नई दिल्ली। क्या कभी आपने सोचा है कि विकास की असली कीमत क्या होती है? क्या एक आलीशान पोर्ट या आलीशान होटलों के लिए उन जंगलों को उजाड़ देना सही है जो सदियों पुराने हैं? लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपने हालिया अंडमान और निकोबार दौरे के बाद पूरे देश के सामने यही तीखा सवाल खड़ा कर दिया है।
इस यात्रा के दौरान राहुल गांधी का एक बिल्कुल अलग और रिलैक्स अंदाज देखने को मिला। उन्होंने स्कूटी चलाई, स्थानीय लोगों के साथ चाय पर चर्चा की और समंदर की गहराइयों में जाकर स्कूबा डाइविंग भी की। लेकिन जैसे ही उनकी इस यात्रा का वीडियो सामने आया, समझ आ गया कि यह सिर्फ एक वेकेशन ट्रिप नहीं था। इसके पीछे एक बहुत बड़ी चिंता थी कि, वहां के पर्यावरण और आदिवासियों पर मंडरा रहा संकट।
समंदर के नीचे का जादू और इंदिरा पॉइंट का सफर
राहुल गांधी इस यात्रा में भारत के सबसे आखिरी छोर, इंदिरा पॉइंट तक पहुंचे। उन्होंने वहां के खूबसूरत रेनफॉरेस्ट्स को करीब से देखा। ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर उन्होंने अपनी इस यात्रा का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें वे समंदर के नीचे रीफ और रंग-बिरंगी मछलियों के बीच तैरते नजर आ रहे हैं। अंडमान की इस जादुई दुनिया को देखने के बाद राहुल ने कहा

”यह जगह दुनिया का सबसे बेहतरीन और पर्यावरण के अनुकूल टूरिज्म स्पॉट बन सकती है। लेकिन जब मुझे पता चला कि इस बेमिसाल खूबसूरती को हमेशा के लिए खत्म करने की तैयारी चल रही है, तो मेरा दिल बैठ गया।”
आखिर क्या है वो ‘विवाद’ जिसने राहुल को परेशान किया?
अंडमान में इस वक्त केंद्र सरकार का एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट चल रहा है, जिसका नाम है ग्रेट निकोबार होलिस्टिक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट। इस पर करीब 72,000 करोड़ रुपये खर्च होने हैं। सरकार का कहना है कि यह देश की सुरक्षा और बिजनेस के लिए जरूरी है, लेकिन राहुल गांधी ने इस प्रोजेक्ट की टाइमिंग और नीयत पर गंभीर सवाल उठाए हैं:
डेढ़ करोड़ पेड़ों की बलि? राहुल का दावा है कि इस प्रोजेक्ट के लिए करीब 1.5 करोड़ उन पेड़ों को काट दिया जाएगा, जिन्हें दोबारा बड़ा होने में कई पीढ़ियां लग जाएंगी।
नक्शे से गायब हुई कोरल रीफ: उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने नए कंस्ट्रक्शन को मंजूरी देने के लिए कागजों और नक्शों से उन कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) को ही गायब कर दिया, जिन्हें उन्होंने खुद अपनी आंखों से पानी के नीचे देखा है।
आदिवासियों और पूर्व सैनिकों का दर्द: राहुल ने कहा कि वहां सदियों से रह रहे निकोबारी और शोंपेन आदिवासियों की जमीनें छीनी जा रही हैं। यही नहीं, वहां बसे पूर्व सैनिकों के परिवारों को भी सही मुआवजा नहीं मिल रहा है।
”सुरक्षा तो सिर्फ एक बहाना है…” जब सरकार ने कहा कि यह प्रोजेक्ट देश की सुरक्षा (Strategic Defence) के लिए बहुत जरूरी है, तो राहुल ने इस पर सीधा और व्यावहारिक लॉजिक सामने रखा। उन्होंने कहा:
”अगर यह वाकई देश की सुरक्षा का मामला है, तो सरकार पिछले 5 सालों से वहां मौजूद नौसेना के बेस ‘INS Baaz’ को बड़ा क्यों नहीं कर रही? हम देश की सुरक्षा के मामले में सरकार के साथ हैं। ‘INS Baaz’ को जितना मर्जी बड़ा बनाइए, उसके आस-पास काफी खाली जमीन है। उसके लिए करोड़ों पेड़ों को काटने की कोई जरूरत नहीं है।”
उनका सीधा आरोप है कि डिफेंस और पोर्ट का सिर्फ नाम लिया जा रहा है, असली मकसद कॉर्पोरेट दोस्तों को फायदा पहुंचाना है ताकि वहां जंगलों को साफ करके बड़े-बड़े होटल्स और कसीनो बनाए जा सकें।
हमारी बात: ‘लालच’ पर ‘हरियाली’ की जीत हो
राहुल गांधी ने देश के युवाओं से अपील की है कि वे इस कुदरती खजाने को बचाने के लिए आगे आएं। उन्होंने नारा दिया “Green over Greed” यानी लालच के ऊपर पर्यावरण को तरजीह मिलनी चाहिए। देखा जाए तो यह सिर्फ राजनीति की बात नहीं है। यह हमारे जीने के तरीके और हमारे भविष्य से जुड़ा सवाल है। क्या हम ऐसा विकास चाहते हैं जो हमसे हमारा आसमान, हमारे जंगल और हमारी साफ हवा ही छीन ले? यह सोचने का वक्त अब आ गया है।
आपकी क्या राय है? क्या देश की तरक्की के लिए पर्यावरण की यह कीमत चुकाना सही है या राहुल गांधी की यह चिंता जायज है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय हमारे साथ जरूर शेयर करें!
























































