Tuesday, September 15, 2026
Home Blog Page 193

नेशनल हेराल्ड मामले में सोनियाजी व राहुलजी पर सुब्रमण्यम स्वामी के केस को कोर्ट ने खारिज किया :

दिल्ली की एक अदालत ने नेशनल हेराल्ड मामले में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की वह अर्जी खारिज कर दी, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, उनकी मां सोनिया गांधी और अन्य अधिकारियों को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि या तो वे स्वीकारें या फिर नकारें कि उनकी ओर से दाखिल किए गए कुछ दस्तावेज असली हैं.

अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट समर विशाल ने अर्जी खारिज करते हुए कहा कि किसी आरोपी को किसी दस्तावेज का लेखक नहीं बताया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि अर्जी से मुकदमे की कार्यवाही में देरी हो रही है. अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘कुछ कानूनी सीमा के कारण जब दस्तावेज खुद ही साक्ष्य के तौर पर स्वीकार्य नहीं हैं तो आरोपी इन दस्तावेजों को ना तो स्वीकार कर और ना नकार कर कानूनी तौर पर खुद को सही ठहराते हैं.’ कोर्ट ने कहा, ‘लिहाजा, उक्त कारणों से सीआरपीसी की धारा 294 के तहत दायर उस अर्जी को अनुमति नहीं दी जा सकती जिसमें आरोपियों को दस्तावेज स्वीकारने या नकारने के निर्देश देने के लिए कहा गया है.’

बीजेपी नेता स्वामी ने एक निजी आपराधिक शिकायत में राहुल और सोनिया गांधी एवं अन्य पर आरोप लगाया है कि उन्होंने महज 50 लाख रुपए का भुगतान कर धोखाधड़ी और कोष में गड़बड़ी की साजिश की, जिसके जरिए यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड ने 90.25 करोड़ रुपए की वह रकम वसूलने का अधिकार हासिल कर लिया जिसे असोसिएट जर्नल्स लिमिटेड को कांग्रेस को देना था.

अदालत ने स्वामी की दो अन्य अर्जियों का भी निपटारा कर दिया. इनमें से एक अर्जी में कांग्रेस पार्टी से कुछ दस्तावेज मांगे गए थे जबकि दूसरे में मजिस्ट्रेट से अनुरोध किया गया था कि वह आयकर विभाग से जुड़े कुछ दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लें. अदालत ने कहा कि इन अर्जियों पर फैसला बाद में होगा. मजिस्ट्रेट ने कहा कि दोनों अर्जियों की प्रासंगिकता और स्वीकार्यता पर साक्ष्य या फैसले के चरण में निर्णय किया जाएगा.

अदालत ने कहा, ‘शिकायतकर्ता सीआरपीसी की धारा 91 के तहत जिस तरह अर्जियां दे रहे हैं या दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने के लिए कह रहे हैं उससे कोई मकसद पूरा नहीं होता और इससे मुकदमे में देरी हो रही है.’

मजिस्ट्रेट ने कहा, ‘मुकदमे में पहले ही देर हो चुकी है क्योंकि अभियोजन के साक्ष्य दर्ज करने की पहली तारीख 20 फरवरी, 2016 थी और अब तक साक्ष्य पर काम शुरू नहीं हुआ है. ऐसे में मुकदमे में देरी हो रही है. इसे पटरी पर लाना होगा. लिहाजा, मुकदमे को पटरी पर लाने के लिए निर्देश दिया जाता है कि शिकायतकर्ता खुद अभियोजन के पहले गवाह के तौर पर अपना परीक्षण कराएंगे और इस मामले की आधारशिला रखेंगे.’ अदालत ने कहा कि इसके बाद गवाहों, अधिकारियों और अन्य को सम्मन किया जाएगा.

मजिस्ट्रेट ने कहा कि स्वामी को उन गवाहों की एक सूची देनी होगी जिसमें उनके नाम या पदनाम या कोई अन्य प्रासंगिक ब्योरा देना होगा जिसमें ऐसे दस्तावेजों का ब्योरा होगा जो वे गवाह साबित करेंगे. अदालत ने स्वामी के परीक्षण के लिए 21 जुलाई की तारीख तय कर दी.

सभी सात आरोपियों सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडीज, सुमन दुबे, सैम पित्रौदा और यंग इंडियन ने इस मामले में अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को नकारा है. अदालत ने आरोपियों को 26 जून, 2014 को तलब किया था.

✍ शिल्पी सिंह

विकासवादी सोच के योद्धा नेहरू की कुछ यादें :

नेहरू जी की 54वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि.. महात्मा गांधी के सच्चे वारिस, आदर्श राष्ट्रप्रेमी, अदभुत वक्ता, उत्कृष्ट लेखक, इतिहासकार, स्वप्नद्रष्टा और आधुनिक भारत के निर्माता के खिताब से नवाजे जाने का श्रेय अगर किसी एक व्यक्ति को जाता है तो नि:संदेह वे भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ही हैं।
आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाने के साथ-साथ भारत के नवनिर्माण, लोकतंत्र को स्थापित करने और उसे मजबूत बनाने में पंडित जी ने जो भूमिका निभायी, उसके लिए भारत हमेशा उनका ऋणी रहेगा. पंडित जी को राजनीति, पिता मोतीलाल नेहरू से विरासत में मिली थी, लेकिन उनके असली राजनीतिक गुरु महात्मा गांधी ही थे, जिन्होंने बाद में जवाहर लाल को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया. भारतीय आजादी की लड़ाई की एक बड़ी और अहम घटना माने जाने वाले वर्ष 1919 के जलियांवाला बाग कांड के बाद से पंडित जी ने भारतीय राजनीति को दिशा देने में अहम भूमिका निभायी थी।

उस समय वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली जौहर के कहने पर वे जालियांवाला कांड के कारणों की जांच के लिए बनायी गयी समिति के सदस्य बने थे. कांग्रेस के इतिहास में अध्यक्षता सीधे पिता से पुत्र को मिलने की विरल घटना भी जवाहरलाल जी के संदर्भ में ही देखने को मिलती है, जब 1929 में लाहौर में रावी के तट पर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान पंडित मोतीलाल नेहरू की जगह गांधीजी ने जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का फैसला किया था. इसी अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में जवाहरलाल जी ने भारत को आजाद कराने का संकल्प लिया और उसके लिए तारीख भी तय कर दी. मगर पंडित जी के राजनीतिक जीवन से भी ज्यादा जिस चीज ने विश्व को प्रभावित किया, वह उनकी इतिहास दृष्टि है. ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ यानी भारत की खोज और ‘ग्लिम्पसेस ऑफ द वर्ल्ड हिस्ट्री’ यानी विश्व इतिहास की झलक उनकी ऐसी अदभुत किताबें हैं, जो स्कूली छात्रों के पाठ्यक्रम में शामिल की जानी चाहिए. जेल में रहते हुए बिना किसी संदर्भ के और इतिहास लेखन की विधिवत ट्रेनिंग लिये बिना उन्होंने अपनी बेटी इंदिरा गांधी को जो पत्र लिखे और जिसने बाद में एक विशाल ग्रंथ का रूप लिया, वह पंडित जी की अदभुत कृति है।

दुनिया के पांच हजार साल के इतिहास को जिस सलीके से पंडित जी ने लिपिबद्ध किया है उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती और इतिहासकारों ने इसे एच जी वेल्स की ‘आउटलाइन ऑफ द वर्ल्ड हिस्ट्री’ के समकक्ष का दर्जा दिया है. इसी किताब में पंडित जी ने लिखा है कि महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर हमला किसी इसलामी विचारधारा से नहीं किया था, बल्कि वह विशुद्ध रूप से लुटेरा था और उसकी फौज का सेनापति एक हिंदू तिलक था. फिर इसी महमूद गजनवी ने जब मध्य एशिया के मुसलिम देशों को लूटा तो उसकी सेना में असंख्य हिंदू थे. पंडित जी को ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ कहा जाता है और शायद इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद आर्थिक रूप से खस्ताहाल और विभाजित हुए भारत का नवनिर्माण करना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन पंडित जी ने अपनी दूरदृष्टि और समझ से जो पंचवर्षीय योजनाएं बनायीं, उसके नतीजे वर्षों बाद मिले।

पंडित जी का दूसरा बड़ा काम भारत में लोकतंत्र को खड़ा करना था, जिसकी जड़ें अब काफी मजबूत हो चुकी हैं और जिसका लोहा पूरी दुनिया मानती है और भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है. वर्ष 1952 में पंडित जी के नेतृत्व में देश के पहले आम चुनाव में स्वस्थ लोकतंत्र की जो नींव रखी गयी थी, वह आज तक जारी है। अपनी जिंदगी के दो अन्य आम चुनाव 1957 और 1962 में अपनी पूरी शक्ति लगाकर उन्होंने इसे न सिर्फ और मजबूत बनाया, बल्कि अपने विपक्ष को भी पूरा सम्मान दिया.

उन्होंने अपनी पार्टी के सदस्यों के विरोध के बावजूद 1963 में अपनी ही सरकार के खिलाफ विपक्ष की ओर से लाये गये पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराना मंजूर किया और उसमें भाग लिया. जितना समय पंडित जी संसद की बहसों में दिया करते थे और बैठ कर विपक्षी सदस्यों की बात सुनते थे, उस रिकॉर्ड को अभी तक कोई प्रधानमंत्री नहीं तोड़ पाया है, बल्कि अब तो प्रधानमंत्री के संसद की बहसों में भाग लेने की परंपरा निरंतर कम होती जा रही है. पंडित जी प्रेस की आजादी के भी बड़े भारी पक्षधर थे और कहा करते थे लोकतंत्र में प्रेस चाहे जितना गैर-जिम्मेदार हो जाये, मैं उस पर अंकुश लगाये जाने का समर्थन नहीं कर सकता. शायद इसकी वजह एक ये भी थी कि वे एक दौर में खुद पत्रकार थे और प्रेस की आजादी का महत्व समझते थे.

इसके अलावा भारत को सही ढंग से समझने और अंतराष्ट्रीय मामलों की जो पकड़ पंडित जी की थी, वह भारत के किसी दूसरे नेता की नहीं हो पायी. अपने प्रधानमंत्री काल में विदेश विभाग हमेशा उनके पास रहा और इसी दौरान उन्होने मार्शल टीटो, कर्नल नासिर और सुकार्णो के साथ मिल कर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी, जो शीतयुद्ध की समाप्ति से पहले तक काफी प्रभावी रहा. मगर अंतिम समय में पंडित जी को कुछ नाकामियों का भी मुंह देखना पड़ा और चीन के साथ दोस्ती करना काफी मंहगा साबित हुआ. हालांकि चीन के साथ दोस्ती की पहल उन्होंने काफी ईमानदारी से की थी और पंचशील के सिद्धांत के साथ-साथ हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा दिया, लेकिन 1962 में चीन द्वारा भारत पर हमला करने से पंडित जी भी बहुत दुःखी हुए और कुछ लोगों का तो ये भी मानना है कि उनकी मौत का कारण यह सदमा भी था।
पंडित जी विज्ञान के मदद से जिस तरह से देश को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया और दुर्दिष्टता दिखाया वो काबिले तारीफ थी।

मगर अजब आज कुछ नेता और संगठन सिर्फ अपने स्वार्थ के लिये नेहरूजी को बदनाम करते हैं तो विश्व भर के नेहरू प्रेमियों को दुख होता है और सबसे बड़ा नुकसान उस देश के छवि को होता है जिस देश निर्माण नेहरू ने क़िया था।

✍ शिल्पी सिंह

मोदी सरकार के चार साल :

मोदी जी के 4 साल की सरकार में उन्होंने कुछ नही किया जो भी करते थे अपने लिए अच्छा खाया अच्छा विदेश घूमा।

मोदी सरकार के चार साल को कांग्रेस ‘विश्वासघात दिवस’ के रूप में मना रही है। इस मौके पर कांग्रेस ने ‘विश्वासघात’ के नाम से एक बुकलेट जारी किया है। बुकलेट में चार सालों के दौरान मोदी सरकार की नाकामियों के बारे में बताया गया है। बुकलेट जारी करते हुए कांग्रेस महासचिव अशोक गहलोत ने कहा कि आजादी के बाद बीते चार साल देश के सबसे खराब दौर रहे हैं। गहलोत ने देश के हर गांव में बिजली पहुंचाने के दावे पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा, “देश में करीब 6 लाख गांव हैं, अगर 18 हजार गांवों में मोदी जी ने बिजली पहुंचाई तो फिर 5 लाख 82 हजार गांवों में बिजली किसने पहुंचाई? मोदी जी झूठ बोलने की सारी हदें पार कर चुके हैं।” कांग्रेस महासचिव ने कहा कि देश में चार सालों में डर का माहौल पैदा हुआ है। मोदी सरकार के चार साल पूरे होने के दिन भी पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़े हैं। 13 मई से 26 मई के बीच पेट्रोल के दाम में 3.86 रुपये और डीज़ल के दाम में 3.26 रुपये की वृद्धि हो गई है। कर्नाटक चुनाव ख़त्म होते ही अख़बारों ने लिख दिया था कि चार रुपये प्रति लीटर दाम बढ़ेंगे, करीब करीब यही हुआ है। यानी दाम बढ़ाने की तैयारी थी लेकिन अमित शाह ने बोल दिया कि सरकार घटाने पर प्लान बना रही है। एक दो दिन से ज़्यादा बीत गए मगर कोई प्लान सामने नहीं आया। हम सब समझते हैं कि तेल के दाम क्यों बढ़ रहे हैं मगर सरकार में बैठे मंत्री को ही बताना चाहिए कि विपक्ष में रहते हुए 35 रुपये प्रति लीटर तेल कैसे बिकवा रहे थे। आज के झूठ की माफी नहीं मांग सकते तो पुराने बोले गए झूठ की माफी मांग सकते हैं।

जिस तरह से सोशल मीडिया पर कुतर्कों को जाल बुना गया है, वह बताता है कि यह सरकार जनता की तर्क बुद्धि का कितना सम्मान करती है। मोदी सरकार को सत्ता में आये चार साल गुजर चुके है। अब इन चार साल में जनता बेहाल रही या खुशहाल ये अगले चुनाव में ही पता लगेगा।

मगर नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री पद की गरिमा गिराई है ऐसा कहना है राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का, उन्होंने कहा जितना नुकसान प्रधानमंत्री पद का खुद मोदी जी ने गिराया है वैसा किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं किया है। दरअसल, पिछले चार सालों में मोदी सरकार 11 बार पेट्रोल और डीज़ल एक्साइज ड्यूटी बढ़ा चुकी है। इस दौरान अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम कम थे। लेकिन अब जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं तो सरकार उस तेज़ी से एक्साइज ड्यूटी नहीं घटा रही है। सरकार ने सिर्फ गुजरात चुनाव से पहले ड्यूटी कम की थी और उसकी जगह भी 2% सेस लगा दिया था।

मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने प्रेस को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं। उन्होंने कहा कि बीजीपी ने देश को सबसे ज्यादा मेहनत करने वाला प्रधानमंत्री दिया है, जो 15 से 18 घंटे तक काम करते हैं।

जवाब में कांग्रेस ने कहा मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर कांग्रेस ने योजनाओं को लेकर केंद्र सकार को घेरा है। कांग्रेस ने ट्वीट किया, “4 साल पहले वादा किया, योजनाओं के विज्ञापन पर खूब पैसा भी बहाया लेकिन योजना पर खर्च नहीं किया और पैसा बेकार पड़ा रहा। क्या इसे खोटी नीयत, खोटा विकास नहीं कहते?”

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि 1996 के बाद से मोदी सरकार के पिछले 4 साल के दौर में सबसे ज्यादा सैनिक और आम नागरिकों की जान गई है। आजाद ने कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा ऐसा क्षेत्र है जिस पर पीएम मोदी ने चुनाव प्रचार के समय ढेर सारी बातें की थी और उन्हें इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन वे इस मुद्दे पर नाकाम रहे हैं।

मोदी सरकार के चार साल पूरे हो गए हैं। सरकार के 4 साल पूरे होने के मौके पर बीजेपी जश्न मना रही है और सरकार की उपलब्धियों को गिना रही है। वहीं मोदी सरकार को हर मोर्चे पर नाकाम बता रहा है। बीएसी सुप्रीमो मायावती ने कहा कि इन चार सालों में केंद्र सरकार हर मोर्चे पर नाकाम रही है। कुल मिलाकर सब की राय ये है कि मोदीजी ने 4 साल में देश का बंटाधार ही किया है और चार 4 साल मोदी जी ने जनता के लिए कुछ नही किया सिर्फ अपने लिए जीए है।

शिल्पी सिंह

विपक्षी एकता से घबराये अमित शाह, कहा भाजपा को होगा चुनाव में नुकसान :

विपक्षी दलों का एक मंच पर आना बीजेपी के लिए चिंता का कारण बन गया है। इस बात को अब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी माना है। शुक्रवार को पत्रकारों से बातचीत में अमित शाह ने कहा कि समाजवादी पार्टी, बीएसपी और कांग्रेस का एक साथ आना बीजेपी के लिए चुनौती है और उन्हें उत्तर प्रदेश में इससे नुकसान हो सकता है।

अमित शाह ने कहा कि, “अगर बीएसपी और समाजवादी पार्टी गठबंधन बना कर चुनाव लड़ेंगी, तो यह हमारे लिए एक चुनौती होगी।

बीजेपी की दिक्कत उत्तर प्रदेश ही नहीं है, महाराष्ट्र में भी उसके लिए दिक्कत है। और, यह बात अमित शाह के इस बयान से साफ हो जाती है जब उन्होंने कहा कि, “हम महाराष्ट्र में गठबंधन के पुराने साथी शिवसेना से अलग नहीं होना चाहते हैं, हम उन्हें एनडीए से बाहर नहीं करना चाहते हैं। लेकिन अगर शिवसेना अपनी अलग राह चुनना चाहती है, तो फिर हम क्या कर सकते हैं। हम हर स्थिति के लिए तैयार हैं।”

लेकिन विपक्षी दलों के एकजुट होने पर बीजेपी की चिंता अमित शाह के बयानों में साफ नजर आई। उन्होंने सफाई दी कि, “वे लोग 2014 में भी हमारे खिलाफ लड़े थे, लेकिन हमें रोकने में नाकामयाब रहे थे। उन लोगों की अपने-अपने राज्यों में उपस्थिति है। अगर वे एकसाथ आते हैं तो भी वे हमें हरा पाने में सफल नहीं होंगे।” लेकिन अमित शाह जानबूझकर यह कहने से बचे कि 2014 में तो सभी दल अलग-अलग थे और वोटों का बंटवारा हुआ था, लेकिन अगर 2019 में वे गठबंधन बनाकर मैदान में बीजेपी के खिलाफ आए तो उन्हें झटका लग सकता है।

गौरतलब है कि बीजेपी को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने में उत्तर प्रदेश ने बड़ी भूमिका निभाई थी, जहां की 80 में से 73 सीटें उसे और उसके सहयोगी दलों को मिली थीं, लेकिन हाल के लोकसभा उपचुनाव में जब एसपी-बीएसपी एक साथ मैदान में उसके खिलाफ आए तो उसे उसके गढ़ गोरखपुर और फूलपुर सीटों पर करारी शिकस्त खानी पड़ी थी।

बीजेपी के यह आभास हो गया है कि अगले लोकसभा चुनाव में उसके हाथ उत्तर प्रदेश से ज्यादा सीटें नहीं आने वाली, इसीलिए अमित शाह ने कहा कि, “2019 में बीजेपी ऐसी अस्सी सीटें जीतेगी जहां वह बीते चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सकी थी।” उन्होंने कहा, “हमलोग ऐसी सीटों पर जीत हासिल करेंगे जोकि पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल और अन्य जगहों पर हैं।”

गौरतलब है कि कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की सरकार के शपथ समारोह में 14 विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए थे, इनमें कांग्रेस के अलावा उत्तर प्रदेश की एसपी, बीएसपी और आरएलडी, महाराष्ट्र की एनसीपी, दिल्ली की आप, आंध्र प्रदेश की तेलुुगु देशम, बिहार की आरजेडी, सीपीआई और सीपीएम के साथ पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस ने हिस्सा लिया था।

लेकिन विपक्षी दलों की एकजुटता से पैदा हुई घबराहट अमित शाह के बयानों में साफ दिखी।बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि, “विपक्षी पार्टियां एक जैसी सोच वाले दलों के साथ आ रही हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि वे केवल अपने दम पर एनडीए को 2019 में मात नहीं दे पाएगी। ये सब हमारे खिलाफ 2014 में लड़े थे, लेकिन हमें रोक नहीं पाए। अगर वे एकसाथ भी आते हैं तो भी हमें हरा नहीं पाएंगे।’

✍ शिल्पी सिंह

गोवा में भाजपा सरकार खतरे में, गठबंधन दल ने नाता तोड़ने की दी धमकी :

कर्नाटक में बहुमत परीक्षण में भाजपा की हुई किरकिरी अभी तक लोग भूले भी नहीं थे कि लग रहा है कि भाजपा को अब गोवा में क्रिकेट का सामना करना पड़ सकता है कर्नाटक हाथ से निकलने के बाद बीजेपी सरकार पर गोवा में खतरे के बादल मंडरा रहे है,राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल गोवा फारवर्ड ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द से जल्द खनन मामले को नहीं सुलझाया गया तो पार्टी राज्य सरकार को समर्थन देने पर पुनर्विचार कर सकती है।

गोवा फारवर्ड के अध्यक्ष व शहरी व ग्रामीण नियोजन मंत्री विजय सरदेसाई ने यहां कहा कि उनसे जल्द से जल्द इस संकट को सुलझाने की गुजारिश करता हूं। अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो हम अपने समर्थन के बारे में दोबारा सोचेंगे।

40 सीटो वाली गोवा विधानसभा के लिए 2017 में हुए चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी जिसमें कांग्रेस ने 17 भाजपा ने 14 गोवा फॉरवर्ड ने 3 महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी ने 3 एनसीपी ने एक और निर्दलीय ने 2 सीट जीत दर्ज की थी जिसके बाद देश के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने इस्तीफा दे दिया और किसी तरह भाजपा ने जोड़-तोड़ कर सरकार बनाई जिसमें भाजपा के 14 विधायक गोवा फॉरवर्ड के तीन महाराष्ट्रवादी गोमांतक के तीन और एक एनसीपी के और दो निर्दलीय विधायकों ने समर्थन से सरकार बनाया। एनसीपी ने बीजेपी को समर्थन देने के कारण अपने विधायक को पार्टी से से निकाल दिया और वह भी निर्दलीय के रूप में सरकार को समर्थन दिया।

अब यदि गोवा फारवर्ड सरकार से समर्थन वापस लेती है फिर भाजपा को सरकार बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा क्योंकि भाजपा गठबंधन के 20 सीट ही रह जायेंगे और महाराष्ट्रवादी गोमांतक और भाजपा के रिश्ते में तल्खी हमेशा बनी रहती है।

अब यदि कांग्रेस इस मौके का फायदा उठाते हुए महाराष्ट्रवादी गोमांतक और गोवा फॉरवर्ड से गठबंधन कर और तीन निर्दलीय विधायकों से बातचीत कर सरकार बनाने की तरफ कदम बढ़ाती है तो निश्चित तौर पर भाजपा के लिए यह सबसे बड़ा झटका होगा क्योंकि गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर भी बीमार चल रहे हैं और वह 2017 के तरह सक्रिय नहीं हैं इसलिए अगर बहुमत सिद्ध करने की बात गोवा में उठती है तो निश्चित तौर पर भाजपा को काफी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो चुकी है कि कांग्रेस इस मौके का फायदा उठाने के लिए रणनीति बना रही है और कांग्रेस के हाईकमान इसको लेकर राजनीतिक विश्लेषकों से चर्चा कर अन्य दलों के विधायकों से जुड़ने का कोशिश कर रहे हैं।

✍ शिल्पी सिंह

राहुल की लोकप्रियता में बढ़त तो मोदी की लोकप्रियता काफी तेजी से हुई कम :

26 मई को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अपनी चौथी सालगिरह मनाने जा रही है। इन 4 सालों के दौरान बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे पीएम मोदी की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आयी है। ये गिरावट विशेषकर पिछले एक साल के दौरान देखने को मिली है।

एबीपी न्यूज के लिए सीएसडीएस द्वारा किये गये ताजा सर्वे में पीएम मोदी की लोकप्रियता में तेजी से ढलान देखने को मिल रही है। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी के साथ बढ़ा है। 2019 के लोकसभा चुनावों के ध्यान में रखकर किये गये सीएसडीएस के सर्वे में राज्यवार लोकसभी सीटों की तस्वीर पेश की गयी है।

2019 से पहले यह साल मोदी सरकार के लिए सेमीफाइनल माना जा रहा है। साल के अंत में कई राज्यों में चुनाव होने हैं। सर्वे में इन राज्यों में भी पार्टियों की स्थिति की तस्वीर पेश की गयी है। सर्वे में दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी पिछड़ती नजर आ रही है। सर्वे के मुताबिक 230 सीटों वाले मध्यप्रदेश में आज चुनाव हों तो यहां बीजेपी को भारी झटका लग रहा है। बीजेपी को 34% और कांग्रेस को 49% वोट शेयर मिलने का अनुमान है। जबकि और अन्य के खाते में 17% वोट शेयर जा सकता है। राज्य में साल 2013 में बीजेपी को 165, कांग्रेस को 58 और अन्य को 7 सीटें मिली थीं। बीजेपी को 45%, कांग्रेस को 36% और अन्य को 19% वोट शेयर मिला था। दरअसल बीजेपी के लिए मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों ही काफी अहम राज्य है। जहां पिछले दो बार से ज्यादा इन दो राज्यों पर बीजेपी का कब्ज़ा है। अब सर्वे के मुताबिक, कांग्रेस धीरे धीरे इन दो राज्यों की तरफ विजय हासिल करती नज़र आ रही है। राजस्थान की बात करे तो बीजेपी को 39%, कांग्रेस को 44% और अन्य के खाते में 17% वोट शेयर जाने की उम्मीद है।

वहीँ पिछले चुनाव पर नज़र डाली जाए तो बीजेपी को 45 फीसद, कांग्रेस को 33 फीसद और अन्य दलों को 22 फीसद वोट मिले थे। अगर ऐसा सर्वे के इर्द-गिर्द ही चुनावी नतीजे आये तो बीजेपी के लिए दोनों राज्यों में सरकार गंवाना ठीक वैसा ही होगा जैसा सीपीआईएम का त्रिपुरा और बंगाल में हुआ और खुद कांग्रेस इसका बड़ा उदाहरण रही है। जो राज्य दर राज्य चुनाव हारती गई और मोदी सरकार हर उस राज्य में सरकार बनाती गई जहां वो पहले थी ही नहीं।
सर्वे में अगर मध्यप्रदेश की बात करें तो शिवराज का राज भी अब आखिरी साँसे ले रहा है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश में हार और गुजरात और यूपी में कमजोर होता संगठन साफ तौर पर भाजपा और मोदी के लिये खतरा बन चुका है। कांग्रेस विपक्षी एकता को लेकर चलने में कामयाब हो जाए तो यूपी में भी भाजपा का सूपड़ा साफ हो जायेगा वही बिहार में कांग्रेस+राजद के गठबंधन का जनाधार काफी तेजी में बढ़ता हुआ नजर आ रहा है। इन सब को देखे तो भाजपा की सबसे मजबूत गढ़ उत्तर भारत की भाजपा के पकड़ से दूर जाता दिख रहा है क्योंकि महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यो में पहले ही भाजपा मुश्किल में नजर आ रही है।

राहुल गाँधी की आक्रमकता और अध्यक्ष बनने के बाद सक्रियता भी कही न कही लोगो के एक बेहतर विकल्प के रूप में राहुल गाँधी का मजबूत कर रही है।

दक्षिण भारत मे कर्नाटक के अलावा भाजपा कही नही है और कर्नाटक में अब जेडीएस और कांग्रेस के गठबंधन के बाद भाजपा के लिये वहां पर भी पिछली लोकसभा के प्रदर्शन को दोहराना काफी मुश्किल होगा।

इसलिये 2019 में जो ये समझ रहे हैं कि भाजपा नही हार सकती है वो राज्यवार विश्लेषण करके देख लें भाजपा के लिये सरकार बचाना बहुत कठिन लग रहा है।

✍ शिल्पी सिंह

पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि होने से हर तरफ हो रही मोदी सरकार की आलोचना :

मोदी सरकार के तमाम दावों के बावजूद पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें लगातार बढ़ती नज़र आ रही हैं। बुधवार को एक बार फिर कीमतों में उछाल देखने को मिला। बढ़ती कीमतों का सिलसिला लगातार पिछले दस दिनों से जारी है।

पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार वृद्धि होने के कारण सरकार की चौतरफा आलोचना होना शुरू हो गया है। जिस सरकार का 2014 में नारा था “बहुत हुई पेट्रोल और डीजल की महंगाई की मार अबकी बार मोदी सरकार” उसी सरकार में पेट्रोल आजादी के बाद सबसे महंगा बिक रहा है जिसको लेकर अब ना सिर्फ राजनीतिक दल बल्कि आम आदमी भी सवाल उठाने लगे हैं।

सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना इस बात को लेकर हो रही है कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का कीमत लगातार गिर रही है फिर सरकार यहां पर टैक्स बढ़ा कर अधिक कीमत जनता से क्यों वसूल रही है। जब 2014 से पहले कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय मार्केट में 117 डॉलर प्रति बैरल था तब भारत में पेट्रोल की कीमत ₹73 हुआ करती थी वही जब अब अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल है तब कच्चे तेल की कम हुई कीमत का फायदा होने की जगह उलट नुकसान ही हो रहा है और अब पेट्रोल ₹85 वही डीजल ₹73 प्रति लीटर मिल रहा है।

पेट्रोल और डीजल की लगातार मूल्य वृद्धि को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस लगातार सरकार पर हमलावर है और देश के विभिन्न इलाकों में वह इसको लेकर विरोध प्रदर्शन कर रही है एनएसयूआई से लेकर कांग्रेस की सारी संगठन इसको लेकर अपना विरोध दर्ज करवाई है वहीं आम आदमी पार्टी,राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी के साथ-साथ अन्य विपक्षी दल भी इसको लेकर सरकार की आलोचना कर रहे हैं।

पेट्रोल और डीजल के दाम में वृद्धि होने का सबसे बड़ा कारण सरकार के द्वारा लिया जा रहा टैक्स है। टैक्स 2014 से लेकर अगर देखा जाए तो मनमोहन सरकार के तुलना में मोदी सरकार में बहुत ही अधिक हो गया है।

मई 2014 में पेट्रोल 9.20 रूपए प्रति लीटर और डीजल पर 3.46 रूपए प्रति लीटर उत्पाद शुल्क लगता था, अब पेट्रोल पर 212 प्रतिशत इजाफे के साथ 19.48 रूपए और डीज़ल पर 443 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 15.33 रूपए प्रति लीटर उत्पाद शुल्क लग रहा है।

पेट्रोल और डीजल के बढ़ती महंगाई को लेकर सरकार चाहे जो भी बहाना बना ले लेकिन पेट्रोल और डीजल की बढ़ती महंगाई का असर आम लोगों के सीधे जनजीवन पर पड़ता है जिस कारण से सरकार को इसका खामियाजा निश्चित तौर पर भुगतना होगा और इसी को ध्यान में रखते हुए सारी विपक्षी दल इसको लेकर आक्रमक होते हुए जनता के बीच सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में जुट चुकी है जिसका निश्चित तौर पर आने वाले चुनाव में भाजपा को काफी नुकसान होगा।

कांग्रेस के नेता लगातार ट्विटर और प्रेस के माध्यम से मनमोहन सरकार और मोदी सरकार के दौरान अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत और पेट्रोल-डीजल की कीमत का तुलना कर सकरार को घेर रहे हैं।

जनता भी अब सवाल कर रही है कि आखिर सरकार इतना टैक्स क्यों बढ़ा रही है ? जब सारा चीज जीएसटी के अंदर लाया गया तो पेट्रोलियम पदार्थों को क्यों जीएसटी से बाहर रख आम जनता को लूट रही है ?

निश्चित तौर पर जिस तरह से पेट्रोल-डीजल के दामों में लगातार वृद्धि होने से आम जनों में गुस्सा बढ़ रहा है उससे भाजपा को काफी नुकसान हो सकता है, कांग्रेस इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर 2018 के विधानसभा चुनावों में इसका फायदा जरूर लेगी।

✍ शिल्पी सिंह

कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण समारोह के मंच पर मोदी के खिलाफ एकजुट देश 11 दल :

कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण समाहरो में पूरब से लेके पशिचम तक और उत्तर से दक्षिण तक गैर भाजापा नेता पहुँचे,जेडीएस के एच डी कुमारास्वामी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली और इसके साथ ही कर्नाटक के सियासी नाटक का पटाक्षेप हो गया लगता है, हालांकि बहुमत परीक्षण अभी बाकी है। लेकिन इस नाटक के अंतिम दृश्य में जिस नए रंगमंच की नेपथ्य ध्वनि सुनाई दी, उससे 2019 की राजनीतिक पटकथा पढ़ी जा सकती है। इस मंच में कई राज्यों के क्षत्रप अगले लोकसभा के लिए ताल ठोंकने को आतुर दिखे, तो कुछ नेताओं ने महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत दिए। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान मंच पर विपक्षी एकजुटता की झलक भी देकने को मिली। बेंगलुरु में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में गैर-बीजेपी दलों के तमाम दिग्गज नेता शामिल हुए हैं। बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफे और कर्नाटक में बीजेपी का परचम लहराने से रोकने के बाद गैर बीजेपी दलों के लिए ये जश्न का है। समारोह में कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नेताओं के शरीक होने की उम्मीद है। इसके जरिए 2019 के आमचुनाव से पहले भाजपा को विपक्षी एकजुटता का एक संदेश दिया गया है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, यूपीए अध्यक्ष एवं उनकी मां सोनिया गांधी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के भी समारोह में शरीक हुए। इसके अलावा माकपा महासचिव सीताराम येचुरी, बिहार विधानसभा में विपक्षी नेता तेजस्वी यादव और नेकां के नेता फारूक अब्दुल्ला के भी उपस्थित थे। बसपा प्रमुख मायावती और सपा नेता अखिलेश यादव भी समारोह में शरीक हुए। इस बीच, द्रमुक नेता एमके स्टालिन ने बेंगलुरू की अपनी यात्रा रद्द कर दी है। इसकी बजाय वह तमिलनाडु में तूतीकोरीन जाएंगे, जहां कल पुलिस गोलीबारी में नौ लोग मारे गए। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित नहीं रहेंगे। कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला ने उन्हें सीएम पद की शपथ दिलाई। वहीं, कांग्रेस जी परमेश्वर ने भी उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

इस दौरान मंच पर विपक्षी एकजुटता की झलक भी दिखी। इससे पहले कर्नाटक में कांग्रेस के प्रभारी महासचिव के सी वेणुगोपाल ने बताया था कि राज्य में पार्टी अध्यक्ष जी परमेश्वर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। वेणुगोपाल ने बताया कि कांग्रेस के रमेश कुमार अगले विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) होंगे, जबकि विधानसभा उपाध्यक्ष पद जद (एस) के खाते में जाएगा। कुमारस्वामी एक हफ्ते के अंदर कर्नाटक में शपथ लेने वाले दूसरे मुख्यमंत्री हैं। दरअसल, 19 मई को फ्लोर टेस्‍ट से पहले ही बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्‍पा ने मुख्‍यमंत्री पद से इस्‍तीफा दे दिया था। जिसके बाद राज्‍यपाल के सामने कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ने सरकार बनाने का दावा पेश किया था।

✍ शिल्पी सिंह

कर्नाटक हार के बाद तिलमिलाए अमित शाह :

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कर्नाटक चुनाव के बाद पहली बार मीडिया से बात करते हुए कहा कि कर्नाटक में अगर विधायक बंधक नहीं होते तो वहां हमारी सरकार होती। प्रेस कॉन्फ्रेंस के शुरु होने से पहले ही अमित शाह और उनके साथियों ने यह साफ कर दिया था कि वह कर्नाटक चुनाव के अलावा किसी मुद्दे पर बात नहीं करेंगे। वह कॉफ्रेंस के दौरान लगातार यही कहते रहे कि अगर बहुमत परीक्षण से पहले कांग्रेस अपने विधायकों को होटल और स्वीमिंग पूल से बाहर छोड़ देती तो जनता ही उन्हें बता देती कि कहां वोट करना है। कर्नाटक चुनाव में बहुमत हासिल करने को विफल हुई बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने आज प्रेस कांफ्रेंस करते हुए कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा। इस बात का जवाब देते हुए कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद आनंद शर्मा ने जवाबी प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए जवाब दिया की अमित शाह जी ने प्रेस कांफ्रेंस की और ये सही बात है कि उनको थोड़ी भी लज्जा नहीं है। यदि थोड़ी भी शर्म होती तो वो कर्नाटक और पूरे देश की जनता से माफी मांगते कर्नाटक के प्रकरण ने पूरे देश और पूरी दुनिया के सामने भारतीय जनता पार्टी के दोहरे मापदंड, सत्ता की भूख को दिखा दिया। कर्नाटका चुनाव के दौरान पूर्ण रूप से सरकारी तंत्र का दुरुपयोग हुआ, इनकम टैक्स की रेड करायी गयी, केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल हुआ श्री नरेन्द्र मोदी और श्री अमित शाह जी ये बात याद रखें कि उनके दोहरे मापदंड, जबान, मूल्य और मान्यताएं देश के लोग स्वीकार नहीं करेंगे। बता दें कि बीजेपी को कर्नाटक चुनाव में सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं मिला था। बीजेपी के पास 104 विधायक थे और सरकार बनाने के लिए 112 विधायकों की ज़रूरत थी। ऐसे में बीजेपी कांग्रेस-जेडीएस के विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रही थी। जिसके मद्देनज़र कांग्रेस-जेडीएस ने अपने विधायकों को रिज़ॉर्ट भेज दिया था। हालांकि, जब अमित शाह से यह सवाल पूछा गया कि क्यों उनकी सरकार ने कर्नाटक चुनाव के फ़ौरन बाद पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में इज़ाफा करने का फैसला किया, इसपर शाह सवाल पूछने वाले एनडीटीवी के पत्रकार पर भड़क गए और पत्रकार पर एजेंडा चलाने का आरोप लगाया। शाह ने कहा, “मैं केवल कर्नाटक के बारे में बात करूंगा हालांकि मैं आपका एजेंडा समझता हूं। हम इस सवाल का जवाब भी देंगे लेकिन आज नहीं”।

कांग्रेस ने अमित शाह के इसी रवैये को खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की संज्ञा दी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने कहा कि बीजेपी की हालत खंभा नोंचने वाली खिसियानी बिल्ली जैसी हो गई है। शर्मा ने कहा है कि बीजेपी को दूसरी पार्टियों के विधायक चुराने में महारत हासिल है। बीजेपी ने अपनी कर्मों के कारण इस चुनाव में अपने चेहरे पर कालिख पोती है। कर्नाटक में कांग्रेस द्वारा बीजेपी को दी गई करारी शिकस्त के चलते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह तिलमिला गए हैं। क्यूंकि कांग्रेस-जेडीएस की एकजुटता के आगे उनकी सभी रणनीतियां फेल हो गई, जो इससे पहले कभी नहीं हो पाया था। पेट्रोल की कीमतों पर अमित शाह का अजीबोगरीब बयान
कर्नाटक के घटनाक्रम को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अध्‍यक्ष अमित शाह ने सोमवार (21 मई) को दिल्‍ली स्थित बीजेपी मुख्‍यालय में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस की। कांग्रेस सहित विपक्ष की एकजुटता की पहल को खास तवज्जो नहीं देते हुए अमित शाह ने कहा कि उनकी पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में बड़े बहुमत से जीतेगी। उन्होंने कहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी विपक्षी दल अलग अलग राज्यों में बीजेपी के खिलाफ लड़े थे और उनकी पार्टी तब भी जीती थी और यही बात 2019 में होगी जब वह उससे भी बड़े बहुमत से जीतेगी। हालांकि इस दौरान जब पत्रकारों ने अमित शाह से जब पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों पर सवाल किए तो उन्होंने अजीबोगरीब जवाब दिए।एनडीटीवी के संवाददाता अखिलेश शर्मा ने जब बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह से पूछा कि कर्नाटक चुनाव के समय पेट्रोल-डीजल के दाम स्‍थिर थे लेकिन अब उसमें तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है, इस पर अमित शाह ने कहा, ”मैं आपका (मीडिया) एजेंडा जानता हूं। मैं इस पर भी जवाब दूंगा। लेकिन आज मैं केवल कर्नाटक के विषय में बात कर रहा हूं।” बता दें कि कर्नाटक में चुनाव के बाद से इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम ने पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ानी शुरू कर दी हैं। इससे पहले 19 दिनों तक कीमतों को स्थिर रखा गया था। सार्वजनिक तेल कंपनियों ने कर्नाटक में चुनावी प्रक्रिया के दौरान 19 दिन के विराम के बाद 14 मई को कीमतों में दैनिक संशोधन को बहाल किया। इसके बाद से इनकी कीमत में लगातार बढ़ोतरी जारी है।

✍ शिल्पी सिंह

कुमारस्वामी के शपथ में दिखेगी विपक्ष की ताकत :

मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण करने जा रहे कुमारस्वामी अपने दिल्ली दौरे पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कर उनसे सरकार गठन की प्रक्रिया पर चर्चा की और उन्हें शपथ ग्रहण समारोह का न्योता दिया।

कर्नाटक में राहुल गांधी ने राजनीति की बिसात पर जो चालें चलीं, उससे न केवल उनकी पार्टी सत्ता में दोबारा लौटकर आयी, बल्कि प्रतिद्वंद्वी बीजेपी के बड़े-बड़े सूरमा सहित वे सभी धराशायी हो गए, जो राहुल को हल्के में ले रहे थे। कांग्रेस अध्यक्ष ने जेडीएस को अपने साथ जोड़कर ‘2019 का समीकरण’ भी अपने पक्ष में कर लिया है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान जेडीएस को कांग्रेस और राहुल गांधी बीजेपी की बी टीम कहकर कटघरे में खड़ा कर रहे थे। हो ना हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के प्रति नरमी और कई सीटों पर जेडीएस उम्मीदवारों के खिलाफ कमजोर बीजेपी उम्मीदवार कुछ ऐसी तस्वीर पेश कर रहे थे कि बीजेपी और जेडीएस के बीच कांग्रेस को पराजित करने के लिए कोई अंदरूनी समझौता हो चुका है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा थी कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में बीजेपी जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बना लेगी। कुमारस्वामी पहले भी एक बार बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बन चुके थे, इसलिए इस कयास को बल मिल रहा था ।

एक तरफ मुख्यमंत्री पद की मुंहमांगी मुराद पूरी हो रही थी, तो दूसरी तरफ बीजेपी से दूर रहकर पार्टी की सेक्यूलर छवि भी सुरक्षित। जेडीएस की साझेदार बीएसपी की अध्यक्ष मायावती ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। कुमारस्वामी ने समर्थन स्वीकार कर लिया और सरकार बनाने को तैयार हो गए।

कर्नाटक में कांग्रेस जेडीएस गठबंधन सरकार के नामित मुख्यमंत्री कुमारस्वामी बुधवार को शपथ लेगें. इस दौरान देश के प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं के भी शपथ समारोह में शामिल होंगे। इस कार्यक्रम में देश भर के पांच मुख्यमंत्री हिस्सा लेने पहुंचेगे. जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी, केरल के सीएम पिनाराई विजयन, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव शामिल रहेंगे।

बीजेपी अब दोराहे पर खड़ी है। उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे। सांप-छछूंदर की स्थिति। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह वाराणसी में दर्दनाक हादसे के बावजूद दिल्ली में कर्नाटक जीत का जश्न मना चुके थे। कर्नाटक की जीत को अभूतपूर्व जीत करार दे चुके थे। ऐसे में सरकार बनाने का दावा पेश न करना भी उनके लिए आत्महत्या करने के बराबर था। लिहाजा, उन्होंने कर्नाटक में उस खेल को हरी झंडी दिखा दी, जिसे राजनीति में ‘अनैतिक’ कहा जाता है। लेकिन इस बार कर्नाटक की पिच और कांग्रेस की टीम थोड़ी अलग निकली। राहुल ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि अब कांग्रेस पहले वाली कांग्रेस नहीं है, बल्कि यह उनकी कांग्रेस है, जो मैदान से लेकर कानून के कटघरे तक खेलना और जीतना जानती है। यह संदेश बाकी विपक्षी दलों के लिए भी था, कि भाजपा से लड़ने और जीतने की क्षमता किसी दल में है, तो वह सिर्फ कांग्रेस ही है।

बहरहाल, राहुल के चक्रव्यूह में खुद को घिरता देख, बीजेपी ने अंतत: मैदान से हटने का निर्णय लिया। राहुल की कांग्रेस ने बीजेपी के विजयरथ को रोक दिया। लाख कोशिशों के बावजूद बीजेपी 112 की संख्या नहीं जुटा पायी और बीएस येदियुरप्पा को शपथ ग्रहण के दो दिन बाद ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

शिल्पी सिंह

21 मई 1991 की वो काली रात :

देश आज पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी को याद कर रहा है। 27 साल पहले आज ही के दिन उनकी हत्या कर दी गई थी।

अपने पिता की 27वीं पुण्यतिथि पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक भावुक संदेश भी ट्विटर पर लिखा। उन्होंने कहा, ‘मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि जो लोग नफरत पालते हैं, जिंदगी भर नफरत की कैद में रहते हैं। आज उनकी पुण्यतिथि पर मैं उन्हें धन्यवाद कहना चाहता हूं कि उन्होंने मुझे सभी लोगों से प्यार और सम्मान करना सिखाया। यह एक पिता की तरफ से अपने बेटे को सबसे मूल्यवान उपहार है। राजीव गांधी, हम सब आपसे प्यार करते हैं और आप हमेशा हमारे दिल में रहेंगे।’

स्व. राजीव गांधी की हत्या को आज 27 साल पूरे हो गए। तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक आत्मघाती हमला ने बम विस्फोट कर उनकी जान ले ली थी। वे वहां जब वो एक चुनावी रैली को संबोधित करने जा रहे थे। 21 मई 1991 को रात तकरीबन 10 बजकर 15 मिनट पर राजीव गांधी रैली स्थल पर पहुंचे। वे कार की अगली सीट पर बैठे थे और उन्होंने उतरते ही सबका अभिवादन किया। मंच की ओर बढ़ते हुए एक महिला आत्मघाती हमलावर धनु ने उन्हें माला पहनानी चाही, तो सब इंस्पेक्टर अनुसुइया ने उसे रोक दिया। हालांकि राजीव गांधी के कहने पर उसे माला पहनाने के लिए आने दिया गया। धनु ने उन्हें माला पहनाई और जैसे ही वो उनके पैर छूने के लिए नीचे झुकी, उसने अपने कमर से बंधे बम का बटन दबा दिया। एक जोरदार धमाका हुआ और फिर सबकुछ सुन्न हो गया। इस धमाके ने राजीव गांधी की जान ले ली।

वो लौट कर घर ना आए वे घर से निकले थे मुस्‍कुराते हुए और शाम होते होते महज कुछ चीथडे घर आए, कोई निजी दुश्‍मनी नहीं थी, था तो बस मुल्‍क की नीतियों पर विवाद, यह तथ्‍य सामने आ चुका है कि तमिल समस्या को ले कर वेलुपल्‍ली प्रभाकरण जब दिल्‍ली आया तो राजीव गांधी ने उससे सशस्‍त्र संघर्ष, तमिल शरणार्थियों के भारत में प्रवेश जैेस मसले पर करार चाहा, जिसे उसने इंकार कर दिया था, राजीव गांधी को यह बात पसंद आई नहीं और उन्‍होंने उसे दिल्‍ली के पांच सितारा होटल में कमरे में बंदी बना लिया था, उसे तभी छोडा गया जब वह भारत सरकार की शर्ते मााने को राजी हुआ, हालांकि वह एक धोखा था बस कैद से निकलने का, भारत में भी कई शक्तियां काम कर रही थी, और फिर 21 मई को दुनिया के सबसे दर्दनाक हमले में एक ऐसा व्‍यक्ति मारा गया जिसके द्वार दी गई देश की दिशा से आज भारत की ख्‍याति दुनियाभर में हैं, भले ही किसी को भारतीय होने पर शर्म आती हो, लेकिन कंप्‍यूटर, जल मशिन जैसी कई ऐसी योजनाएं हैं जिसने आज भारत का झंडा दुनिया में गाडा है।

सियासती जुमलों से अलग राजीव गांधी का कार्यकाल देश के विकास का बडा मोड महसूस हुआ, एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसके पास सपना था, दूरगामी योजना थीं, जुमले नहीं थे, अब आप चर्चा कर सकते हैं उनकी मंडली की, गलत फैसलों की , लेकिन इस बात को नहीं भूलना कि जो मुल्‍क अपने शहीदों को सम्‍मान नहीं देता, उसके भविष्‍य में कई दिक्‍कतें आती है। राजीव गांधी देश का ऐसा शख्स जिसने भारत को दुनिया से जोड़ा। इस मॉडर्न सोच ने भारतवर्ष को एक नई ऊर्जा और एक नई शक्ति दी। जो कभी राजनीति में आना नहीं चाहते थे। राजनीति में आने से पूर्व वे इंडियन एयरलाइन्स में एक पायलट थे। भारतीय राजनीति की दुर्गा कही जाने वाली इन्दिरा गाँधी की असामयिक मृत्यु के बाद पूरे देश की नज़रें राजीव पर थी मानो एक आखिरी उम्मीद हो कि ‘राजीव तो है’ देश को सशक्त प्रधानमंत्री की आवश्यकता थी। बेमन राजीव गांधी को लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए राजनीति में आना पड़ा। राजीव गांधी बहुत कुछ अर्थों में ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल थे। हालांकि उनकी इस छवि में कालान्तर में कुछ विवाद भी उत्पन्न हुए थे। अपने श्रेष्ठ प्रशासन व निर्णय शक्ति की बदौलत इस जनप्रिय नेता ने काफी ख्याति प्राप्त की।

उन्होंने एक बार रैली में भाषण देते हुए कहा था कि दिल्ली से 1 रुपये चलता है और लखनऊ तक पहुंचते-पहुंचते 50 पैसे हो जाता है। प्रधानमंत्री होते हुए भ्रष्टाचार पर ये उनकी बेबाक राय थी जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। 21 मई 1991 को मद्रास से 50 कि०मी० दूर श्रीपेरूंबुदुर में एक चुनावी सभा के दौरान सुरक्षा घेरे को तोड़ने के बाद फूलों की माला ग्रहण करते समय श्रीलंकाई आतंकवादी संगठन लिट्टे द्वारा आत्मघाती बम विस्फोट में उनकी नृशंस हत्या कर दी गयी। अपने चहेते युवा नेता की मृत्यु पर सारा देश जैसे स्तब्ध रह गया।

शिल्पी सिंह

सारा लहू बदन का ज़मीं को पिला दिया हमपर वतन का कर्ज था हमने चुका दिया!!

कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर। स्वर्गीय राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी राज की। वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं इसलिये अक्सर लोग कहते हैं हम में हैं राजीव।

श्री राजीव गांधी ने बीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था। स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे। वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है।

अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते है।

वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्‍होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.

चालीस साल की उम्र में विश्व के सबसे युवा प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली.

देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के हत्या के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे.

अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 411 सीटें हासिल कीं.

सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की सेवा की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी राजीनीति में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे राजनीति में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.

राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही.

बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.

उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था.

उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे 1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.

कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन 23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए.

उन पर राजनीति में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए.

उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई. इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ.

वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा. उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं.

इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गार्ड के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.

राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया. आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा। देश स्वर्गीय राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाता है।

✍ शिल्पी सिंह

मोदीक्रेसी फेल, डेमोक्रेसी पास :

भाजपा के बीएस येदुरप्‍पा सोमवार को कर्नाटक विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाए। ढाई दिन तक सीएम पद पर रहने के बाद उन्‍हें आखिरकार इस्‍तीफा देना पड़ा। कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 में भले ही कांग्रेस हार गई। लेकिन तीसरे नंबर की पार्टी जनता दल- सेक्‍युलर को सीएम पद का ऑफर देकर वह कांग्रेस हारकर ‘जीतने वाले बाजीगर’ की तरह उभरकर सामने आई। कुल मिलाकर कांग्रेस का जेडी-एस को समर्थन देने का दांव हिट रहा। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होकर भी सत्‍ता से बाहर हो गई। कांग्रेस के अध्‍यक्ष राहुल गांधी के लिए गुजरात में नैतिक जीत के बाद येदुरप्‍पा का इस्‍तीफा एक बड़ी खबर है। इससे दो बातें साबित होती हैं।

पहली- राहुल गांधी के अध्‍यक्ष बनने के बाद यह दूसरा मौका है जब कांग्रेस लूजर की तरह चुनाव नहीं लड़ा और बीजेपी से हर मोर्चे पर फाइट की। चाहे मामला चुनावी या बहुमत के आंकड़े को लेकर हुई जोड़-तोड़।

दूसरी- कर्नाटक से कांग्रेस के लिए एक और अहम बात यह निकलकर सामने आती है कि राहुल गांधी के अध्‍यक्ष बनने के बाद कांग्रेस का थिंक टैंक एक्टिव नजर आ रहा है। कर्नाटक से कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को स्‍पष्‍ट संकेत भेजा है कि कांग्रेस रणनीति बनाना जानती है और उसे जमीन पर उतारना भी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कर्नाटक फ्लोर टेस्‍ट के दौरान देखने को मिला, जहां कांग्रेस विधायक तोड़ना बीजेपी के लिए एकदम असंभव सा काम हो गया। यही कांग्रेस की सबसे बड़ी जीत है।

इसमें सबसे बड़ी खास बात रही कि कांग्रेस एकजुटता के साथ राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक कोर्ट से लेकर सदन तक मे बीजेपी को पछाड़ दिया और मणिपुर और गोवा जैसा स्थिति नही बनने दिया।

✍ शिल्पी सिंह

BJP बिना विधायकों के भी ‘सरकार’ बना सकती है क्योंकि इनके पास CBI, ED और IT सेल है, जो अमित शाह के इशारे पर काम करती हैं :

कर्नाटक के राजनीतिक घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस-जेडीएस की याचिका पर शनिवार (19 मई) को कर्नाटक विधानसभा में बहुमत परिक्षण कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने फैसले के मुताबिक बीजेपी की येदुरप्पा सरकार को 28 घंटों के भीतर 111 विधायकों के समर्थन का जुगाड़ करना होगा।
बीजेपी के पास अभी 104 विधायकों की संख्या है। सदन में बहुमत साबित करने के लिए बीजेपी को 7 और विधायकों की ज़रूरत है। ऐसे में यह अटकलें अब तेज़ हो गई हैं कि बीजेपी विधायकों को खरीदने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। एक पार्टी देश के लोकतंत्र को लगातार कमजोर करने का काम कर रही है। सभी संवैधानिक संस्थाओं को अपनी तरह से इस्तेमाल कर रही है और कोई अफसोस, कोई सफाई भी नहीं दे रही। दरअसल, उसे सफाई देने की जरूरत ही नहीं पड़ रही क्योंकि उसका काम करने के लिए बहुत लोग हैं जो बिना कहे सफाई दिए जा रहे हैं। इनमें सिर्फ उसके समर्थक नहीं बल्कि बड़े पत्रकार, बैंकर, बुद्धिजीवी और युवा शामिल हैं जिन्हें कोई मतलब नहीं कि सरकार रोजगार क्यों पैदा नहीं कर पा रही? उन्हें नीरव, माल्या, मेहुल चौकसी, राफेल या व्यापम से भी कोई मतलब नहीं। यह वर्ग बस किसी भी कीमत पर अपनी पार्टी को जीतते हुए देखना चाहता है क्योंकि उसे समझाया दिया गया है कि ‘हम ही तुम्हारी आखिरी उम्मीद हैं।’ भाजपा का यह नया समर्थक वर्ग उसके हर गलत काम का बचाव करता नजर आता है। जैसे ही कोई सवाल करता है यह तुरंत उसे याद दिलाता है कि जैसा कांग्रेस ने किया वैसा उसके साथ हो रहा है; जो कांग्रेस ने बोया उसी को काट रही है! अरे भाई, कांग्रेस के साथ जो हो रहा है वह ठीक है पर आप यह तो देखिए कि आपके साथ क्या हो रहा है? आपके लोकतंत्र का आपकी सहमति से गला घोंटा जा रहा है और आप खुश हो रहे हैं, समर्थन में दलीलें दे रहे हैं। कल को अगर भाजपा इमरजेंसी लगा दे तब भी आप यही कहेंगे कि कांग्रेस ने भी तो लगाई थी, अब भाजपा ने लगा दी तो क्या गलत किया? कुछ गलत नहीं किया, लेकिन जिस तरह एक आदमी को इतना ताकतवर बना दिया गया है कि चुनाव के बाद अगर पार्टी को बहुमत न मिले तो कहा जाता है कि ‘अमित शाह हैं न, सरकार बना ही लेंगे!’ लोग सोचते हैं कि अमित शाह ताकतवर बन रहे हैं तो इससे हमें क्या नुकसान है! वे यह भूल रहे हैं कि जो आदमी ताकत पाने के लिए आप से हाथ मिलाएगा वह ताकत पाने के बाद पलट कर जरूर आएगा। और फिर वह अपने ‘मन की बात’ करेगा जो आपको सुननी ही पड़ेगी। भाजपा ने गोवा, मेघालय, मणिपुर और अब कर्नाटक में जिस तरह सरकार बनाई है उसने दिखा दिया कि सत्ताधारी पार्टी जब चुनावों में खेलती है तो वह सिर्फ ग्यारह खिलाड़ियों के साथ नहीं खेलती बल्कि दो अंपायरों के साथ भी खेलती है!
एक चीज याद रखिए जस्टिज काटजू ने कहा था की 90% भारतीय मूर्ख हैं, और ये बात सच भी है ।
हमारी मूर्खता का पैमाना ये है की एक आदमी लाखों का सूट बूट पहनकर कहता है की मैं गरीब हूं और हम उसे गरीब मान लेते हैं ।
सीबीआई, एन आइ ए जैसी एजेंसियां जिस आदमी के हाथों की कठपुतली हैं वह आदमी कह रहा है की मुझे सताया जा रहा है और हम मान लेते हैं ।
जो संसद मे पूर्ण बहुमत मे है बीस से ज्यादा राज्यों मे सरकार है वह कहता है मुझे काम नही करने दिया जा रहा है और हम मान लेते हैं ।
जो भ्रष्टाचार मे जेल मे रह चुके लोगों को टिकट देता है फिर कहता है मै भ्रषटाचार के खिलाफ लड़ रहा हूं और हम मान लेते हैं ।
जिसके शासन मे सबसे ज्यादा हमारे सैनिक शहीद हुए हैं वह कहता है दुश्मन हमसे कांप रहा है और हम मान लेते हैं ।
जिसके समय मे सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है और वह कहता है हमने किसानों की आय दुगुना कर दी है और हम मान लेते हैं ।
जिसके समय मे पकौड़ा तलने के लिए कहा जाता है और हम.उसे रोजगार मान लेते हैं ।
जिसके राज्य मे सबसे ज्यादा बलात्कार हो रहे हैं और वह कहता है हम बेटी बचाव अभियान.चला रहे हैं और हम मान लेते हैं ।
जो सुंदर भविष्य का सपना दिखाकर सत्ता मे आया हो और चार सौ साल पहले के भूतकाल मे हमे घुमा रहा हो और फिर भी हम खुश हैं ।
मित्रों ये सब हमारी मूर्खता की वजह से हो रहा है ।
पर भक़्त को ये सब गलत ही लगेगा।

✍ शिल्पी सिंह

विधायक खरीदने में हो रही दिक्कत से तिलमिलाए भाजपा मंत्री, प्रकाश जावडेकर :

कर्नाटक में राज्यपाल की मदद से फिलहाल बीजेपी की सरकार तो बन गयी है, पर बहुमत साबित करने के लिए विधायकों का जुगाड़ करना अभी भी चुनौती बनी हुई है।

येदियुरप्पा ने आनन-फानन में अमित शाह के भरोसे में मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली पर साथ ही हैरानी भी जताई कि पूरा दिन गुज़र जाने के बाद भी अमित शाह एक विधायक भी क्यों नही खरीद पाए।

“जब मोदी जी ने शाह को पूरा खजाना ही खोल के दे दिया है तो आखिर ये मोटा भाई क्यों कुछ नहीं कर पा रहा है!” -येदियुरप्पा ने अमित शाह की क्षमता पर सवाल उठाते हुए फ़ेकिंग न्यूज़ को बताया। वहीँ, येदियुरप्पा के आरोपों को खारिज करते हुए अमित शाह ने साफ किया है कि विधायकों के साथ डील तो हो गई थी पर SBI का सर्वर डाउन होने की वजह से ट्रांजेक्शन नही हो पाया। कर्नाटके 224 में से 222 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए थे। बीजेपी के सिर्फ 104 विधायक जीते हैं जबकि बहुमत के लिए 112 चाहिए। अब बीजेपी आठ विधायक कहां से लाएगी? जाहिर है विधायक बनाने की कोई मशीन तो है नहीं इसलिए बीजेपी कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को तोड़ने की कोशिश करेगी। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने प्रेस कांफ्रेंस कर बताया है कि ”कर्नाटक कांग्रेस ने अपने विधायको को बंधक बना के रखा है, फोन ले लिए हैं न्यूज़ नही देखने दे रहे है। यहां तक कि परिवार वालों से भी बात नहीं करने दे रहे। ये रिसोर्ट पॉलिटिक्स नही बल्कि डरावनी राजनीति है।”

कर्नाटक चुनाव परिणाम के अगले दिन यानी 16 मई को एच डी कुमारस्वामी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया था कि जेडीएस के प्रत्येक विधायक को 100 करोड़ रुपए ऑफर किए जा रहे है। और अगर ऐसी स्थिति में कांग्रेस-जेडीएस अपने विधायकों को छिपाए हुए हैं तो दिक्कत क्या है? सवाल तो ये भी उठता है कि केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कांग्रेस नेताओं से संम्पर्क करने की कोशिश ही क्यों करे रहे हैं? प्रकाश जावड़ेकर को कांग्रेस नेताओं के फोन बंद होने से क्या दिक्कत है? आप को बता दें कि भले ही पूर्ण बहुमत से चंद कदम दूर रह जाने के बावजूद कर्नाटक विधानसभा में भाजपा सरकार का वर्चस्व कायम हो गया हो लेकिन बीएस येदियुरप्पा द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से भाजपा को लगातार हमलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा ही एक हमला भाजपा के ही नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने किया है। दरअसल, कर्नाटक में राज्यपाल द्वारा भाजपा के हित में लिया गया फैसला जेठमलानी को नागवार गुजरा है। उन्होंने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

कल शाम 4 बजे होगा बहुमत परीक्षण, बीजेपी इसके लिए तैयार नही, लगा बड़ा झटका, गिर सकती है येदयुरप्पा की सरकार :

कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने के बाद भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं. लेकिन विवाद अभी थमा नहीं है। कर्नाटक में बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता देने के बाद उपजे विवाद पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि कर्नाटक में शनिवार यानी कल ही फ्लोर टेस्ट कराया जाएगा। यानी अब तय हो गया कि कर्नाटक में बीजेपी को बहुमत साबित करने के लिए अब 14 दिनों का समय नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट की 3 सदस्यीय बेंच के सामने बीजेपी और कांग्रेस-जेडीएस के पक्ष में दलीलें रखी गईं। सबसे पहले बीजेपी की तरफ से सुप्रीम कोर्ट को वह लेटर उपलब्ध कराया गया जिसे येदियुरप्पा की तरफ से राज्यपाल को भेजा गया था। कर्नाटक में जारी सियासी संग्राम के बीच सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार शाम 4 बजे शक्ति परीक्षण का आदेश दिया। सर्वोच्च अदालत में तीन जजों की पीठ ने 24 घंटे के अंदर बहुमत परीक्षण और शपथ ग्रहण की समीक्षा कराने के 2 सुझाव दिए थे। पीठ ने कहा कि सरकार बनाने के लिए राज्यपाल को किस पार्टी को बुलाना चाहिए था, इसका फैसला बाद में किया जाएगा। कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर द्वारा विश्वास मत परीक्षण के आदेश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि 24 घंटे के अंदर बहुमत परीक्षण ही इस वक्त सर्वोत्तम विकल्प नजर आ रहा है। कोर्ट ने कर्नाटक के डीजीपी को शक्ति परीक्षण के लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कराए जाने का भी निर्देश दिया। कांग्रेस के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने फ्लोर टेस्ट की विडियोग्राफी करवाने की भी मांग की। पीठ ने इसका फैसला लेने का अधिकार राज्यपाल के विवेक पर छोड़ा। यह सुनवाई कांग्रेस-जेडीएस की याचिका पर हुई, जिसमें दोनों पार्टियों ने राज्यपाल वजुभाई वाला के फैसले को चुनौती दी थी। दोनों पार्टियों का इसमें कहना था कि राज्यपाल ने 104 सीटें होने के बाद भी बीजेपी को सरकार बनाने के लिए निमंत्रण भेजा, जबकि सरकार में बहुमत के लिए 112 सीटें चाहिए थीं। कर्नाटक के सियासी नाटक को लेकर आज (18 मई) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने राज्यपाल वजुभाई का फैसला पलटते हुए कहा कि शनिवार (19 मई) को शाम चार बजे शक्ति परीक्षण कराया जाएगा। फ्लोर टेस्ट में जो भी दल बहुमत साबित करने में सफल रहेगा, सरकार उसी की बनेगी। सुनवाई के दौरान भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर से मुकुल रोहातगी वकील थे, जबकि कांग्रेस का पक्ष अभिषेक मनु सिंघवी ने रखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बेहतर ये होगा कि शनिवार को फ्लोर टेस्ट हो ताकि किसी को कोई वक्त ना मिले बजाए इसके कि राज्यपाल के येदियुरप्पा को आमंत्रित करने के फैसले की वैधता पर सुनवाई हो. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साबित हो गया कि येदियुरप्पा के पास विधायकों की पर्याप्त संख्या नहीं है। यह बात कोर्ट के फैसले के बाद अभिषेक मनु सिंघवी ने कही। उन्होंने कहा कि येदियुरप्पा की तरफ से राज्यपाल को दिए गए जो पत्र सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए उसमें लगता है कि सरकार बनाने के लिए जरूरी विधायकों का सर्मथन नहीं था। इसीलिए हमें भरोसा है कि हम 100 फीसदी इस परीक्षण को जीतेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा में एक एंग्लो-भारतीय विधायक को नामित करने के राज्यपाल के फैसले पर रोक लगा दी है। कांग्रेस ने इस पर रोक लगाने की मांग की थी।

✍ शिल्पी सिंह

“ये मोदी है, लेने के देने पड़ जायेंगे” के बाजारू बोल से भाषाई गुंडागर्दी तक गिर चुके प्रधान मंत्री की जुबान।

सीमा पार करोगे तो ये मोदी है, लेने के देने पड़ जायेंगे”

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी बीते 6 मई को हुबली कर्नाटक की एक सभा मे बोलते हुए प्रधानमंत्री ने, सड़क छाप भाषा में किसी छुटभैय्ये मोहल्लावीर की तरह कांग्रेसी नेताओं को, जितनी बेशर्मी से धमकाया था उतनी ही बेशर्मी के साथ उसका वीडियो, “इसको कहते हैं दमदार प्रधानमंत्री” के कैप्शन के साथ उनके अंधसमर्थको ने सोशल मीडिया में फैलाया हुआ है!

“ये मोदी है, लेने के देने पड़ जायेंगे” के बाजारू बोल से भाषाई गुंडागर्दी तक गिर चुके प्रधान मंत्री की जुबान से, विरोधियों के लिए, शाब्दिक कूड़ा करकट झड़ना कोई नयी बात नहीं है! उनके स्कूली सनद में दर्ज श्रेणी और अंक की जानकारी देशवासियों को भले आज तक न हो पाई हो मगर व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के सबसे मेधावी ये साहेबान और इतिहास ज्ञान, सांस्कृतिक बोध और दर्शन सिद्धान्त की वैचारिक उल्टियां करने वाले माननीय महोदय का सीना झूठ बोलने के मामले में यकीनन 56 इंच है!

2014 के बहुउच्चारित और बहुप्रचारित मगर अब आडवाणी जी की तरह देश की ” धरोहर” हो चुके “अच्छे दिन” के विश्वप्रसिद्ध “जुमला ब्राण्ड” कारपेट पर चल कर, संसद की सीढ़ियों में दण्डवत होने का हाईवोल्टेज अभिनय करने वाले इस कथित प्रधान सेवक के पास असंसदीय और अमर्यादित शब्दों के मायाजाल के अलावा कभी कुछ ठोस, दिखाने को रहा ही नहीं है!

पिछले 70 साल के कांग्रेसी हिसाब किताब में अपना कार्यकाल भी घुसा देने वाले, देश के पहले अद्वितीय और अभूतपूर्व प्रधानमंत्री, अपने हर पब्लिक उचाव में अपने कार्यकाल की उपलब्धियां बताने की बजाय “फांसी चढा देना”, “गोली मार देना” , “मेरी जान को खतरा” जैसे भावनात्मक वाक्यों के सहारे लोगों के दिलों में दाखिल होने का देशी जुगाड़ तलाशते रहते है!
पिछले चार साल से कारपोरेटी ऋण से उऋण हो रही इस सरकार के मुखिया की नीति और कार्यक्रमों की कोई चर्चा सरकार पोषित मीडिया में तो होने से रही, हां एक दो मीडिया संस्थान जिन्हें अक्सर कांग्रेसी या वामपंथी कह कर खारिज कर दिया जाता है, वहां सरकार पर थोड़े बहुत साल जरूर उठते रहते है मगर वो भी अपनी अधिकतर ऊर्जा मुख्य सेवक के झूठ और जुमलों को काउंटर करने में ही जाया करते है! इधर वामी इंटेलेक्चुएल्स का एजेंडा कुछ ऐसा होता है कि उनके मुद्दों से मोदी सरकार घिरने की बजाय और ज्यादा आक्रमक हो जाती है!

कुछ तटस्थ इंटेलेक्चुएल्स को छोड़ दिया जाय तो इस सरकार के कार्यकाल का पिछली सरकार के कार्यों के साथ कोई तुलनात्मक और आलोचनात्मक विश्लेषण कभी होता ही नहीं है! ऐसे में स्वयं प्रधानमंत्री के लिए विरोधियों की कमर से नीचे वार करने का भरपूर अवसर होता है मगर वो ऐसे वार करने में भी शब्द और लहजा ऐसा चुनते है कि जैसे गली कोई गुंडा तैश में आकर देख लेने की धमकी दे रहा हो! कुल मिला कर देश की राजनैतिक फ़िज़ा कुछ ऐसी है कि देश का मुखिया, जानबूझ कर भाषायी ओछरन देश पर उड़ेल देता है जिसे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का बड़ा हिस्सा चाटने लगता है और कुछ हिस्सा उसकी बदबू पर डियोडरेंट स्प्रे करने लगता है।

282 सांसदों के लावलश्कर के साथ पूर्ण बहुमत हासिल सरकार के माननीय मुखिया और सत्ताधारी पार्टी के अति सुविख्यात अध्यक्ष, पब्लिक मीटिंग के दौरान धमकी भरे शब्दों की ऐसी खट्टी डकारें मारते है जैसे वो सरकार नहीं मुम्बई का कोई आपराधिक गैंग चला रहे हो! अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान बन्द कमरें में अपने पिठ्ठू पत्रकारों के तयशुदा सवालों का जवाब देने वाले 56 इंची सीने में इतना भी कलेजा नहीं है कि वो एक खुली प्रेस कांफ्रेंस करके जनता से सीधे सम्वाद कर सकें!

सरकार की उपलब्धियां दिखाने की बजाय अपने शब्दों और भाषा के ओछेपन से राजनैतिक विरोधियों को आतंकित करने की कोशिश करने वाले प्रधानमंत्री महोदय की जुबान से झड़ने वाले शब्द जिन्हें सुहाते है, वो उनकी चरण वंदना बेशक करें मगर चाल, चरित्र और चेहरा की आड़ में घटिया शब्दावली और भाषा के शोर के अलावा उनकी कोई उपलब्धि हो तो मुझे भी अवगत करावें ताकि उनके वरिष्ठ पीएम इन वेटिंग लौहपुरुष के और उनके वरिष्ठ पार्टी साथियों के श्राप से इस गुजराती जोड़ी को मुक्ति दिलाने के लिए कोई श्लोक या मंत्र पढ़ने का हौसला मुझे भी मिल सके! बाकी इतिहास को तो माननीय प्रधानमंत्री के क्रांतिकारी जुमलों और शब्दगुंडई को सम्हाल के रखना ही है!

✍ शिल्पी सिंह

दो दिन के लिये छत्तीसगढ़ दौरे पर राहुल, कई कार्यक्रमों में करेंगे शिरकत :

एक तरफ जहां कर्नाटक में सरकार बनाने को लेकर रस्साकशी चल रही है. दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने अगले मिशन की तैयारी में लग गए हैं।

आज से राहुल गांधी अपने दो दिवसीय दौरे पर छत्तीसगढ़ जाएंगे। जहां वो कई तरह कार्यक्रमों में भाग लेंगे।

राहुल अपने दो दिवसीय दौरे में किसानों और आदिवासियों के बीच पार्टी का आधार मजबूत करने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होंगे. छत्तीसगढ़ में इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं. उसी समय मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी चुनाव होंगे.

कांग्रेस के छत्तीसगढ़ प्रभारी पीएल पूनिया ने बताया कि राहुल गांधी का दो दिवसीय छत्तीसगढ़ दौरा हो रहा है. वह किसानों, आदिवासियों और समाज के दूसरे वर्गों के लोगों से मिलेंगे, उनका एक रोड शो भी होगा.

उन्होंने दावा किया, ‘‘रमन सिंह सरकार के कुशासन से किसान, मजदूर, आदिवासी और दूसरे सभी वर्गों के लोग परेशान हैं, लोग इस सरकार से मुक्ति चाहते हैं. कांग्रेस अध्यक्ष के दौरे से पार्टी की उम्मीदों को बहुत बल मिलेगा.’’

पुनिया के मुताबिक, राहुल 17 मई को पंचायतीराज सम्मेलन का रायपुर में उद्घाटन करेंगे. इसके बाद वह सीतापुर में किसान सम्मेलन में भाग लेंगे. 17 मई को पेंड्रा में जन अधिकार सभा को संबोधित करेंगे.

वह 18 मई को बिलासपुर संभाग के 24 विधानसभा के बूथ प्रभारियों से संवाद करेंगे, इसके बाद वह दुर्ग संभाग के 20 विधानसभा क्षेत्रों के बूथ प्रभारियों से बातचीत करेंगे. 18 मई की शाम को दुर्ग में गांधी और पटेल की प्रतिमा में मार्ल्यापण करने के बाद राहुल रोड शो करेंगे, यह रोड शो दुर्ग से रायपुर एयरपोर्ट तक होगा.

याद हो कि 2013 में थोड़ा आया अंतर से कांग्रेस सरकार बनाने से चूक गई थी जिसका कारण कांग्रेस का मध्यप्रदेश और राजस्थान के कारण छतीसगढ़ चुनाव पर कम ध्यान देना बताया गया था। इसलिये राहुल इस बार ऐसी गलती दोहराना नही चाहते हैं। क्योंकि कांग्रेस जिस तरह से एक के बाद एक राज्यो में पराजय का सामना कर रही है उसके बाद कार्यकर्ताओं में काफी निराशा है और मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत को मुहर लग रहा है इसलिये राहुल अब भाजपा शासित राज्यो में भाजपा को उखाड़ फेंकने की संकल्प के साथ छतीसगढ़ से अभियान की शुरुआत कर रहे हैं।

✍ शिल्पी सिंह

लाख कोशिश करने के बाद भी भाजपा बहुमत से दूर :

कर्नाटक का सियासी पारा भी चढ़ने लगा है. बेंगलुरु में मौजूद कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि बीजेपी उनके विधायकों को धमका रही है. उन पर दबाव बना रही है, उसे लोकतंत्र में भरोसा नहीं, आजाद ने कहा कि अगर राज्यपाल ने संवैधानिक मूल्यों का पालन नहीं किया और हमें सरकार बनाने के लिए निमंत्रित नहीं किया, तो यहां खूनी संघर्ष होगा.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस विधायकों के असंतुष्ट होने की अफवाहें फैलाई जा रही हैं, लेकिन वास्तव में बीजेपी असंतुष्ट है.इस बीच कांग्रेस विधायक अमरेगौड़ा ने कहा है कि बीजेपी ने उन्हें कैबिनेट मंत्री के पद का ऑफर दिया था, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया.

अमरेगौड़ा लिंगनागौड़ा पाटिल बयापुर कर्नाटक के कुश्तगी से विधायक हैं. आजाद ने कहा कि राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बीजेपी के पास बहुमत का आंकड़ा नहीं है. बीजेपी के पास 104 सीटें हैं, हमारे (कांग्रेस-जेडीएस) पास 117 सीटें हैं. राज्यपाल पक्षपाती नहीं हो सकते हैं.

कर्नाटक में फिलहाल त्रिशंकु विधानसभा के आसार दिख रहे हैं यानी किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जो आंकड़ा नजर आ रहे हैं वो इस प्रकार है- बीजेपी-104, कांग्रेस-78, JDS-37 अन्य-3 224 में से 222 सीटों पर चुनाव हुआ है यानी बहुमत के लिए 112 सीट चाहिए, जो किसी भी पार्टी के पास नहीं है।

हालांकि कांग्रेस ने JDS को मुख्यमंत्री पद ऑफर करते हुए बिना शर्त समर्थन देने को तैयार है। लेकिन बीजेपी शांत तो बैठने वाली है नहीं…जाहिर है अब विधायकों की खरीद फरोख्त शुरू होगी, धनबल, बाहूबल का प्रयोग होगा। एक राजनीतिक पार्टी दूसरे राजनीतिक पार्टी के विधायकों को खरीदने का प्रयास करेगी, सभी राजनीतिक दल अपने-अपने विधायकों को बचाने का प्रयास करेंगे। बीजेपी जहां बहुमत के आंकड़े छूने में नाकाम रही है तो कांग्रेस ने बिना मौका गंवाए जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) को समर्थन देने का ऐलान करते हुए उन्हें सीएम पद का ऑफर दे दिया है। वहीं बीजेपी ने भी सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है। ऐसे में अब राज्यपाल के विवेक पर ही सबकुछ निर्भर करता है। आमतौर पर राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं, लेकिन हाल में हुए गोवा, मेघालय और मणिपुर विधानसभा चुनावों में चुनाव के बाद बने नए गठबंधन को सरकार बनाने का मौका दिया जा चुका है।

इसलिए कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार बनने के ज़्यादा आसार नज़र आ रहे हैं। गठबंधन सरकार की संभावना भले ही ज़्यादा हों लेकिन बीजेपी भी राज्य में सत्ता पर काबिज़ होने के लिए सारे जतन करती दिखाई दे रही है। बीजेपी द्वारा विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की आशंका भी जताई जा रही है। बीजेपी 104 पर सिमट गई है । कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर (78+38=116 )दावा पेश किया लेकिन राज्यपाल ने ठुकरा दिया काश राज्यपाल ने गोवा , मणिपुर और मेघालय में भी यहीं किया होता ?

अब बीजेपी के पास एक ही रास्ता है कि अब कांग्रेस या जेडीएस के विधायको से अलग अलग मिलकर उन्हे CBI, ED और IT का डर दिखाकर अपनी ओर मिला ले या कम से कम 8 विधायको को खरीद ले । बीजेपी के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं होगी उसने पहले भी उत्तराखंड और अरुणाचल में ऐसा कर चुकी है । या दूसरा रास्ता ये हो सकता है कि बीजेपी पूरी JDS पार्टी के पीछे ही CBI , ED या IT को लगा दे तो BJP और JDS (104+38=142) की सरकार बन जाये । यदि बीजेपी को कर्नाटक में सरकार बनानी है तो इन सभी असंवैधानिक रास्तो में से किसी न किसी रास्ते को अपनाना होगा ।

इन सभी खेल के बीच राज्यपाल की भूमिका भी अहम होगी । यह तो निश्चित है कि कर्नाटक में सरकार चाहे जिसकी बने जीत तो केवल धर्म की ही हुई है इसलिए अगले पाँच साल तक कर्नाटक में आधिकाँस काम धर्म के विकास का ही होगा जैसे कि 2014 से राष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है।

✍शिल्पी सिंह

कर्नाटक चुनाव का नाटकीय हाल, किसी को बहुमत नही मगर कांग्रेस-जेडीएस के चाल से भाजपा परेशान

कर्नाटक चुनाव के जैसे-जैसे नतीजे आ रहे थे, वैसे-वैसे प्रदेश में नई सरकार के गठन को लेकर पूरा घटनाक्रम नाटकीय और अनिश्चित होता जा रहा था। और दोनों पक्षों द्वारा सरकार बनाने का दावा पेश करने के बाद अब आखिरकार गेंद राज्यपाल के पाले में है।

नतीजे आने के बाद बनी स्थिति के अनुसार, बीजेपी के पास 104 विधायक हैं, कांग्रेस के पास 78, जेडीएस गठबंधन के पास 38, एक निर्दलीय और एक विधायक कर्नाटक प्रज्ञावंथा जनता पार्टी का है।

224 में से फिलहाल 222 सदस्यों की विधानसभा में किसी भी दल के पास बहुमत नहीं है। सरकार बनाने के लिए किन्हीं दो पार्टियों का साथ आना जरूरी है। इसलिए रूझान आने के थोड़ी देर बाद ही कांग्रेस ने जेडीएस को मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव देकर शह और मात के इस खेल में पहली बड़ी चाल चल दी थी और जेडीएस ने इसे स्वीकार भी कर लिया।

इतना तो तय है कि अगर बीजेपी सरकार बना भी लेती है तो उसके लिए बहुमत जुटाना बहुत मुश्किल होगा क्योंकि किसी भी पार्टी को तोड़ने के लिए दो-तिहाई विधायकों का निकलना दल-बदल कानून के हिसाब से जरूरी होता है और ऐसा होने की संभावना बहुत कम है।

एक दूसरी संभावना भी है। अगर कांग्रेस या जेडीएस के कम से कम एक दर्जन विधायक विश्वास मत के दौरान अनुपस्थित रहते हैं या अयोग्यता का खतरा उठाते हुए पार्टी के व्हिप के खिलाफ जाकर वोट करते हैं तो ही बीजेपी की सरकार चल सकती है।

क्या बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव के लगभग एक साल पहले खरीद-फरोख्त का आरोप सहने का खतरा उठाने के लिए तैयार है? क्या उसे लोकसभा सीटों की परवाह नहीं? पार्टी की अब तक की भाव-भंगिमा को देखकर ऐसा निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

यह बिल्कुल 2014 के दिल्ली विधानसभा चुनाव जैसी स्थिति है जब बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होते हुए बहुमत से दूर थी और कांग्रेस के समर्थन से आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाई थी। सरकार गिरने के बाद भी बीजेपी जनता में जाने वाले गलत संदेश की वजह से आम आदमी पार्टी के विधायकों को अपने पाले में करने से हिचकिचाती रही क्योंकि लोकसभा चुनाव आने वाले थे। लेकिन अब तो केंद्र में सरकार भी उनकी है और राज्य में राज्यपाल भी। इसलिए थोड़ा संशय होना लाजिमी है।
यह संशय उस समय भी था जब नतीजे आ रहे थे। थोड़ी ही देर बाद ऐसा लगने लगा कि बीजेपी को बहुमत मिल जाएगा। एक समय तो बीजेपी रुझानों में बहुमत के आंकड़े को पार भी कर गई थी, लेकिन फिर एक-एक कर उसकी संख्या कम होने लगी और वह 104 पर अटक गई।

राज्यपाल के पास सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए भी बारी-बारी से बीजेपी के सीएम उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा और कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के दावेदार एचडी कुमारस्वामी पहुंच गए। हर तरफ अनिश्चितता और कोलाहल जैसा माहौल बन गया था।सब की निगाह राजपाल पे है औऱ अभी भी है।

✍ शिल्पी सिंह

Latest News