Saturday, August 15, 2026
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युवाओं के भविष्य से खिलवाड़: एमपी बना पेपर लीक का गढ़!

कांग्रेस की प्रेसवार्ता की फोटो

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, पूर्व मंत्री प्रियव्रत सिंह और विधायक जयवर्धन सिंह ने एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और ‘नीट’ घोटाले को लेकर केंद्र सरकार को जमकर घेरा। नेताओं ने साफ कहा कि यह लड़ाई किसी एक पार्टी की नहीं, बल्कि देश के करोड़ों बच्चों और उनके माता-पिता के भविष्य की है।

सबसे बड़ा दर्द: नीट घोटाला और मासूमों की आत्महत्या
कांग्रेस ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार की लापरवाही को बच्चों की मौत का जिम्मेदार ठहराया। नीट पेपर लीक से निराश होकर देश के 17 होनहार छात्रों को आत्महत्या जैसा खौफनाक कदम उठाना पड़ा। इनमें मध्य प्रदेश की आकांक्षा चतुर्वेदी और अवंतिका मौर्य समेत राजस्थान, यूपी और तमिलनाडु के बच्चे शामिल हैं। नेताओं ने आरोप लगाया कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के रहते हुए जमकर धांधली हुई। पिछले 10 सालों में देश में 85 बार अलग-अलग परीक्षाओं के पेपर लीक हुए। नीट का पेपर ही 4 बार लीक हुआ और एक-एक पेपर 30-30 लाख रुपये में बेचा गया, जिससे 2 करोड़ से ज्यादा छात्र परेशान हुए।

“घोटालों की नर्सरी बन चुका है मध्य प्रदेश-जीतू पटवारी”
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि राज्य में व्यापम से लेकर पटवारी भर्ती तक, हर परीक्षा में घोटाला हुआ है। साल 2013 का व्यापम कांड हो, पटवारी भर्ती हो, कृषि अधिकारी या नर्सिंग घोटाला—एमपी में हर जगह धांधली की जड़ें हैं। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने व्यापम के बड़े आरोपियों (जैसे अजय गोयनका और सुधीर शर्मा) को बचाने का काम किया और उनके खिलाफ कोर्ट भी नहीं गई। व्यापम के पूर्व एग्जाम कंट्रोलर और मुख्य आरोपी सुधीर भदौरिया को सजा मिलने के बजाय आरजीपीवी का प्रमुख बना दिया गया। वहीं विवादित राजेश लाल मेहरा को MPPSC का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

ऐसे कम की जा रही है बेरोजगारी!
कांग्रेस ने सरकार के रोजगार के दावों को पूरी तरह झूठा बताया कि, प्रदेश में पढ़े-लिखे बेरोजगारों की संख्या 1 करोड़ से ऊपर निकल चुकी है। सरकार युवाओं को असलियत में नौकरी देने के बजाय, केवल सरकारी पोर्टल और कागजों से उनके नाम काटकर आंकड़े कम दिखा रही है।

कांग्रेस की बड़ी मांग: सबको मिले KG to PG मुफ्त शिक्षा
बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए केजी से लेकर पीजी तक की पूरी शिक्षा को हर नागरिक के लिए बिल्कुल मुफ्त किया जाए।

मैदान में उतरेगी कांग्रेस: ‘GENZ CYCLOTHON’ की शुरुआत
युवाओं को जागरूक करने और शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए पूर्व मंत्री प्रियव्रत सिंह ने एक बड़े अभियान का ऐलान किया। नई पीढ़ी को उनके हक के प्रति जगाने के लिए GENZ CYCLOTHON निकाली जाएगी।
यह यात्रा 14 और 15 जुलाई को होगी। इसकी शुरुआत इंदौर से होगी, जो देवास, आष्टा और सीहोर से गुजरते हुए भोपाल में खत्म होगी।

बुलडोजर राज बनाम आदिवासी अधिकार

घटनास्थल पर बेघर होकर बिलखता बच्चा।

दिल्ली। राजस्थान के बाड़मेर में आदिवासी और बंजारा परिवारों के घरों पर चली बुलडोजर कार्रवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश में विकास और कानून का बोझ केवल गरीबों और वंचितों को ही उठाना होगा? वर्षों से बसे हुए परिवारों को बेघर कर देना केवल मकानों को गिराने की घटना नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के सम्मान, सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे कमजोर स्थिति में हैं।

जब किसी आदिवासी परिवार का घर उजड़ता है, तो केवल दीवारें नहीं टूटतीं, बल्कि बच्चों के सपने, महिलाओं की सुरक्षा और बुजुर्गों का सहारा भी मलबे में बदल जाता है। बाड़मेर की घटना ने यह दिखाया है कि प्रशासनिक कार्रवाई के नाम पर मानवीय संवेदनाओं को किस तरह दरकिनार किया जा रहा है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि ये परिवार वर्षों से वहां रह रहे थे, तो उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था की गई? क्या सरकार ने उनके रहने, खाने और बच्चों की शिक्षा की कोई वैकल्पिक योजना बनाई? यदि नहीं, तो यह कार्रवाई न्याय नहीं, बल्कि सत्ता की ताकत का प्रदर्शन प्रतीत होती है।

आदिवासी समाज लंबे समय से जल, जंगल और जमीन पर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। अब जब सिर पर मौजूद छत भी छीनी जा रही है, तो यह केवल विस्थापन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा है। लोकतंत्र की पहचान बुलडोजरों की शक्ति से नहीं, बल्कि सबसे कमजोर नागरिक के अधिकारों की रक्षा से होती है।


बाड़मेर के आदिवासी और बंजारा परिवार आज सिर्फ अपने घरों की नहीं, बल्कि अपने सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। सरकार को यह समझना होगा कि विकास का अर्थ लोगों को बेघर करना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षा, सम्मान और बेहतर जीवन देना है। जब तक प्रभावित परिवारों को न्याय, पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन की गारंटी नहीं मिलती, तब तक यह सवाल बना रहेगा—क्या बुलडोजर राज, आदिवासी अधिकारों से बड़ा हो गया है?

UCC पर एमपी में सियासी घमासान: जीतू पटवारी का सीधा सवाल- ‘क्या आदिवासियों की परंपराओं को खत्म करना चाहती है सरकार?’

भोपाल। मध्य प्रदेश में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर जैसे ही कमेटी की बैठक हुई, राज्य की राजनीति में भूचाल आ गया। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया है। मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या विकास की आड़ में आदिवासियों के अधिकारों की बलि चढ़ाने की तैयारी चल रही है?
‘गुजरात-असम अलग हैं, एमपी के पास है 1.60 करोड़ आदिवासियों की विरासत’
जीतू पटवारी ने सरकार को जमीनी हकीकत का आईना दिखाते हुए कहा कि मध्य प्रदेश की सामाजिक ताना-बाना बाकी राज्यों जैसा नहीं है। यहाँ फैसले बंद कमरों में बिना सोचे-समझे नहीं थोपे जा सकते।
कांग्रेस का स्टैंड हमेशा से साफ रहा है कि यह केंद्र से जुड़ा मसला है। लेकिन जब बात मध्य प्रदेश की आती है, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ 1 करोड़ 60 लाख से ज्यादा आदिवासी और मूल निवासी रहते हैं। उनकी अपनी सदियों पुरानी संस्कृति है, अपनी अनूठी परंपराएं हैं। सरकार बताए कि क्या UCC के नाम पर आदिवासियों के इन खास अधिकारों और पहचान के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा रहा?”
पटवारी ने आगे पूछा कि जिन राज्यों में UCC को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की गईं, क्या वहां के नफा-नुकसान का कोई ग्राउंड असेसमेंट हुआ है? क्या सरकार के पास ऐसी कोई रिपोर्ट है जो यह साबित करे कि इससे जमीन पर कोई सुधार हुआ है?
जनता महंगाई से त्रस्त और सरकार ‘जीरो बटे सन्नाटा’
UCC के बहाने पीसीसी चीफ ने देश के आर्थिक हालात और आम आदमी की जेब पर पड़ रही मार को लेकर भी भाजपा को जमकर घेरा। उन्होंने कहा कि आज सरकार की प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं। पटवारी ने तंज कसते हुए कहा कि आज सरकार का पूरा जोर इस बात पर होना चाहिए कि लोगों के रोजगार कैसे बचें और उनकी इनकम कैसे बढ़े। लेकिन इस असल मोर्चे पर सरकार का परफॉर्मेंस ‘जीरो बटे सन्नाटा’ है।
पूरा देश इस समय बेकाबू महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रहा है, लेकिन सरकार का ध्यान सिर्फ बुनियादी मुद्दों से जनता को भटकाने पर लगा है। पटवारी ने सरकार की नीति और नीयत दोनों को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा कि चुनावी रैलियों में घुसपैठ की बात करने वाली भाजपा यह क्यों नहीं बताती कि पिछले 12 सालों में आखिर कितने घुसपैठियों को देश से बाहर खदेड़ा गया है? सरकार इसका आंकड़ा देश के सामने रखे।
इस पूरे मामले के पटवारी ने सरकार से पूछे 4 सवाल –
1. क्या UCC लागू होने से मध्य प्रदेश के विशाल आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक स्वायत्तता खतरे में पड़ जाएगी?
2. क्या सरकार बिना किसी ठोस स्टडी या दूसरे राज्यों की समीक्षा रिपोर्ट के ही एमपी में यूसीसी को आगे बढ़ा रही है?
3. जब आम जनता महंगाई और घटती कमाई से जूझ रही है, तब सरकार इन मुद्दों पर चुप क्यों है?
4. क्या सरकार के पास पिछले 12 सालों में देश से बाहर निकाले गए घुसपैठियों का कोई वास्तविक रिकॉर्ड है?

MP Rajya Sabha Election: मध्यप्रदेश में बीजेपी का ‘क्लीन स्वीप’, तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित, कांग्रेस पहुंची सुप्रीम कोर्ट

File Photo

भोपाल/नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने ‘क्लीन स्वीप’ करते हुए तीनों सीटों पर कब्जा जमा लिया है। बीजेपी के तीनों उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया है और विधानसभा सचिवालय ने उन्हें जीत का सर्टिफिकेट भी सौंप दिया है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। कांग्रेस ने इस पूरे मामले को एक ‘संवैधानिक साजिश’ बताया है और इसके खिलाफ देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जहां इस पर कल एक बेहद अहम सुनवाई होनी है।

राज्यसभा पहुंचने वाले बीजेपी के तीन चेहरे कौन हैं?
बीजेपी ने इस बार मध्य प्रदेश से जिन तीन चेहरों को मैदान में उतारा था, वे अब निर्विरोध चुनकर संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा जा रहे हैं:
तरुण चुघ
रजनीश अग्रवाल
महेश केवट

आखिर पूरा खेल कैसे पलटा?
अगर विधानसभा के आंकड़ों और संख्या बल को देखें, तो बीजेपी के खाते में दो सीटें बड़े आराम से आ रही थीं। वहीं, तीसरी सीट पर कांग्रेस की जीत तय मानी जा रही थी, जिसके लिए कांग्रेस ने पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को अपना उम्मीदवार बनाया था। लेकिन पासा तब पलट गया जब बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार महेश केवट और प्रदेश महासचिव राहुल कोठारी ने मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पर एक गंभीर आपत्ति दर्ज कराई। उनका आरोप था कि मीनाक्षी ने अपने चुनावी हलफनामे में तेलंगाना में चल रहे एक लंबित मामले की जानकारी छुपाई है। इसी शिकायत को सही मानते हुए 9 जून को रिटर्निंग ऑफिसर ने कांग्रेस उम्मीदवार का नामांकन रद्द कर दिया। इसके बाद बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार की जीत का रास्ता बिल्कुल साफ हो गया।

चुनाव आयोग से मायूसी के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख
नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस ने दिल्ली से लेकर भोपाल तक चुनाव आयोग के दफ्तरों के बाहर जमकर हंगामा और विरोध प्रदर्शन किया। जब चुनाव आयोग की तरफ से कोई राहत नहीं मिली, तो मीनाक्षी नटराजन ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कांग्रेस की तरफ से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि, रिटर्निंग ऑफिसर का यह फैसला पूरी तरह से गैर-कानूनी है। जिस मामले को बहाना बनाकर नामांकन रद्द किया गया है, उस पर तो अभी तक कोर्ट ने संज्ञान तक नहीं लिया है। हमने सुप्रीम कोर्ट से चुनावी नतीजों की घोषणा पर तुरंत रोक लगाने की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
गुरुवार को जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की बेंच के सामने इस मामले को अर्जेंट सुनवाई के लिए मेंशन किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल चुनावी प्रक्रिया या नतीजों पर कोई भी अंतरिम रोक लगाने से साफ मना कर दिया। कोर्ट का कहना था कि तय नियमों के मुताबिक, एक बार जब चुनावी प्रक्रिया शुरू हो जाती है, तो अदालतें आमतौर पर बीच में दखल नहीं देतीं। फिर भी, सुप्रीम कोर्ट कांग्रेस की इस याचिका पर विस्तार से सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है और इस मामले को शुक्रवार, 12 जून के लिए लिस्ट किया गया है।

वार-पलटवार – इस पूरे विवाद पर दोनों पार्टियों के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है:

कांग्रेस का आरोप – मीनाक्षी नटराजन ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि, बीजेपी के पास तीसरी सीट जीतने के लिए जरूरी वोट नहीं थे, इसलिए उन्होंने साजिश के तहत हमारा नामांकन रद्द करवाया। यह सीधे-सीधे लोकतंत्र की हत्या है और हम इसके खिलाफ आखिरी दम तक कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।

बीजेपी का जवाब – दूसरी तरफ, बीजेपी का साफ कहना है कि रिटर्निंग ऑफिसर ने सिर्फ चुनाव कानून और सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस का पालन किया है। हलफनामे में कोई भी जानकारी छुपाना नामांकन खारिज करने का बिल्कुल सही और पुख्ता आधार है।

आगे क्या?
अब सबकी नजरें कल यानी शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोर्ट इस निर्विरोध निर्वाचन पर कोई रोक लगाता है या फिर बीजेपी की यह तिकड़ी जीत बरकरार रखती है।

एमपी में कांग्रेस को लगा 440 वोल्ट का ‘झटका’, मीनाक्षी नटराजन का फॉर्म रिजेक्ट

भोपाल। मध्य प्रदेश की सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्यसभा चुनाव की स्क्रूटनी के दौरान कांग्रेस को ऐसा झटका लगा है जिसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देगी। कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन फॉर्म तकनीकी खामियों के चलते रद्द कर दिया गया है। इस चौंकाने वाले घटनाक्रम के बाद कांग्रेस मैदान से पूरी तरह बाहर हो गई है, जिसके चलते भाजपा के तीनों दिग्गजों की निर्विरोध जीत तय हो गई है।

एक छिपी जानकारीऔर कांग्रेस का खेल खत्म
आज जब विधानसभा सचिवालय में राज्यसभा चुनाव के नामांकन की स्क्रूटनी शुरू हुई, तब कांग्रेस के खेमे में किसी ने इस अनहोनी की कल्पना भी नहीं की थी। दरअसल, मीनाक्षी नटराजन पर तेलंगाना चुनाव के दौरान कुछ आपराधिक मामले दर्ज हुए थे और इसी बात को भाजपा ने आधार बनाकर आपत्ति दर्ज कराई। नटराजन ने अपने ताजा चुनावी शपथ पत्र में इन मुकदमों की जानकारी साझा नहीं की थी। नियमों के मुताबिक, यह जानकारी छिपाना नामांकन रद्द होने का पुख्ता आधार बन गया।

विधानसभा में हाई-वोल्टेज ड्रामा: भिड़े बीजेपीकांग्रेस कार्यकर्ता

जैसे ही भाजपा के रणनीतिकारों को इस चूक की भनक लगी, उन्होंने तुरंत साक्ष्यों के साथ विधानसभा सचिवालय में आपत्ति दर्ज करा दी। खबर फैलते ही कांग्रेस के बड़े नेता बदहवास हालत में विधानसभा पहुंचे। दूसरी तरफ बीजेपी कार्यकर्ता भी भारी संख्या में वहां जमा हो गए। सचिवालय परिसर में दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई, जो देखते ही देखते हल्की धक्का-मुक्की और हंगामे में बदल गई। बीजेपी कार्यकर्ता लगातार नटराजन का पर्चा खारिज करने की मांग पर अड़े रहे।

सचिवालय का बड़ा फैसला: नटराजन का पर्चा खारिज
घंटों चली खींचतान और कानूनी बारीकियों को परखने के बाद विधानसभा सचिवालय ने बड़ा फैसला सुनाया। शपथ पत्र में विसंगति पाए जाने के कारण मीनाक्षी नटराजन का फॉर्म अमान्य घोषित कर दिया गया। इस इकलौते फैसले ने कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। अब मैदान में कोई दूसरा विपक्षी उम्मीदवार न होने के चलते भाजपा प्रत्याशियों की निर्विरोध जीत का एलान कर दिया गया है।

राज्यसभा जाने वाले बीजेपी के तीन चेहरे:
रजनीश अग्रवाल (निर्विरोध निर्वाचित)
तरुण चुघ (निर्विरोध निर्वाचित)
महेश केवट (निर्विरोध निर्वाचित)

कांग्रेस की लीगल टीम की इस इतनी बड़ी लापरवाही ने बिना चुनाव हुए ही बाजी भाजपा की झोली में डाल दी है। जहां कांग्रेस खेमे में इस वक्त सन्नाटा और सिर-फुटौव्वल की स्थिति है, वहीं भाजपा कार्यालयों में जश्न शुरू हो चुका है।

“Green Over Greed” राहुल गांधी का अंडमान निकोबार दौरा और पर्यावरण बचाने की जंग!

नई दिल्ली। क्या कभी आपने सोचा है कि विकास की असली कीमत क्या होती है? क्या एक आलीशान पोर्ट या आलीशान होटलों के लिए उन जंगलों को उजाड़ देना सही है जो सदियों पुराने हैं? लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपने हालिया अंडमान और निकोबार दौरे के बाद पूरे देश के सामने यही तीखा सवाल खड़ा कर दिया है।

​इस यात्रा के दौरान राहुल गांधी का एक बिल्कुल अलग और रिलैक्स अंदाज देखने को मिला। उन्होंने स्कूटी चलाई, स्थानीय लोगों के साथ चाय पर चर्चा की और समंदर की गहराइयों में जाकर स्कूबा डाइविंग भी की। लेकिन जैसे ही उनकी इस यात्रा का वीडियो सामने आया, समझ आ गया कि यह सिर्फ एक वेकेशन ट्रिप नहीं था। इसके पीछे एक बहुत बड़ी चिंता थी कि, वहां के पर्यावरण और आदिवासियों पर मंडरा रहा संकट।

​समंदर के नीचे का जादू और इंदिरा पॉइंट का सफर
​राहुल गांधी इस यात्रा में भारत के सबसे आखिरी छोर, इंदिरा पॉइंट तक पहुंचे। उन्होंने वहां के खूबसूरत रेनफॉरेस्ट्स को करीब से देखा। ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर उन्होंने अपनी इस यात्रा का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें वे समंदर के नीचे रीफ और रंग-बिरंगी मछलियों के बीच तैरते नजर आ रहे हैं। ​अंडमान की इस जादुई दुनिया को देखने के बाद राहुल ने कहा 

​”यह जगह दुनिया का सबसे बेहतरीन और पर्यावरण के अनुकूल टूरिज्म स्पॉट बन सकती है। लेकिन जब मुझे पता चला कि इस बेमिसाल खूबसूरती को हमेशा के लिए खत्म करने की तैयारी चल रही है, तो मेरा दिल बैठ गया।”

​आखिर क्या है वो ‘विवाद’ जिसने राहुल को परेशान किया?
​अंडमान में इस वक्त केंद्र सरकार का एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट चल रहा है, जिसका नाम है ग्रेट निकोबार होलिस्टिक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट। इस पर करीब 72,000 करोड़ रुपये खर्च होने हैं। सरकार का कहना है कि यह देश की सुरक्षा और बिजनेस के लिए जरूरी है, लेकिन राहुल गांधी ने इस प्रोजेक्ट की टाइमिंग और नीयत पर गंभीर सवाल उठाए हैं:
डेढ़ करोड़ पेड़ों की बलि? राहुल का दावा है कि इस प्रोजेक्ट के लिए करीब 1.5 करोड़ उन पेड़ों को काट दिया जाएगा, जिन्हें दोबारा बड़ा होने में कई पीढ़ियां लग जाएंगी।

नक्शे से गायब हुई कोरल रीफ: उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने नए कंस्ट्रक्शन को मंजूरी देने के लिए कागजों और नक्शों से उन कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) को ही गायब कर दिया, जिन्हें उन्होंने खुद अपनी आंखों से पानी के नीचे देखा है।
आदिवासियों और पूर्व सैनिकों का दर्द: राहुल ने कहा कि वहां सदियों से रह रहे निकोबारी और शोंपेन आदिवासियों की जमीनें छीनी जा रही हैं। यही नहीं, वहां बसे पूर्व सैनिकों के परिवारों को भी सही मुआवजा नहीं मिल रहा है।
​”सुरक्षा तो सिर्फ एक बहाना है…” ​जब सरकार ने कहा कि यह प्रोजेक्ट देश की सुरक्षा (Strategic Defence) के लिए बहुत जरूरी है, तो राहुल ने इस पर सीधा और व्यावहारिक लॉजिक सामने रखा। उन्होंने कहा:

​”अगर यह वाकई देश की सुरक्षा का मामला है, तो सरकार पिछले 5 सालों से वहां मौजूद नौसेना के बेस ‘INS Baaz’ को बड़ा क्यों नहीं कर रही? हम देश की सुरक्षा के मामले में सरकार के साथ हैं। ‘INS Baaz’ को जितना मर्जी बड़ा बनाइए, उसके आस-पास काफी खाली जमीन है। उसके लिए करोड़ों पेड़ों को काटने की कोई जरूरत नहीं है।”

उनका सीधा आरोप है कि डिफेंस और पोर्ट का सिर्फ नाम लिया जा रहा है, असली मकसद कॉर्पोरेट दोस्तों को फायदा पहुंचाना है ताकि वहां जंगलों को साफ करके बड़े-बड़े होटल्स और कसीनो बनाए जा सकें।

​हमारी बात: ‘लालच’ पर ‘हरियाली’ की जीत हो
​राहुल गांधी ने देश के युवाओं से अपील की है कि वे इस कुदरती खजाने को बचाने के लिए आगे आएं। उन्होंने नारा दिया “Green over Greed” यानी लालच के ऊपर पर्यावरण को तरजीह मिलनी चाहिए। ​देखा जाए तो यह सिर्फ राजनीति की बात नहीं है। यह हमारे जीने के तरीके और हमारे भविष्य से जुड़ा सवाल है। क्या हम ऐसा विकास चाहते हैं जो हमसे हमारा आसमान, हमारे जंगल और हमारी साफ हवा ही छीन ले? यह सोचने का वक्त अब आ गया है।

आपकी क्या राय है? क्या देश की तरक्की के लिए पर्यावरण की यह कीमत चुकाना सही है या राहुल गांधी की यह चिंता जायज है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय हमारे साथ जरूर शेयर करें!

राज्यसभा चुनाव: क्रॉस वोटिंग के खौफ में कांग्रेस, ‘पाठशाला’ के बाद अब विधायकों को मिलेगी ‘ट्रेनिंग’

भोपाल। मध्य प्रदेश में राज्यसभा की 3 सीटों के लिए होने वाली चुनावी जंग बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। अपनी एकमात्र सीट को सुरक्षित रखने के लिए कांग्रेस फूंक-फूंककर कदम रख रही है। किसी भी तरह के सियासी उलटफेर या क्रॉस वोटिंग के डर से निपटने के लिए कांग्रेस ने शनिवार शाम भोपाल के ‘इंदिरा भवन’ में विधायक दल की एक बेहद अहम बैठक बुलाई। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के नेतृत्व में होने वाली इस बैठक का इकलौता एजेंडा विधायकों को एकजुट रखना और हर एक वोट को सुरक्षित करना है। कांग्रेस कार्यालय में आयोजित की गई बैठक में मप्र कांग्रेस के प्रभारी हरीश चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के साथ ही पार्टी की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन भी शामिल हुईं।

कांग्रेस नेतृत्व इस बार कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता। पार्टी की रणनीति दो मुख्य बिंदुओं पर टिकी है:

तकनीकी बारीकियों की ट्रेनिंग – बैठक में विधायकों को वोटिंग के नियम और बैलेट पेपर को सही तरीके से भरने का प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि मानवीय भूल के कारण कोई भी वोट रिजेक्ट (अमान्य) न हो।
व्हिप का डंडा – सभी विधायकों को पार्टी लाइन पर रहने और व्हिप का सख्ती से पालन करने की हिदायत दी जाएगी।

मध्य प्रदेश राज्यसभा का सियासी समीकरण
कागजी तौर पर मुकाबला भले ही सीधा नजर आ रहा हो, लेकिन आंकड़ों का गणित कांग्रेस की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी है। आइए समझते हैं कि विधानसभा में सीटों की क्या स्थिति है:
जीत के लिए जरूरी जादुई आंकड़ा – राज्यसभा की एक सीट के लिए 58 वोट की आवश्यकता है।
कांग्रेस की मौजूदा ताकत – विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पास 66 विधायक थे। लेकिन मुकेश मल्होत्रा और राजेंद्र भारती के अयोग्य घोषित होने के बाद यह संख्या घटकर 64 रह गई है।

निर्मला सप्रे का पेच – बीना से कांग्रेस के टिकट पर जीतीं निर्मला सप्रे भाजपा में शामिल हो चुकी हैं, लेकिन यह मामला अभी कोर्ट में है। कानूनी दांवपेच के बीच सप्रे ने कोर्ट में खुद को कांग्रेसी ही बताया है। ऐसे में तकनीकी रूप से उन पर कांग्रेस का व्हिप लागू होगा, जिससे मुकाबला और रोचक हो गया है।

मैदान में उतरे दिग्गज- किसके बीच है मुकाबला?
3 सीटों के लिए हो रहे इस सियासी दंगल में दोनों ही पार्टियों ने अपने मजबूत चेहरों को दांव पर लगाया है:
कांग्रेस – राहुल गांधी की करीबी और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया है।
भाजपा – पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और प्रदेश मंत्री रजनीश अग्रवाल को मैदान में उतारा है।

सियासी हकीकत – आंकड़ों के लिहाज से भाजपा के पास अपनी सीटें आसानी से निकालने के लिए पर्याप्त बहुमत मौजूद है। वहीं कांग्रेस के पास 64 विधायकों का संख्या बल तो है, लेकिन अंदरूनी कलह और क्रॉस वोटिंग की आशंका के चलते पार्टी के लिए अपनी इस इकलौती सीट को बचाना एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होने वाला है।

गृह मंत्री अमित शाह ने आदिवासी को कहा वनवासी, सड़क पर उतरी आदिवासी कांग्रेस।

दिल्ली। बीते दिन दिल्ली मे “जनजाति सुरक्षा मंच” द्वारा आयोजित “जनजाति सांस्कृतिक समागम” कार्यक्रम मे भाजपा की ओर से केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शिरकत की जिसमे आदिवासी समुदाय से जुड़ी तमाम योजना और बजट को लेकर उन्होने बात की। अपने भाषण के दौरान अमित शाह ने लगातार आदिवासी समाज को “वनवासी” कहकर संबोधित किया। उनका यही संबोधन देश भर मे विरोध की वजह बन गया। गौरतलब है कि कार्यक्रम के दौरान दिल्ली मे आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और झाबुआ विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया द्वारा इस कार्यक्रम का विरोध किया जाना तय किया गया था। जब लाल क़िला पर कार्यक्रम चल रहा था उसी बीच बड़ी संख्या मे आदिवासी कांग्रेस के कार्यकर्ता वहाँ पहुँचे और कार्यक्रम के मुख्य द्वार पर ही जमकर विरोध शुरू कर दिया। कार्यक्रम की सुरक्षा एवं गृहमंत्री की मौजूदगी के चलते वहाँ पूर्व से ही भरी सुरक्षा बल तैनात था। काफी देर के विरोध और झड़प के बाद वहाँ पर आदिवासी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को हिरासत मे ले लिया गया और किसी तरह विरोध पर काबू पा लिया गया।

विरोध के दौरान आदिवासी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को हिरासत मे ले जाते पुलिसकर्मी।

कार्यक्रम के दौरान जैसे ही अमित शाह के भाषण सोशल मीडिया पर आए तो एक अलग विरोध ने वहाँ तूल पकड़ लिया। गृह मंत्री अमित शाह ने अपने भाषण मे आदिवासी को वनवासी कहकर संबोधित किया। जिसके खिलाफ अगले ही दिन डॉ. विक्रांत भूरिया ने कांग्रेस मुख्यालय पर पत्रकार वार्ता करते हुए गृह मंत्री अमित शाह के बयान को भाजपा का एक प्रोजेक्ट बताया। जिसमे भाजपा का उद्देश्य आदिवासी समुदाय के हक़ और अधिकार छीनकर उनके जल-जंगल-ज़मीन को उद्योगपतियों को सौपने की बात कही। डॉ. भूरिया ने अमित शाह और राहुल गांधी के एक विडियो को दिखाकर आदिवासियों के प्रति भाजपा और कांग्रेस की मांसकिता का फर्क भी बताने का प्रयास किया और इसका पुरजोर विरोध करने की बात कही।

पत्रकार वार्ता, कांग्रेस मुख्यालय।

जिसके पश्चात कल गुरुवार को देश भर मे आदिवासी कांग्रेस के द्वारा सड़क पर आक्रोश देखने को मिला। जगह-जगह गृह मंत्री अमित शाह के पुतले जलाए गए। गौरतलब है कि जबसे डॉ. विक्रांत भूरिया ने आदिवासी कांग्रेस की कमान संभाली है तबसे ही आदिवासी कांग्रेस मे कसावट दिखाई पड़ने लगी है। उल्लेखनिए बात यह है कि ऐसा पहली बार देखने को मिला है जब आदिवासी कांग्रेस ने राजधानी दिल्ली मे इस तरह का कोई विरोध दर्ज़ किया हो। डॉ. विक्रांत भूरिया से चर्चा के दौरान उन्होने बताया कि हम आदिवासी समुदाय की एकता के लिये धरातल पर लगातार प्रयास कर रहे हैं। लेकिन भाजपा और उनके नेता लगातार को समाज को बांटने का काम कर रहे हैं। कभी क्षेत्र, कभी उपजाति तो कभी भाषा के नाम पर बाटने का काम भाजपा कर रही है। भाजपा चाहती है कि आदिवासी समाज को विभाजित कर उनका प्रतिनिधित्व कम करके उनकी आवाज़ को कमजोर किया जाए ताकि उनके जल-जंगल-ज़मीन पर आधिपत्य हंसिल कर उनके संसाधनों से उन्हें बेदखल किया जा सके।

वनवासी कहकर हमे वनों तक सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। आज आदिवासी समाज के बच्चे पढ़ाई करके डॉक्टर, इंजीनियर और व्यवसायी बन रहे हैं। लेकिन यह बात भाजपा को नागवार है। सरकार पहले आदिवासियों को UCC मे शामिल करने की बात करती है। फिर विरोध होने पर उसी बात का खंडन करती है। सबसे बड़ा मुद्दा है PESA कानून, FRA और डीलिस्टिंग का मुद्दा। क्योंकि आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण का आधार वर्ण व्यवस्था नहीं बल्कि विशेष समुदाय होना है। सरकार इसको जाति के आधार पर कमजोर करने का षड़यंत्र रच रही है। आज समाज एकजुट है और इतना शिक्षित हो चुका है की इस छल को पहचान सके। हम हर हाल मे इसका विरोध करेंगे और आगामी समय मे यही आदिवासी समुदाय इस आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार को उखाड़ फेकने का काम भी करेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्वीट।

फिलहाल तो विरोध के बाद आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक ट्वीट में आदिवासी समुदाय को पुनः आदिवासी कहकर संबोधित किया गया है। लगता है इस विरोध का असर ज़मीन से लेकर सेवा तीर्थ तक जा पहुंचा है। आगामी समय मे देखना रोचक होगा की यह विरोध थमता है या और भी बढ़ेगा।

 

 

मप्र में जिलाध्यक्षों के काम से नाखुश कांग्रेस हाईकमान

फाइल फोटो

एमपी में सत्ता की चाह में संघर्ष कर रही कांग्रेस के बुरे दिन हवा होने के नाम ही नही ले रहे है। बड़े तामझाम और कई दिनों के मंथन के बाद एमपी में जिला अध्यक्षों की नियुक्तियां की गई। लेकिन, अब जब जिला अध्यक्षों के रिपोर्ट कार्ड पर मंथन किया गया, तो कई जिला अध्यक्ष राहुल गांधी की मंशा पर खरे नहीं उतर पाए। जिसके बाद कांग्रेस ने जिलाध्यक्षों की समीक्षा कर कलर कोडिंग की। पर कलर कोडिंग के बाद भी 8 से 10 जिलाध्यक्षो के काम का परफार्मेंस ठीक नही है। लिहाजा, इन्हे हटाने की तैयारी की जा रही है। इनके लिए बाकायदा पीसीसी से एआईसीसी को एक सूची भेजी रही है। जिसमें जिलाध्यक्ष की परफार्मेंस रिपोर्ट भेजी जा रही है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने कहा कि, ऐसा नहीं है चार-पांच जिले जरूर, हल्के से पिछड़े हैं, कार्यक्रमों को करने में। वहां की परिस्थितियां कुछ वैसी होंगी, पारिवारिक परिस्थितियां भी कभी-कभी जो हमारा जिला अध्यक्ष होता है, कुछ घटनाएं हो जाती हैं, जिससे वो समय पर कार्यक्रम नहीं कर पाए। यही समीक्षा तो करने के लिए हमने कहा जहां लगेगा कि वास्तव में पॉलिटिकली समझ कम है, कमजोर है, वहां पर बदलना ही चाहिए। कोई ऐसा तो ब्रह्म वाक्य नहीं लिख दिया कि संगठन सृजन में जो बना है वो अच्छा ही होगा। कुछ लोग कमजोर हैं तो वहां बदलाव की आवश्यकता है यदि, दिल्ली से हमारे हाईकमान के लोग आए हैं, यदि वो महसूस करेंगे कि बदलना चाहिए तो बदले जाएंगे। इसमें चेतावनी का काम नहीं है, इसमें समीक्षा कर ली। उनके पास सारे डाटा हैं। जो हमारे दिल्ली से आए हैं, वो हमसे भी ज्यादा, पूरे डाटा हैं। पूरा एक-एक कार्यक्रम है हर जिले का। उन्होंने बड़े अच्छे ढंग से समीक्षा की है। यदि बहुत कमजोर लगता है, तो भेजे इसीलिए गए हैं, कि हम कांग्रेस को कमजोर नहीं होने देंगे। उन जिलों में और मजबूत गठन करेंगे इसलिए।

कांग्रेस के पूर्व विधायक शैलेन्द्र पटेल का कहना है कि, मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के जो जिला अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं, उनकी परफॉरमेंस को एआईसीसी लगातार मॉनिटर कर रही है। बीच में उनके काम को देखने के लिए, अवलोकन के लिए, उनके परफॉरमेंस को नापने के लिए पूरी एक कमेटी मध्य प्रदेश आई थी। उन्होंने नाप कर और माप कर गईं कि कौन कैसा परफॉर्म कर रहे हैं। हाँ, यह बात सच है कि जो बहुत से अध्यक्ष उनके पैरामीटर पर पूरे नहीं उतर पा रहे हैं, उनको शायद बदला जाए, दूसरों को मौका दिया जाए। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी भी अपनी रिपोर्ट भेज रही है। कौन लोग प्रॉपर तरीके से और उस तरीके से, उस जोश से, खरोश से और सबको लेकर काम कर रहे हैं, उनकी रिपोर्ट भी जा रही है और जो नहीं कर पा रहे हैं, उनकी रिपोर्ट भी जा रही है। हाँ, हो सकता है आने वाले समय में कुछ लोग इसमें से बदले जाएं।

बाबा साहब के अपमान के आरोपों से गरमाई एमपी की राजनीति!

भोपाल। भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती पूरे देश में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जा रही है। देशभर में नेता, मंत्री, जनप्रतिनिधि और आमजन बाबा साहब को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। लेकिन मध्य प्रदेश में इस अवसर पर सियासत भी तेज हो गई है।

मध्य प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री विश्वास सारंग ने कांग्रेस पर बाबा साहब के अपमान का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और नेहरू परिवार ने हमेशा डॉ. अंबेडकर का अपमान किया। सारंग के अनुसार, इतिहास गवाह है कि उन्हें चुनाव हराने और लोकसभा पहुंचने से रोकने के लिए राजनीतिक षड्यंत्र रचे गए।

इसके जवाब में कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने पलटवार करते हुए कहा कि बाबा साहब को संविधान निर्माण की ऐतिहासिक जिम्मेदारी कांग्रेस नेतृत्व ने ही सौंपी थी। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी, नेहरू, सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद जैसे नेताओं के विश्वास के चलते ही देश को संविधान मिला, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।

शर्मा ने भाजपा और आरएसएस पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि बाबा साहब को चुनाव में हराने के लिए उस दौर में हिंदू महासभा और आरएसएस सक्रिय थे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि संविधान बदलने की किसी भी कोशिश का कांग्रेस मजबूती से जवाब देगी।

उन्होंने कहा कि आज देश में गरीब से गरीब व्यक्ति को शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय और आगे बढ़ने का जो अधिकार मिला है, वह बाबा साहब अंबेडकर के संविधान की देन है। यही वजह है कि उनकी जयंती पर देर रात तक हजारों लोगों की भीड़ श्रद्धांजलि देने उमड़ी।

मध्य प्रदेश में अंबेडकर जयंती के मौके पर यह बयानबाजी अब राजनीतिक टकराव का रूप ले चुकी है, जिससे आने वाले दिनों में सियासत और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।

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