में आदिवासी शहीद हुए। आदिवासी समाज इस संख्या को लगभग 1,500 मानता है। इसी वजह से मानगढ़ धाम को “आदिवासियों का जलियांवाला बाग” कहा जाता है।

2022 का वादा, 2026 का जवाब

एक नवंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मानगढ़ धाम पहुंचकर कहा था कि केंद्र और संबंधित राज्य सरकारें मिलकर इस ऐतिहासिक स्थल का विकास करेंगी तथा इसे राष्ट्रीय स्तर पर उचित पहचान दिलाने की दिशा में कार्य करेंगी।

लेकिन अब संसद में सरकार का यह कहना कि राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है, कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या सरकार ने अपना रुख बदल लिया है? यदि नहीं, तो प्रक्रिया कहां अटकी हुई है?

डॉ. विक्रांत भूरिया बोले— “यह केवल स्मारक का नहीं, सम्मान का सवाल है”

डॉ. विक्रांत भूरिया ने कहा कि मानगढ़ धाम केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के स्वाभिमान, संघर्ष और बलिदान का जीवंत प्रतीक है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा देना किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि देश के इतिहास और आदिवासी योगदान को सम्मान देने का विषय है।

उन्होंने केंद्र सरकार से तत्काल मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने और वर्ष 2022 में किए गए सार्वजनिक आश्वासनों को समयबद्ध तरीके से लागू करने की मांग की।

अब सरकार के सामने जवाबदेही का सवाल

मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग वर्षों से उठती रही है। संसद में आए ताज़ा जवाब ने इस मांग को फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या मानगढ़ धाम को केवल भाषणों में सम्मान मिलेगा, या देश के आदिवासी इतिहास को वह संवैधानिक और राष्ट्रीय पहचान भी मिलेगी, जिसका वादा किया गया था?

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