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जीतू पटवारी और डॉ. विक्रांत भूरिया फिर बालाघाट में: बच्चों की मौत पर सरकार की चुप्पी के खिलाफ आर-पार की लड़ाई

27 हजार बैगा बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं, मौतों के बाद सरकार का ध्यान इलाज पर नहीं बल्कि नैरेटिव मैनेजमेंट पर क्यों?

मध्य प्रदेश के बालाघाट में बच्चों की लगातार हो रही मौतों ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। एक तरफ मासूम बच्चों की जान जा रही है, आदिवासी परिवार अपने बच्चों को खोने के दर्द से गुजर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार इस गंभीर संकट का समाधान करने के बजाय पूरे मामले को दबाने और जनता का ध्यान भटकाने में जुटी दिखाई दे रही है।

इसी मुद्दे को लेकर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष श्री जीतू पटवारी और आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया आज पुनः बालाघाट पहुंचे हैं। दोनों नेताओं का बालाघाट पहुंचना स्पष्ट संकेत है कि कांग्रेस अब इस मुद्दे पर सरकार को चैन से बैठने नहीं देगी।

यह सिर्फ बच्चों की मौत का मामला नहीं है। यह सवाल है कि क्या मध्य प्रदेश सरकार अपने सबसे कमजोर और वंचित नागरिकों के जीवन की कोई कीमत समझती है?

बच्चों की मौत पर सरकार का ध्यान राहत पर नहीं, कहानी बदलने पर है?

बालाघाट में लगातार बच्चों की मौतों के बाद सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कांग्रेस और स्थानीय लोगों का आरोप है कि वास्तविक समस्याओं को सामने लाने के बजाय मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है।

सबसे गंभीर आरोप यह है कि सरकार समर्थित फर्जी या तथाकथित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को मैदान में उतारकर जनता के बीच एक अलग नैरेटिव बनाने का प्रयास किया गया।

सवाल सीधा है—अगर सरकार के पास बच्चों की मौतों का सच है, अगर व्यवस्था सही थी और अगर कोई लापरवाही नहीं हुई, तो फिर सच्चाई को छिपाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

सरकार को सोशल मीडिया प्रचारकों की जरूरत नहीं है। उसे स्वतंत्र जांच की जरूरत है। उसे जवाबदेही की जरूरत है। उसे उन परिवारों के सामने खड़ा होना चाहिए जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है।

मौतों के बाद प्रचार नहीं, इंसाफ चाहिए।

देश की विशेष रूप से कमजोर जनजाति बैगा के 27 हजार बच्चे कुपोषित

बालाघाट का संकट केवल हालिया मौतों तक सीमित नहीं है। यह उस गहरे सरकारी संकट की तस्वीर है जिसमें आदिवासी समुदाय वर्षों से जी रहा है।

बैगा जनजाति देश की विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) में शामिल है। इन समुदायों के लिए केंद्र और राज्य सरकार विशेष योजनाएं और भारी बजट निर्धारित करती हैं ताकि उनके स्वास्थ्य, पोषण और जीवन स्तर में सुधार हो सके।

लेकिन जमीनी हकीकत क्या है?

लगभग 27 हजार बैगा बच्चे कुपोषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। उनकी जिंदगी खतरे में है। उनके परिवार गरीबी और बीमारी के बीच संघर्ष कर रहे हैं।

फिर सवाल उठता है कि आदिवासी विकास और पोषण के नाम पर आने वाला भारी बजट आखिर कहां जा रहा है?

कौन जिम्मेदार है?

किस अधिकारी ने निगरानी नहीं की?

किस मंत्री ने जवाबदेही तय नहीं की?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या सरकार को इन बच्चों की जान जाने का इंतजार है?

सरकार के बजट भाषणों में आदिवासी कल्याण प्राथमिकता हो सकता है, लेकिन बालाघाट और बैगा बस्तियों की हकीकत बताती है कि जमीन पर आदिवासी बच्चे अब भी सरकारी उपेक्षा के शिकार हैं।

स्वास्थ्य मंत्री और उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला की जवाबदेही तय होनी चाहिए

डॉ. विक्रांत भूरिया ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि यह लड़ाई किसी एक जिले या एक घटना तक सीमित नहीं है।

रीवा में उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री एवं उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला के इस्तीफे की मांग को लेकर पांच दिनों तक न्याय सत्याग्रह किया। यह सत्याग्रह उन परिवारों की आवाज था जिनके बच्चों की मौत सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलताओं के बीच हुई।

बालाघाट के बच्चों की मौतें हों, रीवा में स्वास्थ्य संकट हो, सतना में बच्चों को HIV संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने का मामला हो या इंदौर में नवजात बच्चों के साथ हुई भयावह लापरवाही—हर घटना मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

ऐसे में स्वास्थ्य मंत्री की नैतिक जिम्मेदारी क्या है?

क्या केवल अधिकारियों के बयान जारी कर देने से जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है?

क्या मृत बच्चों के परिवारों को न्याय मांगने के लिए धरना देना पड़ेगा?

क्या सरकार तब तक इंतजार करेगी जब तक यह संकट और बड़ा न हो जाए?

डॉ. विक्रांत भूरिया और कांग्रेस की मांग स्पष्ट है—जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और स्वास्थ्य मंत्री को नैतिक आधार पर इस्तीफा देना चाहिए।

मृतक बच्चों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा और रोजगार की मांग

न्याय सत्याग्रह के दौरान आदिवासी कांग्रेस ने मृत बच्चों के परिवारों के लिए ठोस और स्पष्ट मांगें रखी थीं।

प्रत्येक मृत बच्चे के परिवार को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए।

प्रभावित परिवार के एक सदस्य को स्थायी प्रकृति की नौकरी उपलब्ध कराई जाए।

स्वास्थ्य व्यवस्था की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए।

दोषी अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।

आदिवासी क्षेत्रों में पोषण और स्वास्थ्य योजनाओं के बजट का पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित किया जाए।

ये मांगें किसी राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा नहीं हैं। ये उन परिवारों के अधिकार हैं जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है।

एक परिवार जिसने अपना बच्चा खो दिया, उसके लिए कोई भी मुआवजा पर्याप्त नहीं हो सकता। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी है कि वह परिवार को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा दे।

जीतू पटवारी और विक्रांत भूरिया का बालाघाट पहुंचना सरकार के लिए चेतावनी

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी और आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया का पुनः बालाघाट पहुंचना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस इस मामले को राजनीतिक और जनआंदोलन के स्तर पर आगे ले जाने के लिए तैयार है।

यह लड़ाई केवल विपक्ष बनाम सरकार की लड़ाई नहीं है।

यह लड़ाई उन बच्चों के लिए है जिनकी आवाज अब नहीं रही।

यह लड़ाई उन आदिवासी परिवारों के लिए है जो आज भी अपने बच्चों के इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटते हैं।

यह लड़ाई उस व्यवस्था के खिलाफ है जिसमें करोड़ों रुपये के बजट के बावजूद बच्चे कुपोषण से मर रहे हैं।

सरकार को समझना होगा कि जनता अब केवल आश्वासन सुनने के लिए तैयार नहीं है।

सरकार को अब प्रचार नहीं, जवाब देना होगा

मध्य प्रदेश सरकार के सामने आज कई गंभीर सवाल खड़े हैं।

बालाघाट में बच्चों की मौतों की स्वतंत्र जांच कब होगी?

27 हजार कुपोषित बैगा बच्चों की स्थिति सुधारने के लिए तत्काल क्या कदम उठाए जाएंगे?

आदिवासी पोषण योजनाओं का बजट कहां खर्च हुआ?

मृत बच्चों के परिवारों को न्याय और मुआवजा कब मिलेगा?

स्वास्थ्य मंत्री अपनी नैतिक जिम्मेदारी कब स्वीकार करेंगे?

और क्या सरकार उन लोगों पर कार्रवाई करेगी जो वास्तविक मुद्दों को दबाने के लिए कथित रूप से फर्जी नैरेटिव फैलाने का काम कर रहे हैं?

इन सवालों से भागकर कोई सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती।

यह लड़ाई अब रुकेगी नहीं

बालाघाट की घटनाएं मध्य प्रदेश के लिए एक चेतावनी हैं। अगर सरकार ने अब भी आंखें बंद रखीं, अगर बच्चों की मौतों को आंकड़ों में दबाने की कोशिश की गई, अगर आदिवासी परिवारों की आवाज को नजरअंदाज किया गया, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि मानवीय संवेदनहीनता का उदाहरण होगा।

जीतू पटवारी और डॉ. विक्रांत भूरिया का संघर्ष यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस इस मुद्दे को दबने नहीं देगी।

रीवा का न्याय सत्याग्रह हो या बालाघाट में बच्चों की मौतों का मामला—आदिवासी कांग्रेस और मध्य प्रदेश कांग्रेस की मांग एक ही है:

बच्चों की मौत पर जवाबदेही तय हो। दोषियों पर कार्रवाई हो। पीड़ित परिवारों को न्याय मिले और स्वास्थ्य मंत्री इस्तीफा दें।

क्योंकि सरकारें प्रचार से नहीं, अपने सबसे कमजोर नागरिकों की सुरक्षा से पहचानी जाती हैं।

और बालाघाट के बच्चे आज मध्य प्रदेश सरकार से यही सवाल पूछ रहे हैं—हमारी मौतों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

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