दिल्ली। बीते दिन दिल्ली मे “जनजाति सुरक्षा मंच” द्वारा आयोजित “जनजाति सांस्कृतिक समागम” कार्यक्रम मे भाजपा की ओर से केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शिरकत की जिसमे आदिवासी समुदाय से जुड़ी तमाम योजना और बजट को लेकर उन्होने बात की। अपने भाषण के दौरान अमित शाह ने लगातार आदिवासी समाज को “वनवासी” कहकर संबोधित किया। उनका यही संबोधन देश भर मे विरोध की वजह बन गया। गौरतलब है कि कार्यक्रम के दौरान दिल्ली मे आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और झाबुआ विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया द्वारा इस कार्यक्रम का विरोध किया जाना तय किया गया था। जब लाल क़िला पर कार्यक्रम चल रहा था उसी बीच बड़ी संख्या मे आदिवासी कांग्रेस के कार्यकर्ता वहाँ पहुँचे और कार्यक्रम के मुख्य द्वार पर ही जमकर विरोध शुरू कर दिया। कार्यक्रम की सुरक्षा एवं गृहमंत्री की मौजूदगी के चलते वहाँ पूर्व से ही भरी सुरक्षा बल तैनात था। काफी देर के विरोध और झड़प के बाद वहाँ पर आदिवासी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को हिरासत मे ले लिया गया और किसी तरह विरोध पर काबू पा लिया गया।

कार्यक्रम के दौरान जैसे ही अमित शाह के भाषण सोशल मीडिया पर आए तो एक अलग विरोध ने वहाँ तूल पकड़ लिया। गृह मंत्री अमित शाह ने अपने भाषण मे आदिवासी को वनवासी कहकर संबोधित किया। जिसके खिलाफ अगले ही दिन डॉ. विक्रांत भूरिया ने कांग्रेस मुख्यालय पर पत्रकार वार्ता करते हुए गृह मंत्री अमित शाह के बयान को भाजपा का एक प्रोजेक्ट बताया। जिसमे भाजपा का उद्देश्य आदिवासी समुदाय के हक़ और अधिकार छीनकर उनके जल-जंगल-ज़मीन को उद्योगपतियों को सौपने की बात कही। डॉ. भूरिया ने अमित शाह और राहुल गांधी के एक विडियो को दिखाकर आदिवासियों के प्रति भाजपा और कांग्रेस की मांसकिता का फर्क भी बताने का प्रयास किया और इसका पुरजोर विरोध करने की बात कही।

जिसके पश्चात कल गुरुवार को देश भर मे आदिवासी कांग्रेस के द्वारा सड़क पर आक्रोश देखने को मिला। जगह-जगह गृह मंत्री अमित शाह के पुतले जलाए गए। गौरतलब है कि जबसे डॉ. विक्रांत भूरिया ने आदिवासी कांग्रेस की कमान संभाली है तबसे ही आदिवासी कांग्रेस मे कसावट दिखाई पड़ने लगी है। उल्लेखनिए बात यह है कि ऐसा पहली बार देखने को मिला है जब आदिवासी कांग्रेस ने राजधानी दिल्ली मे इस तरह का कोई विरोध दर्ज़ किया हो। डॉ. विक्रांत भूरिया से चर्चा के दौरान उन्होने बताया कि हम आदिवासी समुदाय की एकता के लिये धरातल पर लगातार प्रयास कर रहे हैं। लेकिन भाजपा और उनके नेता लगातार को समाज को बांटने का काम कर रहे हैं। कभी क्षेत्र, कभी उपजाति तो कभी भाषा के नाम पर बाटने का काम भाजपा कर रही है। भाजपा चाहती है कि आदिवासी समाज को विभाजित कर उनका प्रतिनिधित्व कम करके उनकी आवाज़ को कमजोर किया जाए ताकि उनके जल-जंगल-ज़मीन पर आधिपत्य हंसिल कर उनके संसाधनों से उन्हें बेदखल किया जा सके।
वनवासी कहकर हमे वनों तक सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। आज आदिवासी समाज के बच्चे पढ़ाई करके डॉक्टर, इंजीनियर और व्यवसायी बन रहे हैं। लेकिन यह बात भाजपा को नागवार है। सरकार पहले आदिवासियों को UCC मे शामिल करने की बात करती है। फिर विरोध होने पर उसी बात का खंडन करती है। सबसे बड़ा मुद्दा है PESA कानून, FRA और डीलिस्टिंग का मुद्दा। क्योंकि आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण का आधार वर्ण व्यवस्था नहीं बल्कि विशेष समुदाय होना है। सरकार इसको जाति के आधार पर कमजोर करने का षड़यंत्र रच रही है। आज समाज एकजुट है और इतना शिक्षित हो चुका है की इस छल को पहचान सके। हम हर हाल मे इसका विरोध करेंगे और आगामी समय मे यही आदिवासी समुदाय इस आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार को उखाड़ फेकने का काम भी करेगा।

फिलहाल तो विरोध के बाद आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक ट्वीट में आदिवासी समुदाय को पुनः आदिवासी कहकर संबोधित किया गया है। लगता है इस विरोध का असर ज़मीन से लेकर सेवा तीर्थ तक जा पहुंचा है। आगामी समय मे देखना रोचक होगा की यह विरोध थमता है या और भी बढ़ेगा।




























































