Thursday, October 1, 2026
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हरियाणा IPS पूरन केस में नया खुलासा: कॉल डिटेल से सामने आए कई अफसरों से संपर्क के सबूत

हरियाणा के सीनियर IPS अधिकारी पूरन कुमार की संदिग्ध मौत के मामले में अब कॉल डिटेल रिपोर्ट (CDR) ने जांच को नया मोड़ दे दिया है।
सूत्रों के मुताबिक, सुसाइड से ठीक पहले पूरन कुमार ने राज्य के कई अफसरों से बात की थी — यही कॉल डिटेल अब जांच एजेंसियों के लिए अहम सबूत बन गई है।

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कॉल डिटेल में क्या मिला?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पूरन कुमार ने घटना से पहले कई वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया था। जांच टीम अब यह पता लगाने में जुटी है कि उन कॉल्स में क्या बातचीत हुई थी और क्या किसी दबाव या विवाद का जिक्र हुआ था।
इन कॉल्स की टाइमिंग और ड्यूरेशन को विशेष रूप से खंगाला जा रहा है।

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पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतज़ार

मामले की जांच फिलहाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक रुकी हुई है। अधिकारियों का कहना है कि रिपोर्ट आने के बाद ही मौत की असल वजह और घटनाक्रम की पुष्टि की जा सकेगी।
परिवार ने भी निष्पक्ष जांच की मांग की है, ताकि सच्चाई सामने आ सके।

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पुलिस मुख्यालय में हलचल

पूरन कुमार की मौत के बाद हरियाणा पुलिस महकमे में भारी हलचल मच गई है। कुछ अफसरों से पूछताछ की तैयारी चल रही है, जबकि कुछ को जांच में सहयोग के लिए नोटिस भी भेजे जा सकते हैं।

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विपक्ष का हमला

विपक्षी दलों ने इस घटना को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा है। विपक्ष का कहना है कि सरकार को IPS अधिकारी की आत्महत्या को “सामान्य मामला” मानने की बजाय, इसे संस्थागत दबाव और भ्रष्टाचार की दिशा में जांचना चाहिए।

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क्या बोले विशेषज्ञ?

पूर्व पुलिस अधिकारी और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि –

> “IPS अधिकारी के आत्महत्या जैसे मामलों में कॉल डिटेल्स अक्सर पूरी कहानी बयान कर देती हैं। यदि किसी प्रकार का दबाव या उत्पीड़न हुआ है, तो CDR से उसकी पुष्टि हो सकती है।”

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड चुनाव आयोग पर ठोका जुर्माना, वोटर लिस्ट की गड़बड़ी पर कड़ी फटकार

देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक अहम आदेश में उत्तराखंड चुनाव आयोग को जमकर फटकार लगाई है। मामला वोटर लिस्ट में डबल एंट्री और गड़बड़ी का है, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने आयोग पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

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क्या है पूरा मामला?

उत्तराखंड में वोटर लिस्ट की तैयारी और संशोधन के दौरान बड़ी संख्या में डुप्लीकेट नाम दर्ज पाए गए। इस लापरवाही को लेकर एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में पहुंची, जहाँ सुनवाई के बाद अदालत ने राज्य चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सख्त नाराज़गी जताई।

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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जजों ने कहा कि वोटर लिस्ट में डबल एंट्री चुनावी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाती है। लोकतंत्र की नींव ही निष्पक्ष चुनाव पर टिकी है, और इस तरह की लापरवाही मतदाता अधिकारों के साथ समझौता है।

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2 लाख रुपये का जुर्माना

अदालत ने आयोग पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए यह साफ संदेश दिया कि चुनाव जैसे गंभीर विषय में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही आयोग को निर्देश दिया गया कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

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क्यों है यह मामला अहम?

वोटर लिस्ट में गड़बड़ी से चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सीधा असर पड़ता है।

डुप्लीकेट नाम या गलत प्रविष्टियाँ चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने वाले चुनावों में मतदाता सूचियों की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए नज़ीर बनेगा।

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निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने साफ कर दिया है कि लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करने वाली कोई भी चूक स्वीकार्य नहीं है। अब उत्तराखंड चुनाव आयोग को न केवल जुर्माना चुकाना होगा, बल्कि अपनी कार्यप्रणाली में भी सुधार करना होगा।

अमित शाह के बिहार दौरे से पहले भाजपा को बड़ा झटका, चार बार के विधायक जनार्दन यादव ने छोड़ी पार्टी

बिहार की राजनीति में इन दिनों सियासी हलचल तेज़ है। गृहमंत्री अमित शाह के प्रस्तावित बिहार दौरे से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को बड़ा झटका लगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और चार बार के विधायक जनार्दन यादव ने भाजपा से इस्तीफा देकर राजनीतिक समीकरणों में हलचल मचा दी है।

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कौन हैं जनार्दन यादव?

जनार्दन यादव बिहार के अररिया ज़िले के नरपतगंज विधानसभा क्षेत्र से चार बार विधायक रह चुके हैं। उन्होंने लंबे समय तक भाजपा में रहते हुए संगठन और जनता के बीच मजबूत पहचान बनाई थी। ऐसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता का पार्टी से अलग होना भाजपा के लिए एक करारा झटका है।

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इस्तीफे की वजहें क्या हैं?

इस्तीफा देते समय जनार्दन यादव ने साफ कहा कि बिहार में भ्रष्टाचार चरम पर है।

👉 “थाना हो, प्रखंड कार्यालय हो या कोई भी सरकारी विभाग, बिना रिश्वत कोई काम नहीं होता।” — जनार्दन यादव

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा के वर्तमान विधायक और संगठन जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे। पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो रही है और पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक माहौल खत्म हो चुका है।

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भाजपा के लिए चुनौती क्यों बढ़ी?

गृहमंत्री अमित शाह का यह दौरा भाजपा की चुनावी रणनीति के लिहाज़ से बेहद अहम माना जा रहा था। लेकिन दौरे से ठीक पहले जनार्दन यादव जैसे वरिष्ठ नेता का पार्टी छोड़ना भाजपा की छवि और संगठन दोनों के लिए चिंता का विषय है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि —

भाजपा को वरिष्ठ नेताओं को साधने में नाकामयाबी भारी पड़ सकती है।

यह इस्तीफा पार्टी के अंदरूनी असंतोष और गुटबाज़ी को उजागर करता है।

विपक्ष को भाजपा के खिलाफ और हमलावर होने का मौका मिल गया है।

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विपक्ष की प्रतिक्रिया

राजद, कांग्रेस और जद(यू) ने जनार्दन यादव के इस्तीफे को भाजपा की असफलता करार दिया है।

राजद नेताओं ने कहा कि —
👉 “भाजपा में सिर्फ नेताओं की उपेक्षा ही नहीं, जनता की समस्याओं की भी अनदेखी हो रही है। इसलिए लोग पार्टी छोड़ने को मजबूर हैं।”

वहीं कांग्रेस का कहना है कि भाजपा अब न तो संगठन को संभाल पा रही है और न ही जनता का भरोसा।

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जनता और स्थानीय समीकरणों पर असर

नरपतगंज विधानसभा क्षेत्र में जनार्दन यादव का अच्छा जनाधार रहा है। ऐसे में उनके पार्टी छोड़ने से भाजपा को जमीनी स्तर पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। यह बदलाव न सिर्फ स्थानीय समीकरण बिगाड़ेगा, बल्कि चुनावी गणित पर भी असर डालेगा।

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निष्कर्ष

अमित शाह के बिहार दौरे से पहले भाजपा को लगा यह झटका बताता है कि पार्टी के भीतर असंतोष और अव्यवस्था गहराती जा रही है। विपक्ष इसे पूरी तरह भुनाने की कोशिश करेगा और भाजपा को अब संगठनात्मक मजबूती और पुराने नेताओं को साधने पर फोकस करना होगा।

आगामी बिहार चुनाव में यह घटना कितना असर डालेगी, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल भाजपा की मुश्किलें बढ़ना तय है।

बिहार चुनाव और कांग्रेस की रणनीति: “मोदी सरकार की उलटी गिनती यहीं से शुरू होगी”

भारतीय राजनीति में चुनाव सिर्फ सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं होते, बल्कि जनता के मूड, सामाजिक समीकरण और आने वाले वर्षों की दिशा तय करने वाले पर्व भी होते हैं। इस बार बिहार चुनाव से पहले कांग्रेस ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। पार्टी का दावा है कि “मोदी सरकार की उलटी गिनती बिहार से शुरू होगी।”

यह बयान सिर्फ एक चुनावी नारा नहीं है, बल्कि कांग्रेस की रणनीतिक सोच और भविष्य की राजनीति का संकेत है। आइए समझते हैं कि यह कथन क्यों महत्वपूर्ण है और इसके निहितार्थ क्या हो सकते हैं।

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कांग्रेस का हमला — राजनीति में नया संदेश

कांग्रेस ने यह कहकर स्पष्ट कर दिया कि वह अब सिर्फ सहयोगी की भूमिका में नहीं, बल्कि भाजपा के खिलाफ सीधी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है।

मोदी सरकार पर सीधा निशाना: कांग्रेस ने बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्या और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोर पड़ती स्थिति को मुद्दा बनाया।

बिहार से शुरुआत: यह कहना कि मोदी सरकार की उलटी गिनती बिहार से शुरू होगी, साफ दर्शाता है कि कांग्रेस बिहार चुनाव को “राष्ट्रीय राजनीति” के मंच की तरह इस्तेमाल करना चाहती है।

कार्यकर्ताओं में जोश भरना: इस बयान का लक्ष्य कांग्रेस कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिलाना है कि वे सिर्फ राज्य में नहीं, बल्कि देश की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

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क्यों बिहार?

यह सवाल स्वाभाविक है कि कांग्रेस ने “मोदी सरकार की उलटी गिनती” की शुरुआत के लिए बिहार का नाम क्यों लिया।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बिहार हमेशा से भारतीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। चाहे जेपी आंदोलन हो, मंडल राजनीति हो या महागठबंधन का प्रयोग—बिहार से उठी लहरों ने दिल्ली की सत्ता को हिला दिया है।

2. गठबंधन की मजबूती
कांग्रेस यहाँ राजद और वामपंथी दलों के साथ गठबंधन में है। इस गठबंधन ने 2015 में भाजपा को सत्ता से दूर रखा था। कांग्रेस इसी इतिहास को दोहराना चाहती है।

3. युवाओं की बेचैनी
बिहार देश का सबसे युवा राज्य है। यहाँ बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियाँ सबसे बड़ा मुद्दा हैं। कांग्रेस मानती है कि इन सवालों पर वह भाजपा को घेर सकती है।

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कांग्रेस का नैरेटिव

कांग्रेस का पूरा नैरेटिव तीन मुख्य बिंदुओं पर खड़ा है:

रोज़गार और शिक्षा: पार्टी का कहना है कि भाजपा सरकार ने युवाओं को ठगा है। बिहार में लाखों युवा नौकरी की तलाश में बाहर जाते हैं, लेकिन केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारें नाकाम रही हैं।

लोकतंत्र और संविधान: कांग्रेस भाजपा पर यह आरोप लगा रही है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया गया है और सत्ता के केंद्रीकरण से जनता का भरोसा टूटा है।

महंगाई और किसान: पेट्रोल, डीज़ल, खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ किसान संकट भी कांग्रेस के निशाने पर है।

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भाजपा के लिए चुनौती

कांग्रेस का यह आक्रामक रुख भाजपा के लिए कई मायनों में चुनौती है।

1. गठबंधन की ताकत: भाजपा जानती है कि अगर कांग्रेस-राजद-वाम दल साथ मिलकर मजबूत अभियान चलाते हैं, तो मुकाबला कठिन हो सकता है।

2. नैरेटिव सेट करना: कांग्रेस ने सीधे मोदी सरकार को निशाने पर लेकर यह दिखाया कि चुनाव सिर्फ राज्य स्तर का नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की नीतियों पर जनमत संग्रह भी है।

3. गांधी परिवार की अपील: राहुल गांधी और सोनिया गांधी के नेतृत्व को कांग्रेस कार्यकर्ता मैदान में भुनाने की कोशिश करेंगे।

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जनता के लिए क्या मायने?

आवाज़ उठाने का मौका: जनता को महसूस होगा कि उनकी रोज़मर्रा की समस्याएँ—बेरोजगारी, पलायन, महंगाई—राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रही हैं।

केंद्र बनाम राज्य का सवाल: यह चुनाव केवल नीतीश कुमार या तेजस्वी यादव की नहीं, बल्कि मोदी सरकार की नीतियों पर भी सवाल खड़े करेगा।

युवा शक्ति का प्रभाव: अगर कांग्रेस का नैरेटिव युवाओं को आकर्षित करता है, तो इसका असर वोट प्रतिशत पर साफ दिख सकता है।

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चुनौतियाँ कांग्रेस के सामने भी

हालाँकि कांग्रेस के लिए यह राह आसान नहीं है।

संगठनात्मक कमजोरी: बिहार में कांग्रेस का संगठन उतना मजबूत नहीं है जितना भाजपा या राजद का है।

स्थानीय बनाम राष्ट्रीय मुद्दे: जनता स्थानीय नेतृत्व पर ज़्यादा भरोसा करती है। कांग्रेस को चाहिए कि वह स्थानीय नेताओं को भी बराबर का महत्व दे।

भाजपा का मजबूत प्रचार तंत्र: भाजपा की चुनावी मशीनरी संसाधनों और प्रचार दोनों में भारी पड़ सकती है।

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निष्कर्ष

कांग्रेस का बयान कि “मोदी सरकार की उलटी गिनती बिहार से शुरू होगी” एक राजनीतिक घोषणा से कहीं अधिक है। यह विपक्ष की रणनीति का हिस्सा है, जिसमें बिहार को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

अगर कांग्रेस और उसके सहयोगी दल जनता की समस्याओं को सही ढंग से उठाते हैं और संगठनात्मक स्तर पर एकजुट रहते हैं, तो यह नारा सिर्फ चुनावी जुमला नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले राष्ट्रीय चुनावों के लिए नई दिशा तय कर सकता है।

बिहार हमेशा से राजनीतिक क्रांतियों की भूमि रहा है। अब देखना यह है कि क्या इस बार कांग्रेस का यह दावा सच साबित होगा और मोदी सरकार की उलटी गिनती वाकई यहीं से शुरू होगी।

मणिपुर हिंसा राहुल गांधी, ने पीएम मोदी से की राज्य का दौरा करने की अपील

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मणिपुर में हाल में हुई हिंसक झड़पों होने पर प्रधानमंत्री नरेंद मोदी से राज्य का दौरा कर क्षेत्र में शांति बहाल करने की दिशा में काम करने का आग्रह किया.

मणिपुर में लापता छह लोगों में से तीन के शव नदी से निकाले जाने के एक दिन बाद प्रदर्शनकारियों ने राज्य के तीन मंत्रियों और छह विधायकों के आवासों पर हमला किया, जिसके बाद सरकार ने पांच जिलों में अनिश्चित काल के लिए निषेधाज्ञा लागू कर दी और राज्य के कुछ हिस्सों में इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दीं.

राहुल गांधी ने मणिपुर में हाल में हुई हिंसक झड़पों और लगातार हो रही हिंसा ने गहरी चिंता पैदा कर दी है. उन्होंने कहा, “मणिपुर में हाल ही में हुई हिंसक झड़पों और लगातार हो रहे रक्तपात ने देश को झकझोर कर रख दिया है. एक साल से अधिक समय तक विभाजन और पीड़ा के बाद हर भारतीय की उम्मीद थी कि केंद्र और राज्य सरकारें सुलह के लिए हर संभव प्रयास करेंगी और कोई समाधान निकालेंगी.”

राहुल ने कहा, “मैं प्रधानमंत्री से एक बार फिर मणिपुर का दौरा करने और क्षेत्र में शांति एवं सौहार्द बहाल करने की दिशा में काम करने का आग्रह करता हूं.” पिछले वर्ष मई से मणिपुर में मेइती और कुकी समुदायों के बीच हिंसा में 200 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है.

क्षेत्र में मौजूदा कानून और व्यवस्था की स्थिति के कारण शनिवार से अगले आदेश तक इंफाल पश्चिम जिले में कर्फ्यू फिर से लगा दिया गया. इससे पहले, अधिकारियों ने 15 नवंबर के आदेश के अनुसार 16 नवंबर को सुबह 5:00 बजे से रात 8:00 बजे तक कर्फ्यू में ढील दी थी. हालांकि, यह ढील आदेश अब तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया है.आदेश में कहा गया है कि स्वास्थ्य सेवा सहित आवश्यक सेवाओं में शामिल व्यक्तियों को कर्फ्यू से छूट दी जाएगी.

नरेंद्र मोदी जी के लिए संविधान खाली है, क्योंकि उन्होंने कभी इसे पढ़ा नहीं है: राहुल गांधी


राहुल गांधी ने आज एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला। राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि मैं जनसभाओं में जो संविधान दिखाता हूं, वो खाली है..

नरेंद्र मोदी जी के लिए संविधान खाली है, क्योंकि उन्होंने कभी इसे पढ़ा नहीं है।

महाराष्ट्र में जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि संविधान में देश की आत्मा है और हिंदुस्तान का ज्ञान है। इसमें भगवान बुद्ध, बिरसा मुंडा, डॉ. बीआर आंबेडकर, महात्मा गांधी, और फुले की सोच है। राहुल गांधी बोले कि भाजपा को मेरे रैलियों में इस लाल किताब को दिखाने पर आपत्ति है। मगर हमें इसके लाल रंग से कोई फर्क नहीं पड़ता। जो इसके अंदर लिखा है, हम उसकी रक्षा के लिए जान देने को तैयार हैं।

राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस आदिवासी, दलित और पिछड़ा वर्ग को निर्णय लेने में प्रतिनिधित्व दिलाना चाहती है। वर्तमान में आठ प्रतिशत आदिवासी आबादी में से निर्णय लेने में उनकी हिस्सेदारी केवल एक प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि भू-अधिग्रहण बिल और PESA कानून लाकर कांग्रेस ने आपके जल-जंगल-जमीन की रक्षा की थी। लेकिन भाजपा ने सत्ता में आते ही आपको वनवासी कहा और आपके अधिकार छीनने शुरू कर दिए।

राहुल ने कहा कि भाजपा और आरएसएस के लोग आपको वनवासी कहते हैं। आदिवासी और वनवासी में बहुत बड़ा फर्क है। आदिवासी का मतलब है हिंदुस्तान के पहले मालिक। जल, जंगल और जमीन उनका पहला अधिकार है। मगर भाजपा आपको वनवासी मानती है और कहती है कि आपका जल, जंगल, जमीन पर कोई अधिकार नहीं है। आपके इसी अधिकार को बचाने के लिए बिरसा मुंडा जी अंग्रेजों से लड़े थे। राहुल गांधी ने कहा कि जाति जनगणना से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि महाराष्ट्र में आदिवासियों, दलितों और पिछड़े वर्गों की संख्या कितनी है और संसाधनों में उनकी हिस्सेदारी कितनी है?

महाराष्ट्र: आखिरी चरण में कांग्रेस 5 दिनों में दिग्गजों के 75 कार्यक्रमों की तैयारी


राहुल गांधी की मराठवाड़ा, पश्चिम महाराष्ट्र और उत्तरी महाराष्ट्र में 6 सभाएं होंगी, तो प्रियंका की 13 नवंबर को वायनाड में मतदान के बाद राज्य में 4 सभाएं तय हैं. साथ ही पार्टी अध्यक्ष खड़गे करीब 10 रैलियों को संबोधित करेंगे. विदर्भ, मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र पर कांग्रेस ने अपना ज्यादा फोकस रखा है.

कई दिग्गज करेंगे रैली

कांग्रेस के तीन शीर्ष नेताओं के अलावा महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा डिमांड सचिन पायलट और इमरान प्रतापगढ़ी की है. मुस्लिम बहुल इलाकों समेत प्रतापगढ़ी की राज्य में 20 से ज्यादा सभाएं तय हैं, तो युवा नेता सचिन पायलट की कुल 8 सभाएं. हालांकि, कुछ विशेष इलाकों में तेलंगाना सीएम रेवन्त रेड्डी और कर्नाटक सीएम सिद्धारमैया भी प्रचार में कूदेंगे.

कांग्रेस चुनाव में झोंक रही ताकत

वहीं राज्य के अहम नेताओं की बात करें तो प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले की 20 और विधायक दल के नेता बाला साहेब थोराट की 15 रैलियां फिलहाल तय की गईं हैं. 17 नवंबर को मुंबई में कांग्रेस, शिवसेना उद्धव और एनसीपी शरद पवार के शीर्ष नेताओं की एक बड़ी संयुक्त सभा के कार्यक्रम को भी अंतिम रूप दिया जा रहा है. इसके अलावा मुंबई में आखिरी वक्त में राहुल या प्रियंका का एक बड़ा रोड शो भी प्रस्तावित है, जिसके रोड मैप को फाइनल किया जा रहा है.

रैलियों और रोड शो के साथ ही कांग्रेस ने महाविकास अघाड़ी की 5 गारंटियों वाला कार्ड भी 5 करोड़ लोगों तक ले जाने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए डोर टू डोर अभियान चलाकर आम जनता के बीच विशेषकर 3 लाख की किसान कर्ज माफी और महिलाओं को तीन हजार प्रति माह के वादे को पहुंचाने का लक्ष्य है, जिससे बीजेपी के बंटेंगे तो कटेंगे जैसे मुद्दे से जनता को उनकी जरूरत के मुद्दे से जोड़ा जा सके.

लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने पूर्णिया सांसद पप्पू यादव को दी जान से मारने की धमकी, औकात में रहो…’ पप्पू यादव

बिहार के पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव को जान से मारने की धमकी मिली है। यह धमकी लॉरेंस बिश्नोई गैंग की ओर से दी गई है।

पप्पू यादव को धमकी भरा कॉल करने वाले ने दावा किया है कि वह लगातार पप्पू यादव की रेकी कर रहा है और उसे जान से मार डालेगा। इतना ही नहीं उसने पप्पू यादव को सलमान खान मामले से अलग रहने की हिदायद दी गई है। धमकी देने वाले का दावा है कि लॉरेंस बिश्नोई जेल में एक लाख रुपये प्रतिघंटा देकर जैमर बंद करवाकर पप्पू यादव से बात करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन पप्पू यादव फोन नहीं उठा रहे हैं। बताया जा रहा है कि धमकी देने वाले ने खुद को लॉरेंस बिश्नोई गैंग का होने का दावा किया है। पप्पू यादव को यह धमकी व्हाट्सएप कॉल के माध्यम से दी गई है।

सांसद पप्पू यादव ने कहा कि लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने आज सुबह करीब 9.25 बजे पप्पू यादव को फोन कॉल कर लफड़े में नहीं पड़ने की बात कहते हुए धमकी दी है. सांसद पप्पू यादव ने इस संबंध में पुलिस से शिकायत करते हुए एक ऑडियो भी शेयर किया है, जिसमें लॉरेंस बिश्नोई गैंग के सदस्य और पप्पू यादव के बीच बातचीत है.

पप्पू यादव के तरफ से जारी इस वीडियो और ऑडियो क्लिप में सुना जा सकता है कि दूसरे तरफ से खुद को लॉरेंस बिश्नोई का आदमी बताते हुए वह कहता है कि आप क्यों इस लफड़े में पढ़ते हो. लॉरेंस बिश्नोई के खिलाफ क्यों बयान देते हो. आपसे कई बार बात करने की कोशिश की गई आप फोन क्यों नहीं उठा रहे हो. उधर से सीधा धमकी मिलता है कि आप इस लफड़े में मत पड़ो.

हालांकि ऑडियो में सांसद पप्पू यादव कहते हैं कि यह राजनीतिक बयान है. लेकिन, दूसरे तरफ से धमकी दी जाती है कि हमारे मामले में मत पड़ो. आप अपना काम करो अपने काम से मतलब रखो. ऑडियो में कहा जा रहा है कि आपको हम लोगों ने बड़ा भाई माना है बड़ा भाई बन के रहो तो अच्छा रहेगा. पप्पू यादव ने बीते दिनों लॉरेंस बिश्नोई को दो टके का अपराधी बताते हुए कहा था कि अगर कानून इजाजत थे तो वह 24 घंटे में इनको सबक सीखा देंगे.

 

वहीं लॉरेंस बिश्नोई गैंग से धमकी मिलने के बाद सांसद पप्पू यादव ने DGP आलोक राज को कॉल कर पूरी घटनाक्रम की जानकारी दी है. डीजीपी से बातचीत के दौरान पप्पू यादव ने उनसे सुरक्षा बढ़ाने की मांग की है. DGP आलोक राज ने पप्पू यादव को पूरे मामले की लिखित शिकायत पूर्णिया रेंज के IG राकेश राठी से करने को कहा है. DGP आलोक राज के बात पर पप्पू यादव ने पूर्णिया रेज के IG राकेश राठी को लिखित शिकायत कर दी है. IG के निर्देश पर पूर्णिया SSP पूरे मामले की जांच में जुटे हैं. पप्पू यादव के पास से धमकी का ऑडियो क्लिप मंगवाकर उसकी जांच शुरू करवा दी है.

  • वहीं सांसद पप्पू यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर बिश्नोई गैंग गैंग के धमकी के बाद सुरक्षा घेरा बढ़ाने का आग्रह किया है. पप्पू यादव ने धमकी के बावजूद बिहार के गृह विभाग और केंद्रीय गृह मंत्रालय पर निष्क्रियता का भी आरोप लगाया है. वहीं पप्पू यादव ने अपनी सुरक्षा Y श्रेणी से बढ़ाकर Z श्रेणी देने की मांग की है।

मध्य प्रदेश कांग्रेस की नई टीम का ऐलान,

मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के करीब दस महीने बाद जीतू पटवारी ने राज्य कार्यकारिणी का ऐलान किया. राज्य कार्यकारिणी के ऐलान में सबसे महत्वपूर्ण 16 सदस्यों वाली कार्यकारी समिति है.

 

इसमें पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे पूर्व सांसद नकुलनाथ को जगह नहीं मिली है. जबकि, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह को जगह दी गई है. इसमें विधानसभा चुनाव हारे कुणाल चौधरी और नीलांशु चतुर्वेदी को भी शामिल किया गया है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने 17 उपाध्यक्ष, 71 महासचिव, 33 स्थायी आमंत्रित सदस्य और 40 विशेष आमंत्रित सदस्य भी बनाए हैं. उनकी टीम में सभी गुटों को साधने की कोशिश की गई है.

कांग्रेस की राज्य कार्यकारिणी में 50 प्रतिशत से ज्यादा सदस्य युवा चेहरे हैं. करीब 15 प्रतिशत पद महिलाओं से भरे गए हैं. प्रदेश कांग्रेस के इतिहास में पहली बार है जब महिलाओं को कार्यकारिणी में सभी पदों पर पर्याप्त जगह दी गई है. जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को भी साधने की कोशिश की गई है. बीजेपी और अन्य दलों से आए लोगों को भी सम्मानजनक स्थान मिला है.

इस कार्यकारिणी में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम है। कुल 177 सदस्यों में केवल 20 महिलाएं शामिल हैं, जो कुल सदस्यों का केवल 11 प्रतिशत है। इनमें 2 उपाध्यक्ष, 12 महासचिव, 1 कार्यकारी सदस्य, 2 स्थाई आमंत्रित सदस्य और 3 विशेष आमंत्रित सदस्य हैं। यह महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की आवश्यकता को दर्शाता है।

कार्यकारिणी में शामिल 17 उपाध्यक्षों में से 7 कमलनाथ के करीबी हैं, जबकि 5 दिग्विजय सिंह के। महामंत्रियों की बात करें तो 71 महासचिवों में से 23 सीधे कमलनाथ के सहयोगी हैं। इस प्रकार, कार्यकारिणी में कमलनाथ और दिग्विजय का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

16 कार्यकारी सदस्यों में कई सीनियर नेताओं का नाम शामिल है:

पूर्व सीएम कमलनाथ
पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार
पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया
पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव
पूर्व नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह
पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह
राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा
पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन
पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल
पूर्व मंत्री ओमकार मरकाम
पूर्व विधायक सत्यनारायण पटेल
पूर्व विधायक निलांशु चतुर्वेदी
पूर्व विधायक कुणाल चौधरी
मनोज चौहान
भूपेन्द्र मरावी

क्या EVM में छेड़छाड़ करके भाजपा जीत रही है चुनाव?

EVM
Photo credit: Social media

2014 के बाद भाजपा 2019 का लोकसभा चुनाव भी बड़ी आसानी से जीत गई थी. उसके बाद भाजपा ने कई राज्यों में भी चुनाव जीत कर अपनी सरकार बनाई. कई विपक्षी दलों द्वारा तथा कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा यह आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं कि देश में भाजपा का विरोध हो रहा है उसके बाद भी भाजपा चुनावी जीत दर्ज करने में कामयाब हो जा रही है. इसके पीछे कहीं ना कहीं EVM को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

कहां जा रहा है कि EVM से चुनाव बंद होने चाहिए और वैलेट पेपर फिर से लाया जाना चाहिए. EVM को लेकर लोगों के मन में कई तरह के भ्रम पैदा हो रहे हैं. कहा जा रहा है कि चुनाव आयोग भी विपक्षी पार्टियों की मांगों को मानने से जानबूझकर इनकार कर रहा है. चुनाव आयोग पर भी कई तरह के आरोप लग रहे हैं. कई लोगों का मानना है कि चुनाव आयोग भी निष्पक्ष नहीं है.

पिछले कुछ विधानसभा चुनावों के दौरान और लोकसभा चुनावों में भी देखा गया कि सोशल मीडिया पर कई तरह के वीडियो वायरल हुए और आरोप लगे कि बीजेपी के नेताओं ने ईवीएम मशीन को ही बदल डाला. हालांकि ऐसे आरोप सिद्ध नहीं हुए. चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था.

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भी EVM का जमकर विरोध हो रहा है, विपक्षी पार्टियों के नेताओं द्वारा तथा दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ताओं तथा समर्थको द्वारा. 2024 का लोकसभा चुनाव बैलट पेपर से कराने की मांग हो रही है. हालांकि चुनाव आयोग द्वारा यह मांग मानी जाएगी इसकी संभावना बिल्कुल भी नहीं है.

क्या EVM के जरिए भाजपा जीत रही है चुनाव?

भाजपा की तरफ से 2024 के लोकसभा चुनावों को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी है और नारा दिया गया है अबकी बार 400 पर यानी बीजेपी 400 से अधिक सीटें 2024 के लोकसभा चुनाव में जितने के दावे अभी से कर रही है. इस पर भी सरकार के विरोधी यह कह रहे हैं कि जब EVM है फिर भाजपा को किस बात की चिंता है. EVM से धांधली की जाएगी इसलिए भाजपा इतने कॉन्फिडेंस के साथ 400 पर का नारा दे रही है, ऐसा आरोप भी सोशल मीडिया के जरिए लोग लग रहे हैं.

हालांकि दूसरा पहलू यह भी है कि भाजपा के नेता तथा कार्यकर्ता जमीन पर जनता से जुड़े हुए हैं. अपनी सरकार की नीतियों को जनता तक ले जा रहे हैं, इसका फायदा भी भाजपा को खूब हो रहा है. इसके अलावा मीडिया के जरिए भी भाजपा का खूब प्रचार हो रहा है. 24 घंटे प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों को मीडिया के जरिए दिखाया जाता है. जनता के दिलों दिमाग में सिर्फ एक चेहरा रहता है जिसे वह टीवी के माध्यम से समाचारों में देखती है और इसका लाभ भी वोटिंग वाले दिन भाजपा को होता है.

दूसरी तरफ विपक्षी पार्टी के नेताओं को मीडिया में स्पेस कम मिलता है. राहुल गांधी “न्याय यात्रा” इस वक्त कर रहे हैं, लेकिन मीडिया में जितना स्पेस राहुल गांधी को मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा है. उनके बयानों को तोड़ मरोड़कर पेश किया जाता है. मीडिया में राहुल गांधी की गलत छवि बनाई गई है और मीडिया के माध्यम से ही राहुल गांधी की गलत छवि देश के कोने-कोने में समाचार माध्यमों से जनता तक गई है, जिसका नुकसान कांग्रेस को और राहुल गांधी को बड़े पैमाने पर हुआ है.

भाजपा को कौन लोग वोट दे रहे हैं?

EVM को लेकर कोई कितने भी आरोप भाजपा पर लगा ले लेकिन जमीनी सच्चाई यह भी है कि समाज के अलग-अलग वर्गों का वोट पाने के लिए भाजपा ने समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच काफी मेहनत की है. मीडिया के माध्यम से भी तथा सोशल मीडिया के माध्यम से भी जनता के बीच भाजपा यह संदेश देने में कामयाब हुई है कि वह उन्हीं की पार्टी है, जनता के लिए ही काम कर रही है तथा समाज के हर वर्ग को सम्मान दे रही है.

दूसरी तरफ विपक्ष सरकार की गलत नीतियों को जनता तक पहुंचने में नाकाम रहा है, उसे मीडिया का भी साथ नहीं मिला है. इसका सीधा लाभ भाजपा को आज की तारीख में हो रहा है. भाजपा को सवर्णों की पार्टी कहा जाता है, लेकिन आज के वक्त में दलित ओबीसी वोट बैंक भाजपा के पास बड़ी संख्या में मौजूद है.

चुनावी राजनीति के हिसाब से इस वक्त विपक्ष के पास भाजपा का कोई तोड़ नजर नहीं आ रहा है. समाज के अलग-अलग वर्गों का वोट लेने के लिए भाजपा समाज के अलग-अलग वर्गों को अपनी सरकार में सम्मान दे रही है तथा जनता के बीच यह संदेश देने में कामयाब हो रही है कि उन्ही के समाज के लोगों को अपनी सरकार में बड़े-बड़े पदों से भाजपा नवाज रही है.

EVM के माध्यम से गड़बड़ी हो रही हो या ना हो रही हो लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि भाजपा को बड़ी तादाद में एक मुस्त वोट समाज के अलग-अलग वर्गों का मिल रहा है. भाजपा जनता को यह संदेश देने में कामयाब हो गई है कि वह जनता की पार्टी है और विपक्ष को जनता के बीच बदनाम करने में भी कामयाब हो गई है, यह बोलकर कि विपक्ष परिवारवाद को बढ़ावा दे रहा है.

हालांकि भाजपा में भी कई परिवारवादी पार्टीयां गठबंधन के माध्यम से जुड़ी हुई है और भाजपा के कई नेताओं के पुत्र भी राजनीति में सक्रिय है, लेकिन विपक्ष को परिवारवाद के नाम पर भाजपा बदनाम करने में कामयाब हो गई है. क्षेत्रीय दलों का अपना वोट बैंक है. अपने समाज के वोट बैंक के नाम पर कई बार क्षेत्रीय दलों ने सरकार बनाई है. लेकिन दलित-ओबीसी बड़ी तादाद में आज की तारीख में भाजपा से जुड़ चुके हैं. उसका सीधा लाभ भाजपा को मिल रहा है. क्षेत्रीय दल जिस वोट बैंक के सहारे सरकार बना लेते थे आज वह वोट बैंक भाजपा की तरफ शिफ्ट हो चुका है.

इसलिए EVM पर संदेह करने के साथ-साथ विपक्ष को जमीन पर उतरकर काम करना होगा, जनता के बीच जाना होगा. जो उसका वोट बैंक आज भाजपा की तरफ शिफ्ट हो चुका है उसे वापस अपने पाले में लाना होगा. जब तक ऐसा विपक्ष नहीं कर पता है तब तक EVM पर हार का पूरा ठीक कर फोड़ना जल्दबाजी होगी. भाजपा के प्रचार का सबसे बड़ा हथियार है मीडिया और इसका तोड़ विपक्ष को निकलना होगा.

Ram Mandir: क्या राम मंदिर के मुद्दे पर सवार होकर 2024 का चुनाव जीत जाएंगे मोदी?

Ram Mandir 2024
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राम मंदिर (Ram Mandir) को लेकर मीडिया में सुर्खियां छाई हुई है. प्रधानमंत्री ने भी अयोध्या का दौरा किया, रोड शो किया. 22 जनवरी को राम मंदिर जनता के लिए खोल दिया जाएगा. उसकी तैयारी भी जोर-शोर से की जा रही है. देश के तमाम जनता से जुड़े हुए मुद्दे इस वक्त बौने नजर आ रहे हैं. माहौल ऐसा बनाया जा रहा है जैसे राम मंदिर का द्वारा जनता के लिए खुलते ही जनता की समस्याएं खत्म हो जाएंगी.

तथाकथित राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा और मीडिया द्वारा ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है जैसे विपक्ष 2024 के चुनाव में मोदी के सामने धराशाई हो जाएगा. राम मंदिर (Ram Mandir And 2024 Election) के मुद्दे को अभी से जोर-शोर से भुनाने की कोशिश एक बार फिर से की जा रही है. लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या एक बार फिर से राम मंदिर के नाम पर और अयोध्या के नाम पर जनता मोदी को वोट देगी?

क्या सच में जनता अपने मुद्दों को भुलाकर, विपक्ष ने जो उनके साथ दिया है उसे भूलकर मंदिर (Ayodhya Ram Mandir) के मुद्दे पर एक मुस्त वोट अपना बीजेपी के पाले में दे देगी? राम मंदिर के उद्घाटन के बाद क्या सच में जनता को उसकी समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं रहेगा? महंगाई उसके लिए कोई मुद्दा नहीं रहेगी? महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे अपराध मुद्दा नहीं रहेंगे? बेरोजगारी मुद्दा नहीं होगी?

क्या एक बार फिर से राम मंदिर के उद्घाटन के बाद जनता के जरुरी मुद्दे भावनाओं पर हावी हो जाएंगे और 2024 का लोकसभा चुनाव बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ जीत कर सत्ता में आ जाएगी?

मीडिया में अभी से ऐसा माहौल बनाने की कोशिश मौजूद सत्ता द्वारा हो रही है कि अब जनता अपने तमाम मुद्दों को दरकिनार करके राम मंदिर के मुद्दे पर एकजुट होकर वोट देगी और विपक्ष का नामोनिशान खत्म हो जाएगा. मीडिया से जुड़े हुए तमाम बीजेपी समर्थित पत्रकार अभी से विपक्ष को खत्म बता रहे हैं. राम मंदिर के मुद्दे पर और अयोध्या से जुड़ी हुई खबरों पर 2024 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए अभी से बीजेपी को प्रचंड लीड देने की कोशिश कर रहे हैं.

इसके अलावा मंदिर के मुद्दे पर विपक्ष को दूसरे समुदाय के सामने बदनाम करने की भी कोशिश की जा रही है. मंदिर के उद्घाटन पर निमंत्रण को लेकर भी विपक्ष को बदनाम करने की कोशिश हो रही है. अगर विपक्ष निमंत्रण स्वीकार करता है तो दूसरे समुदाय का वोट ना मिले ऐसा माहौल भी बनाने की कोशिश हो रही है और अगर स्वीकार नहीं करता है तो हिंदुओं की नफरत का शिकार विपक्ष हो ऐसा भी माहौल बनाने की कोशिश हो रही है.

लेकिन इसके विपरीत असल स्थिति यह है कि मंदिर के मुद्दे के सहारे एक बार फिर से बीजेपी 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने का ख्वाब देख रही है और इसके लिए पूरी ताकत झोंक दी है. लेकिन सच्चाई यह है कि विपक्ष के गठबंधन से बीजेपी की नींद उड़ी हुई है. अगर विपक्ष पूरे देश में बीजेपी के उम्मीदवारों के सामने अपना एक साझा उम्मीदवार उतारने में सफल हुआ तो कहीं ना कहीं तीसरी बार बीजेपी के सत्ता में आने का ख्वाब टूट सकता है और इसीलिए मंदिर के मुद्दे को हवा देकर अभी से माहौल तैयार करने की कोशिश हो रही है.

2024 Lok Sabha Election: बदलाव के मूड में क्यों नहीं दिखाई दे रही है कांग्रेस?

2024 Lok Sabha Election
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तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों की हार के बाद ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस में बड़े स्तर पर बदलाव देखने को मिलेगा. ऐसा लग रहा था कि कोई हार की जिम्मेदारी लेगा. कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक बदलाव देखने को मिलेगा और ऐसा लग रहा था कि नेतृत्व द्वारा कुछ सख्त फैसले लिए जाएंगे और 2024 का लोकसभा चुनाव (2024 Lok Sabha Election) जीतने के लिए कोई ठोस रणनीति पर काम शुरू होगा.

लेकिन जिस तरह से राज्यों के प्रभारी बदले गए हैं या यूं कहें कि एक राज्य से हटाकर दूसरे राज्य में फिट किए गए हैं या फिर जिन्होंने प्रभारी रहते हुए अपने राज्यों के लिए कुछ काम नहीं किया उन्हें ही फिर से जिम्मेदारी दे दी गई है, उससे तो ऐसा ही लग रहा है कि बदलाव के मूड में दिखाई नहीं दे रही है कांग्रेस या फिर प्रभारियों की नियुक्ति के स्तर पर अभी भी कांग्रेस के अंदर इच्छा शक्ति का अभाव है. या अपने पुराने ही नेताओं को फिट करने में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और युवा नेताओं को मौका देने के मूड में नहीं है या फिर दे नहीं पा रही है.

सचिन पायलट को जरूर छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी दी गई है लेकिन सचिन के कद के नेता को छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य की जिम्मेदारी देकर कहीं ना कहीं ऐसा लग रहा है है कि यह सिर्फ खानापूर्ति है या फिर उन्हें राजस्थान से दूर करने की कोशिश की गई है. लोकसभा चुनावों को देखते हुए यह उम्मीद जताई जा रही थी कि राजस्थान में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर कांग्रेस अपने पुराने नेताओं को सख्त संदेश देने की कोशिश करेगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

देखा यही जा रहा है पिछले कुछ सालों से कि बड़े बदलावों के नाम पर उन्ही पुराने नेताओं की अदला-बदली हो रही है, उन्हें पुराने नेताओं को जिम्मेदारियां दी जा रही हैं. ऐसा लग रहा कि लगातार मिल रही असफलताओं के बावजूद नए प्रयोग न करने में कांग्रेस चैंपियन बनती जा रही है. नई पीढ़ी को जिम्मेदारी देने में अभी भी कांग्रेस कंजूसी कर रही है, जिसका खामियाजा चुनावी हार के रूप में लगातार देखने को मिल रहा है.

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी अविनाश पांडे को दी गई है, जो कहीं भी इंचार्ज के रूप में अभी तक सफल नहीं हुए हैं. हालांकि प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश के प्रभार से मुक्त किया गया है इसको लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ता जरूर खुश होंगे, क्योंकि प्रियंका की टीम खासकर संदीप सिंह और उनके लोग, उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ताओं को निराश कर रह थे. संदीप सिंह की टीम पर टिकट बेचने के भी अंदरुनी आरोप लगाते रहे थे.

कांग्रेस ने अपने राज्यों के प्रभारियों में बदलाव किया है, लेकिन लिस्ट देखकर कहीं से भी जनता को संदेश देने जैसा कुछ दिखाई नहीं देता है. कार्यकर्ताओं में इस लिस्ट को देखकर भी कोई जोश उत्पन्न होगा इसकी संभावना कम है. प्रियंका गांधी को किसी भी राज्य का प्रभार नहीं दिया गया है यह आश्चर्य पैदा कर रहा है. कुल मिलाकर कई पुराने मोहरों को नई जगह फिट कर दिया गया है.

क्या कांग्रेस 2024 का लोकसभा चुनाव, जिन राज्यों में उसका सीधा मुकाबला भाजपा से है उसमें पहले से बेहतर प्रदर्शन कर पाएगी? राजस्थान किसके भरोसे कांग्रेस जीत सकती है या फिर मध्य प्रदेश किसके भरोसे कांग्रेस जीतने का सोच सकती है? मध्य प्रदेश में जीतू पटवारी को कमान प्रदेश अध्यक्ष की दी गई है और उनसे उम्मीद भी है कि लोकसभा तक वह कांग्रेस को फिर से जिंदा करेंगे. लेकिन क्या छत्तीसगढ़ सचिन पायलट को भेज कर राजस्थान के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को निराश नहीं किया गया है?

उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अविनाश पांडे को भेजकर कांग्रेस क्या मैसेज देना चाहती है? कांग्रेस कार्यकर्ताओं को? उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य जहां से 80 लोकसभा सिम आती है वहां अविनाश पांडे जैसे प्रभारी को प्रभार देने से पहले कांग्रेस ने उनका पिछला रिकॉर्ड या फिर यूं कहें की परफॉर्मेंस चेक की थी?

Congress: क्या राहुल गांधी के इस फैसले से बदल जाएगी उत्तर प्रदेश कांग्रेस की दशा?

priyanka gandhi Congress
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पिछले विधानसभा चुनावों में बड़ी हार के बाद कांग्रेस (Congress) के समर्थक और कार्यकर्ता निराश हैं. कांग्रेस में लंबे समय से कोई बड़ा फेरबदल नहीं हुआ है. मल्लिकार्जुन खड़गे के अध्यक्ष बनने के बाद से ही कांग्रेस के अंदर बड़े फिर बादल की उम्मीद की जा रही थी जो अभी तक नहीं हो सकी थी.

बात अगर उत्तर प्रदेश कांग्रेस की की जाए तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कहीं दिखाई नहीं देती है. अजय राय को अध्यक्ष बनने के बाद से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को ऐसी उम्मीद थी कि उत्तर प्रदेश में नई ऊर्जा का संचार होगा. अजय राय यूपी जोड़ो यात्रा भी लेकर निकले हुए हैं, लेकिन फिर भी मतदाता प्रभावित नजर नहीं आ रहा है.

अब उत्तर प्रदेश को लेकर कांग्रेस नेतृत्व ने या यूं कहीं की राहुल गांधी ने एक बड़ा फैसला लिया है. उत्तर प्रदेश में प्रभारी पद संभाल रही प्रियंका गांधी की जगह अविनाश पांडे को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया है. अब अविनाश पांडे यूपी प्रभारी होंगे.

उत्तर प्रदेश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं और कई नेताओं को उत्तर प्रदेश के अंदर प्रियंका गांधी के चारों तरफ जो मंडली घूमती थी उनसे काफी शिकायत रहती थी. ऐसा कहा जाता था कि जेएनयू से जुड़े हुए लोग प्रियंका गांधी के सलाहकार हैं और उत्तर प्रदेश में वह कोई भी जमीनी फैसला नहीं लेने देते हैं और प्रियंका से भी नेताओं और कार्यकर्ताओं को मिलने से पहले उन्ही सलाहकारों से परमिशन लेनी पड़ती थी.

अब प्रियंका गांधी को रिप्लेस अविनाश पांडे से किया गया है और ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि अगर वह स्वतंत्र रूप से फैसले लेते हैं तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस काफी अच्छा कर सकती है.

वही बात करें तो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने संगठन में यह बड़ा फेर बदल किया है. सचिन पायलट को छत्तीसगढ़ में बड़ी जिम्मेदारी दी गई है. सचिन को छत्तीसगढ़ का प्रभारी महासचिव नियुक्त किया गया है.

आपको बता दें कि 21 दिसंबर को ही कांग्रेस वर्किंग कमेटी की एक बड़ी बैठक हुई थी. इस बैठक में पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद हिंदी पट्टी के तीन राज्यों को गवाने को लेकर विस्तार से चर्चा हुई थी और इस हार पर समीक्षा भी की गई थी. इस बैठक के बाद अब कांग्रेस संगठन में बड़ा फेरबदल देखा गया है.

Salaar Box Office Collection: प्रभास की ‘सालार’ ने रच दिया इतिहास

Salaar Box Office Collection
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Salaar Box Office Collection: प्रभास की बहु प्रतीक्षित फिल्म ‘सालार’ (Salaar) रिलीज हो चुकी है. इस फिल्म ने रिलीज होते ही एक बार फिर से तहलका मचा दिया है. इस फिल्म का डायरेक्शन लाजवाब है. प्रशांत नील ने कहानी और किरदारों के साथ जो कमाल किया है वह मजेदार है. फिल्म का अंत जहां छोड़ा है आपके दिमाग में सवाल उठाता रहेगा कि अब क्या और उन्होंने इशारा भी कर दिया है कि सालार का अगला पार्ट धांसू रहने वाला है.

एक्टिंग के मामले में प्रभास और पृथ्वी राज सुकुमारन को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी है. क्योंकि प्रशांत नील ने डायरेक्शन के जरिए उन पर कतई बोझ नहीं आने दिया है. प्रभास और पृथ्वीराज अपने रोल में जमते हैं.

यह फिल्म बड़े थिएटर के लिए बनी है. प्रभास की इस फिल्म में पृथ्वीराज की एक्टिंग आपका दिल जीत लेगी, लेकिन उन्हें देखने के लिए फिल्म में आपको लंबा इंतजार करना पड़ेगा. कहानी नई बिल्कुल नहीं है. दो दोस्तों के बीच की कहानी सालों से देखते आ रहे हैं, लेकिन कहानी को मिली ट्रीटमेंट के लिए आप यह फिल्म जरूर देख सकते हैं.

प्रभास के फैंस फिल्म जरूर देख सकते हैं, क्योंकि तीन फिल्मों के इंतजार के बाद आप कह सकते हैं कि डार्लिंग इस बैक. पृथ्वीराज की एक्टिंग के लिए भी फिल्म को मौका दिया जा सकता है. एक्शन फिल्म देखने वालों को यह फिल्म जरूर पसंद आएगी.

रिलीज होते ही प्रभास की सालार फिल्म की दीवानगी दुनिया भर में देखने को मिल रही है. फिल्म ने पहले ही दिन के कलेक्शन से बड़ी फिल्मों को पीछे कर दिया है. बॉक्स ऑफिस पर रिलीज के साथ ही प्रभास में कब्जा कर लिया है. इसी के साथ यह फिल्म प्रभास के करियर की सबसे बड़ी ओपनर साबित हुई है.

270 करोड़ (Salaar Box Office Collection) के बजट में बनी इस फिल्म ने एडवांस बुकिंग में ही करीब 50 करोड रुपए का बिजनेस कर लिया था. रिलीज के पहले दिन फिल्म ने केवल भारत में ही 95 करोड़ का जबरदस्त कारोबार कर लिया था. पहले ही दिन वर्ल्डवाइड सालार में 175 करोड रुपए का दमदार आंकड़ा छुआ था. इसी के साथ यह फिल्म प्रभास के करियर की सबसे बड़ी ओपनर फिल्म साबित हुई है.

क्या Shivraj Singh Chouhan ने कर ली है बड़ी तैयारी?

Shivraj Singh Chouhan

मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव को जीतने के बीजेपी ने वहां अपना मुख्यमंत्री बना लिया. लंबे इंतजार के बाद बीजेपी ने मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान किया लेकिन सबसे अधिक आश्चर्यचकित करने वाली बात यह थी कि उन्होंने अपने अनुभवी और लोकप्रिय नेता शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) को मुख्यमंत्री पद से हटाकर नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाया है.

राजनीतिक पंडितों का मानना था कि जिस वक्त बीजेपी का दिल्ली नेतृत्व मध्य प्रदेश में हार मान चुका था और अपनी रैलियों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan in MP Election 2023) का नाम तक नहीं ले रहा था उस वक्त एक दिन में कई कई रैलियां करके बीजेपी के लिए शिवराज ने चुनाव प्रचार किया और बीजेपी की सरकार मध्य प्रदेश में फिर से बनवाई और भारी बहुमत से बनवाई, लेकिन सरकार बनने के बाद बीजेपी ने उन्हें ही किनारे कर दिया.

राजनीतिक विश्लेषक इस बात को मानते हैं कि मध्य प्रदेश में बीजेपी की जीत सिर्फ और सिर्फ शिवराज के कारण हुई है. नहीं तो चुनावों से पहले बीजेपी सरकार में वापसी करती हुई दिखाई नहीं दे रही थी. लेकिन जिस तरह शिवराज ने दिन-रात एक करके लगातार चुनावी रैलियां की, घोषणाएं की और अपने कामों को जनता के बीच गिनाए, उससे भाजपा सत्ता में वापसी करने में कामयाब रही. खास तौर पर लाडली बहन योजना काफी प्रसिद्ध हुई मध्य प्रदेश में और इस योजना का भी सरकार वापसी में योगदान माना जा रहा है.

अब शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan Politics) मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं है. उनकी जगह पर बीजेपी ने मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया है. लेकिन शिवराज सिंह चौहान के मन में इस बात की कसक कहीं ना कहीं दिखाई दे रही है कि इतनी मेहनत के बाद भी, इतने भारी बहुमत के बाद भी बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया. हालांकि शिवराज सिंह चौहान ने नेतृत्व के खिलाफ अभी तक कोई बयान नहीं दिया है.

शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan Former CM) मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी लगातार जनता के बीच जा रहे हैं, जनता से मिल रहे हैं. उन्हें जनता का भारी समर्थन मिलता हुआ भी दिखाई दे रहा है. सोशल मीडिया पर वह फोटोस और वीडियो पोस्ट करके इस बात का एहसास दिला रहे हैं की जनता के लिए उनके मन में अथाह प्रेम और सेवा का भाव है. सोशल मीडिया पर भी शिवराज सिंह चौहान काफी एक्टिव है. खेत की जुताई करते हुए भी उन्होंने एक वीडियो पोस्ट की है.

सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं जिसमें मध्य प्रदेश की जनता, खास तौर पर महिलाएं उनके लिए संदेश दे रही हैं. रो रही हैं. शिवराज सिंह चौहान का भी एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वह जनता के बीच में महिलाओं से घिरे हुए हैं और रोते हुए नजर आ रहे हैं.

Shivraj Singh Chouhan Twitt

जिस तरह से उन्हें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी से बीजेपी के नेतृत्व ने हटाया है वह मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के समर्थकों को रास नहीं आ रहा है. हालांकि शिवराज ने अभी तक पार्टी या फिर अपने नेतृत्व के खिलाफ कोई ऐसा बयान नहीं दिया है जिससे ऐसे कयास लगाए जाएं कि वह कुछ बड़ा कदम पार्टी के खिलाफ उठा सकते हैं. लेकिन जिस तरह से वह लगातार जनता के बीच पहले की तरह एक्टिव है, उससे कहीं ना कहीं इस बात का कयास जरूर लगाया जा रहा है कि वह हार मानने वाले नहीं है.

यह सच है कि बीजेपी के ही नेता शिवराज से खफा नजर आ रहे थे. मध्य प्रदेश तथा दिल्ली नेतृत्व शिवराज सिंह चौहान को वह तवज्जो देता हुआ दिखाई नहीं दे रहा था पिछले कुछ वर्षों में. लेकिन शिवराज ने अपने दम पर कहीं ना कहीं बीजेपी की सत्ता में वापसी करवा दी. पिछले दिनों बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय ने एक बयान दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में लाडली बहन योजना नहीं थी फिर भी हम जीत गए, यह जीत मोदी जी के कारण है. कहीं ना कहीं वह चौहान की लाडली बहन योजना को मध्य प्रदेश में बीजेपी की जीत का श्रेय नहीं देना चाह रहे थे.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मध्य प्रदेश बीजेपी में शिवराज को नापसंद करने वाले नेताओं की भरमार थी. लेकिन जब से बीजेपी के मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान हुआ है और शिवराज को मुख्यमंत्री पद से बीजेपी नेतृत्व में हटाया है उसके बाद से ही शिवराज लगातार जनता के बीच एक्टिव है. सोशल मीडिया के जरिए बयान बाजी कर रहे हैं. आने वालों दिनों मे उनकी राजनीति क्या करवट ले रही है इस पर सभी की निगाहें बनी रहनी चाहिए.

जिस तरह से मुख्यमंत्री की कुर्सी जाने के बाद भी शिवराज सिंह चौहान जनता के बीच जा रहे हैं, मिल रहे हैं और अपने बयान दे रहे हैं उसे इतना जरूर कहा जा सकता है कि शिवराज की राजनीति पर नजर बनाकर रखने की जरूरत है. आने वाले कुछ महीनो में या फिर 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले या फिर उसके बाद चौहान की राजनीति जरूर बदली हुई नजर आ सकती है.

2024 Lok Sabha Election: क्या अब भी 2024 में मोदी को हराया जा सकता है?

2024 Lok Sabha Election Rahul Modi
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2024 Lok Sabha Election: मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान को नया मुख्यमंत्री मिल चुका है. तीनों ही चेहरे एकदम नए हैं और बीजेपी ने सारे सूत्रों को दरकिनार करते हुए एकदम नए चेहरों को मुख्यमंत्री बनाया है. बीजेपी ने जातिगत समीकरण को देखते हुए तीनों के नाम आगे किए हैं.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2024 लोकसभा चुनाव (2024 Lok Sabha Election) की तैयारीयों के लिहाज से बीजेपी ने यह मास्टर स्ट्रोक खेला है, जिसमें तमाम जातिय समीकरण को साधते हुए एक तरह से विपक्षी गठबंधन को अभी से धराशाई करने की कोशिश बीजेपी की तरफ से की गई है.

सवाल यह भी उठने लगा है कांग्रेस को लेकर कि, अगर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनती तो क्या भूपेश बघेल, कमलनाथ और अशोक गहलोत को दरकिनार करते हुए दूसरे चेहरों को कांग्रेस नेतृत्व मुख्यमंत्री बन पाता? और अगर बना भी देता तो क्या कांग्रेस में बगावत नहीं होती. शांति से कांग्रेस के सीनियर नेता नेतृत्व की बातों को तवज्जो देते और शांत रहते, मर्यादा में रहते, अनुशासन में रहते?

तीनों ही राज्यों में कांग्रेस हार के कारणो पर समीक्षा बैठक करने के बाद कोई बड़ा निर्णय अभी तक नहीं कर पाई है. क्या पुराने चेहरों को पीछे करते हुए नए चेहरों को आगे लाने का प्रयास अभी भी कांग्रेस कर पाएगी? कांग्रेस का नेतृत्व इतनी हिम्मत दिखा पाएगा?

इसके अलावा अभी भी कांग्रेस के सामने सवाल यह है कि अगर अगले साल हरियाणा में कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब होती है तो क्या वह अपने सीनियर लीडर भूपेंद्र सिंह हुड्डा को नजरअंदाज करके नया चेहरा ला पाएगी?

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में 2014 के बाद से ही बीजेपी ने कई राज्यों में बड़े स्तर पर बदलाव किया है और बीजेपी में बगावत देखने को नहीं मिली है. बीजेपी के सीनियर नेता भी अनुशासन में रहते हैं, अपने नेतृत्व के खिलाफ बयान बाजी नहीं करते हैं. लेकिन ठीक इसके उलट कांग्रेस का सीनियर नेता हो या फिर प्रदेश स्तर का नेता हो, अगर उसके मन मुताबिक फैसला नहीं होते हैं तो मीडिया में बयान बाजी होती है और नेतृत्व के खिलाफ बगावत देखने को मिलती है.

इस वक्त देखने को यहीं मिल रहा है कि बीजेपी नेतृत्व का अपने नेताओं पर पूरा कंट्रोल है. बीजेपी का कोई भी नेता मोदी और शाह के खिलाफ, उनके फैसलों के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. वहीं कांग्रेस का नेतृत्व काफी लाचार नजर आता है अपने नेताओं के सामने.

2024 Lok Sabha Election

क्या ऐसे 2024 का लोकसभा चुनाव (2024 Lok Sabha Election BJP vs Congress) कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष जीत पाएगा? एक सच्चाई यह भी है कि बिना कांग्रेस के विपक्ष बीजेपी को हरा भी नहीं सकता है. इसलिए जरूरी है कि कांग्रेस अपने अंदर बड़े बदलाव करें. उन कार्यकर्ताओं को तवज्जो देना शुरू करें जिनके दम पर कांग्रेस है, ना कि उन नेताओं के दम पर जिनकी कोई विचारधारा नहीं है, जो खुद पद के लिए पार्टी से जुड़े हुए हैं.

कांग्रेस का समर्थन करने वाली जनता और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को यह उम्मीद थी कि तीनों राज्यों में हार के बाद पार्टी कुछ बड़ा फैसला लेगी, हार के लिए जिम्मेदार नेताओं के खिलाफ एक्शन लेगी. लेकिन समीक्षा बैठक तक मामला सीमित रहा. इससे समर्थक और कार्यकर्ता काफी निराश हैं. इन्हें भी ऐसा लग रहा कि पार्टी जीतने के लिए कुछ कर नहीं रही है.

कुछ लोग ईवीएम का भी मामला है उठा रहे हैं. अगर मामला वाकई में ईवीएम धांधली का है तो फिर इस पर भी पार्टी को सड़कों पर उतरना होगा. इसके खिलाफ भी ठोस आंदोलन करना होगा. पार्टी के बड़े नेताओं को बोलना होगा. अगर ऐसा नहीं कर रहे हैं तो फिर ईवीएम के बहानों तले अपनी नाकामी को छुपाया नहीं जा सकता, अपने नेताओं के नकारेपन को दूर किए बिना कांग्रेस केंद्र की सत्ता में नहीं आ सकती.

अगर 2024 में कांग्रेस प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती देना चाहती है या फिर सत्ता से बेदखल करना चाहती है तो उसे कठोर फैसले लेने होंगे, अपने अंदर बड़े स्तर पर बदलाव करना होगा. कार्यकर्ताओं को तवज्जो देनी होगी. उन नेताओं के हाथों में राज्यों की कमान देनी होगी जो जनता के बीच जनाधार रखते हैं सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने का माद्दा रखते हैं. जनता के बीच जाकर परिवर्तन लाना होगा, ना की बयान बाजी से क्रांति की उम्मीद करनी होगी.

Bhajan Lal Sharma: भजनलाल शर्मा होंगे राजस्थान के नए मुख्यमंत्री

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तमाम तरह के कयासों को दरकिनार करते हुए भाजपा ने मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में नए नाम का ऐलान कर दिया है. इसी कड़ी में आज राजस्थान में मुख्यमंत्री (Bhajan Lal Sharma) के नाम का ऐलान हुआ है. आपको बता दें कि भजनलाल शर्मा संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं.

राजस्थान में मुख्यमंत्री को लेकर लगातार सस्पेंस बना हुआ था. तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे थे. यह भी कहा जा रहा था कि क्या महारानी की राजस्थान में वापसी होगी या उन्हें दरकिनार कर दिया जाएगा.

अब इन तमाम कयासों को विराम देते हुए भाजपा ने मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान कर दिया है. भजनलाल शर्मा को भाजपा ने राजस्थान का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया है. भजनलाल शर्मा अमित शाह की काफी करीबी माने जाते हैं. ब्राह्मण चेहरे को राजस्थान में बीजेपी ने आगे किया है.

विधायक दल की बैठक के बाद भाजपा ने भजनलाल शर्मा को राजस्थान का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया है. यह भी एक तरह से बीजेपी का चौंकाने वाला फैसला है. क्योंकि कई नाम सामने आ रहे थे. तमाम नामो पर कयास लगाया जा रहे थे. लेकिन बीजेपी ने एक बार फिर से तमाम सूत्रों को दरकिनार करते हुए भजनलाल शर्मा को राजस्थान का मुख्यमंत्री बना दिया है.

भजन लाल शर्मा पहली बार विधायक चुनकर आए हैं और उन्हें भाजपा ने मुख्यमंत्री बना दिया है. इसके अलावा राजस्थान में बीजेपी ने दो उपमुख्यमंत्री बीजेपी ने बनाया है. दिया सिंह को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है. प्रेमचंद बैरवा दूसरे उपमुख्यमंत्री होंगे.

छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के बाद अब राजस्थान में क्या होगा?

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मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने तस्वीर साफ कर दी है. रमन सिंह और शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री न बना कर भाजपा ने कई बड़े संकेत भी दे दिए हैं और अब राजस्थान पर फैसला आना बाकी है.

क्या वसुंधरा राजे को भी दरकिनार करके किसी नए चेहरे को भाजपा आलाकमान मुख्यमंत्री बनाएगा इसको लेकर सस्पेंस बना हुआ है.

भाजपा नेतृत्व ने जिस तरह से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में फैसला लिया है उससे राजस्थान के भाजपा के दिग्गज नेताओं की नींद उड़ गई है. इसकी वजह पुराने चेहरों को रिप्लेस कर नए चेहरे को जिम्मेदारी सौपना है.

राजस्थान में अभी मुख्यमंत्री का ऐलान होना बाकी है. आगे क्या होने वाला है इसकी जानकारी अभी भाजपा नेतृत्व के अलावा किसी के पास नहीं है. कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा राजस्थान में भी छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की तरह ही प्रयोग कर सकती है और किसी नए चेहरे को राजस्थान की कमान दे सकती है. पुराने चेहरों की छुट्टी तय मानी जा रही है.

राजस्थान के नतीजे आने के बाद से ही वसुंधरा राजे की सक्रियता बढ़ी हुई दिखाई दे रही है. लेकिन जिस तरह से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में फैसला हुआ है उससे ऐसा मालूम होता है कि शायद ही भाजपा का नेतृत्व उन्हें राजस्थान की जिम्मेदारी दें. लेकिन सवाल यह भी है कि क्या वसुंधरा इतनी आसानी से मान जाएगी?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव देखते हुए तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान कर रही है. जातीय समीकरण को मध्य में रखकर बीजेपी 2024 का चुनाव जीतने की तैयारी कर रही है. इसी को देखते हुए मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान भी काफी मंथन के बाद हो रहा है.

Akash Anand: मायावती ने घोषित किया अपना उत्तराधिकारी

Akash Anand Mayawati
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बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीम लीडर मायावती (Mayawati) ने आज लखनऊ में आयोजित पार्टी बैठक के दौरान एक बहुत बड़ा फैसला (Akash Anand) ले लिया है. सूत्रों के मुताबिक बीएसपी की मीटिंग में मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद (Akash Anand) को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है.

आकाश आनंद लंदन से मास्टर आफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (MBA) कर चुके हैं. आकाश की राजनीति में एंट्री 2017 में हुई थी, जब वह सहारनपुर रैली में पहली बार मायावती के साथ मंच साझा करते हुए नजर आए थे. आकाश फिलहाल पार्टी के नेशनल कोऑर्डिनेटर भी हैं.

आकाश आनंद के सियासी सफर की बात करें तो वह 2017 में राजनीति में आए थे. मायावती ने 2017 में एक बड़ी रैली कर आकाश आनंद को राजनीति में लॉन्च किया था. आपको बता दें की आकाश आनंद की लांचिंग के बाद यूपी में बहुजन समाज पार्टी लगातार कमजोर हुई है.

2017 और 2019 में पार्टी को बड़ी हार झेलनी पड़ी, वहीं 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव में बहुजन समाज पार्टी महज एक सीट पर सिमट गई. बहुजन समाज पार्टी पर यह भी आरोप लगाते रहे हैं कि वह बीजेपी के दबाव में फैसला लेती है अभी तक आकाश आनंद पार्टी के लिए कोई बड़ा करिश्मा नहीं कर पाए हैं.

उत्तर प्रदेश में लगातार बहुजन समाज पार्टी सिमटती जा रही है और पिछले कुछ फैसले ऐसे हुए हैं जिन पर आरोप लगे हैं कि यह सब कुछ बीजेपी के दबाव में हुआ है. अब देखना यह होगा कि बहुजन समाज पार्टी को फिर से नई ऊंचाइयां देने के लिए आकाश आनंद क्या तरीके अपनाते हैं.

MP CM: शिवराज सिंह चौहान क्या मैसेज देने की कोशिश कर रहे हैं?

MP CM
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मध्य प्रदेश के विधानसभा (M.P. Election) चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 163 सीटों पर जीत दर्ज की है, लेकिन अभी तक मुख्यमंत्री (MP CM) का चेहरा सामने नहीं आया है. मध्य प्रदेश में क्या शिवराज सिंह चौहान ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे या कोई नए चेहरे के साथ बीजेपी आएगी इसको लेकर अभी संदेह बना हुआ है.

दूसरी तरफ शिवराज सिंह चौहान लोगों से लगातार संपर्क कर रहे हैं और सोशल मीडिया के जरिए भी पोस्ट साझा कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ और राजस्थान के साथ-साथ मध्य प्रदेश की सियासत पर भी लोगों की नज़रें टिकी हुई है और सस्पेंस भी बना हुआ है.

शिवराज सिंह चौहान सोशल मीडिया पर पोस्ट कविता और तस्वीरों के जरिए भी अपने केंद्रीय नेतृत्व को संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वही मध्य प्रदेश के लोकप्रिय नेता है और 2024 में बीजेपी के एजेंडे में फिट बैठते हैं.

इसके अलावा विधानसभा चुनाव जीतने के बाद से ही शिवराज सिंह चौहान लगातार मध्य प्रदेश के उन इलाकों का दौरा कर रहे हैं जहां पर भाजपा कमजोर है. चाहे वह छिंदवाड़ा कांग्रेस नेता कमलनाथ का गढ़ हो या फिर दिग्विजय सिंह के गढ़ राघवगढ़ ही क्यों ना हो.

शिवराज सिंह चौहान की गतिविधियों को देखकर साफ जाहिर हो रहा है कि वह किसी भी तरह मध्य प्रदेश का फिर से मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं और वह इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व का ध्यान भी अपनी और आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं. अब देखना है यह होगा कि केंद्रीय नेतृत्व फिर से उन्हें मध्य प्रदेश की जिम्मेदारी देता है या फिर किसी नए चेहरे को मौका मिलता है.

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