Saturday, August 15, 2026
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मोदी के फैसले की आलोचना कर रहे है नीतीश कुमार, भाजपा को लग सकता है बड़ा झटका :

जिस नोटबंदी को बीजेपी सरकार अपनी सबसे बड़ी कामयाबी बता रही है। उसी नोटबंदी पर अब उन्हीं के सयोगी ने सवाल खड़े कर दिए हैं।

एनडीए को समर्थन दे चुके जेडीयू अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नोटबंदी के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। यह वही नीतीश कुमार हैं जिन्होंने पीएम मोदी के नोटबंदी के फैसले का समर्थन किया था। लेकिन अब नीतीश कुमार अपनी ही बातों से पलट गए हैं।

नीतीश ने कहा, “मैं पहले नोटबंदी का समर्थक था, लेकिन इससे कितने लोगों को फायदा हुआ? कुछ लोग अपना पैसा एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट कर ले गए।”

पटना में राज्यस्तरीय बैंकर्स समिति द्वारा आयोजित समीक्षा बैठक को संबोधित करते हुए नीतीश कुमार ने बैंकों के कामकाज पर भी सवाल खड़े कुए। उन्होंने कहा, “बैंक छोटे लोगों से ऋण वसूलने में ताकत दिखाते हैं, लेकिन उन ताकतवर लोगों का क्या जो लोन लेकर गायब हो जाते हैं? यह आश्चर्यजनक है कि बैंकों के वरिष्ठ अधिकारियों तक को भी इसकी भनक नहीं लगती। बैंकिंग सिस्टम में सुधार की जरूरत है, मैं आलोचना नहीं कर रहा हूं, सिर्फ व्यक्त कर रहा हूं।”

नीतीश कुमार ने कहा, “इस दौर में बैंकों को अपना सिस्टम मजबूत बनाना होगा, क्योंकि बैंकों का काम सिर्फ जमा, निकासी और लोन-देना ही नहीं रह गया है, देश की प्रगति में बैंकों की बड़ी भूमिका है।

ऐसा माना जाता है कि नीतीश कुमार जब किसी से अपना समर्थन वापस लेते हैं तो पहले उसकी नीतियों पर सवाल उठाना शुरू करते हैं। अगर ऐसे में नीतीश NDA से समर्थन वापस लेते हैं तो 2019 के आमचुनाव से पहले भाजपा के लिये एक और बड़ा झटका होगा।

✍ शिल्पी सिंह

नेशनल हेराल्ड मामले में सोनियाजी व राहुलजी पर सुब्रमण्यम स्वामी के केस को कोर्ट ने खारिज किया :

दिल्ली की एक अदालत ने नेशनल हेराल्ड मामले में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की वह अर्जी खारिज कर दी, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, उनकी मां सोनिया गांधी और अन्य अधिकारियों को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि या तो वे स्वीकारें या फिर नकारें कि उनकी ओर से दाखिल किए गए कुछ दस्तावेज असली हैं.

अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट समर विशाल ने अर्जी खारिज करते हुए कहा कि किसी आरोपी को किसी दस्तावेज का लेखक नहीं बताया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि अर्जी से मुकदमे की कार्यवाही में देरी हो रही है. अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘कुछ कानूनी सीमा के कारण जब दस्तावेज खुद ही साक्ष्य के तौर पर स्वीकार्य नहीं हैं तो आरोपी इन दस्तावेजों को ना तो स्वीकार कर और ना नकार कर कानूनी तौर पर खुद को सही ठहराते हैं.’ कोर्ट ने कहा, ‘लिहाजा, उक्त कारणों से सीआरपीसी की धारा 294 के तहत दायर उस अर्जी को अनुमति नहीं दी जा सकती जिसमें आरोपियों को दस्तावेज स्वीकारने या नकारने के निर्देश देने के लिए कहा गया है.’

बीजेपी नेता स्वामी ने एक निजी आपराधिक शिकायत में राहुल और सोनिया गांधी एवं अन्य पर आरोप लगाया है कि उन्होंने महज 50 लाख रुपए का भुगतान कर धोखाधड़ी और कोष में गड़बड़ी की साजिश की, जिसके जरिए यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड ने 90.25 करोड़ रुपए की वह रकम वसूलने का अधिकार हासिल कर लिया जिसे असोसिएट जर्नल्स लिमिटेड को कांग्रेस को देना था.

अदालत ने स्वामी की दो अन्य अर्जियों का भी निपटारा कर दिया. इनमें से एक अर्जी में कांग्रेस पार्टी से कुछ दस्तावेज मांगे गए थे जबकि दूसरे में मजिस्ट्रेट से अनुरोध किया गया था कि वह आयकर विभाग से जुड़े कुछ दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लें. अदालत ने कहा कि इन अर्जियों पर फैसला बाद में होगा. मजिस्ट्रेट ने कहा कि दोनों अर्जियों की प्रासंगिकता और स्वीकार्यता पर साक्ष्य या फैसले के चरण में निर्णय किया जाएगा.

अदालत ने कहा, ‘शिकायतकर्ता सीआरपीसी की धारा 91 के तहत जिस तरह अर्जियां दे रहे हैं या दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने के लिए कह रहे हैं उससे कोई मकसद पूरा नहीं होता और इससे मुकदमे में देरी हो रही है.’

मजिस्ट्रेट ने कहा, ‘मुकदमे में पहले ही देर हो चुकी है क्योंकि अभियोजन के साक्ष्य दर्ज करने की पहली तारीख 20 फरवरी, 2016 थी और अब तक साक्ष्य पर काम शुरू नहीं हुआ है. ऐसे में मुकदमे में देरी हो रही है. इसे पटरी पर लाना होगा. लिहाजा, मुकदमे को पटरी पर लाने के लिए निर्देश दिया जाता है कि शिकायतकर्ता खुद अभियोजन के पहले गवाह के तौर पर अपना परीक्षण कराएंगे और इस मामले की आधारशिला रखेंगे.’ अदालत ने कहा कि इसके बाद गवाहों, अधिकारियों और अन्य को सम्मन किया जाएगा.

मजिस्ट्रेट ने कहा कि स्वामी को उन गवाहों की एक सूची देनी होगी जिसमें उनके नाम या पदनाम या कोई अन्य प्रासंगिक ब्योरा देना होगा जिसमें ऐसे दस्तावेजों का ब्योरा होगा जो वे गवाह साबित करेंगे. अदालत ने स्वामी के परीक्षण के लिए 21 जुलाई की तारीख तय कर दी.

सभी सात आरोपियों सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडीज, सुमन दुबे, सैम पित्रौदा और यंग इंडियन ने इस मामले में अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को नकारा है. अदालत ने आरोपियों को 26 जून, 2014 को तलब किया था.

✍ शिल्पी सिंह

विकासवादी सोच के योद्धा नेहरू की कुछ यादें :

नेहरू जी की 54वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि.. महात्मा गांधी के सच्चे वारिस, आदर्श राष्ट्रप्रेमी, अदभुत वक्ता, उत्कृष्ट लेखक, इतिहासकार, स्वप्नद्रष्टा और आधुनिक भारत के निर्माता के खिताब से नवाजे जाने का श्रेय अगर किसी एक व्यक्ति को जाता है तो नि:संदेह वे भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ही हैं।
आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाने के साथ-साथ भारत के नवनिर्माण, लोकतंत्र को स्थापित करने और उसे मजबूत बनाने में पंडित जी ने जो भूमिका निभायी, उसके लिए भारत हमेशा उनका ऋणी रहेगा. पंडित जी को राजनीति, पिता मोतीलाल नेहरू से विरासत में मिली थी, लेकिन उनके असली राजनीतिक गुरु महात्मा गांधी ही थे, जिन्होंने बाद में जवाहर लाल को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया. भारतीय आजादी की लड़ाई की एक बड़ी और अहम घटना माने जाने वाले वर्ष 1919 के जलियांवाला बाग कांड के बाद से पंडित जी ने भारतीय राजनीति को दिशा देने में अहम भूमिका निभायी थी।

उस समय वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली जौहर के कहने पर वे जालियांवाला कांड के कारणों की जांच के लिए बनायी गयी समिति के सदस्य बने थे. कांग्रेस के इतिहास में अध्यक्षता सीधे पिता से पुत्र को मिलने की विरल घटना भी जवाहरलाल जी के संदर्भ में ही देखने को मिलती है, जब 1929 में लाहौर में रावी के तट पर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान पंडित मोतीलाल नेहरू की जगह गांधीजी ने जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का फैसला किया था. इसी अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में जवाहरलाल जी ने भारत को आजाद कराने का संकल्प लिया और उसके लिए तारीख भी तय कर दी. मगर पंडित जी के राजनीतिक जीवन से भी ज्यादा जिस चीज ने विश्व को प्रभावित किया, वह उनकी इतिहास दृष्टि है. ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ यानी भारत की खोज और ‘ग्लिम्पसेस ऑफ द वर्ल्ड हिस्ट्री’ यानी विश्व इतिहास की झलक उनकी ऐसी अदभुत किताबें हैं, जो स्कूली छात्रों के पाठ्यक्रम में शामिल की जानी चाहिए. जेल में रहते हुए बिना किसी संदर्भ के और इतिहास लेखन की विधिवत ट्रेनिंग लिये बिना उन्होंने अपनी बेटी इंदिरा गांधी को जो पत्र लिखे और जिसने बाद में एक विशाल ग्रंथ का रूप लिया, वह पंडित जी की अदभुत कृति है।

दुनिया के पांच हजार साल के इतिहास को जिस सलीके से पंडित जी ने लिपिबद्ध किया है उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती और इतिहासकारों ने इसे एच जी वेल्स की ‘आउटलाइन ऑफ द वर्ल्ड हिस्ट्री’ के समकक्ष का दर्जा दिया है. इसी किताब में पंडित जी ने लिखा है कि महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर हमला किसी इसलामी विचारधारा से नहीं किया था, बल्कि वह विशुद्ध रूप से लुटेरा था और उसकी फौज का सेनापति एक हिंदू तिलक था. फिर इसी महमूद गजनवी ने जब मध्य एशिया के मुसलिम देशों को लूटा तो उसकी सेना में असंख्य हिंदू थे. पंडित जी को ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ कहा जाता है और शायद इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद आर्थिक रूप से खस्ताहाल और विभाजित हुए भारत का नवनिर्माण करना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन पंडित जी ने अपनी दूरदृष्टि और समझ से जो पंचवर्षीय योजनाएं बनायीं, उसके नतीजे वर्षों बाद मिले।

पंडित जी का दूसरा बड़ा काम भारत में लोकतंत्र को खड़ा करना था, जिसकी जड़ें अब काफी मजबूत हो चुकी हैं और जिसका लोहा पूरी दुनिया मानती है और भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है. वर्ष 1952 में पंडित जी के नेतृत्व में देश के पहले आम चुनाव में स्वस्थ लोकतंत्र की जो नींव रखी गयी थी, वह आज तक जारी है। अपनी जिंदगी के दो अन्य आम चुनाव 1957 और 1962 में अपनी पूरी शक्ति लगाकर उन्होंने इसे न सिर्फ और मजबूत बनाया, बल्कि अपने विपक्ष को भी पूरा सम्मान दिया.

उन्होंने अपनी पार्टी के सदस्यों के विरोध के बावजूद 1963 में अपनी ही सरकार के खिलाफ विपक्ष की ओर से लाये गये पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराना मंजूर किया और उसमें भाग लिया. जितना समय पंडित जी संसद की बहसों में दिया करते थे और बैठ कर विपक्षी सदस्यों की बात सुनते थे, उस रिकॉर्ड को अभी तक कोई प्रधानमंत्री नहीं तोड़ पाया है, बल्कि अब तो प्रधानमंत्री के संसद की बहसों में भाग लेने की परंपरा निरंतर कम होती जा रही है. पंडित जी प्रेस की आजादी के भी बड़े भारी पक्षधर थे और कहा करते थे लोकतंत्र में प्रेस चाहे जितना गैर-जिम्मेदार हो जाये, मैं उस पर अंकुश लगाये जाने का समर्थन नहीं कर सकता. शायद इसकी वजह एक ये भी थी कि वे एक दौर में खुद पत्रकार थे और प्रेस की आजादी का महत्व समझते थे.

इसके अलावा भारत को सही ढंग से समझने और अंतराष्ट्रीय मामलों की जो पकड़ पंडित जी की थी, वह भारत के किसी दूसरे नेता की नहीं हो पायी. अपने प्रधानमंत्री काल में विदेश विभाग हमेशा उनके पास रहा और इसी दौरान उन्होने मार्शल टीटो, कर्नल नासिर और सुकार्णो के साथ मिल कर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी, जो शीतयुद्ध की समाप्ति से पहले तक काफी प्रभावी रहा. मगर अंतिम समय में पंडित जी को कुछ नाकामियों का भी मुंह देखना पड़ा और चीन के साथ दोस्ती करना काफी मंहगा साबित हुआ. हालांकि चीन के साथ दोस्ती की पहल उन्होंने काफी ईमानदारी से की थी और पंचशील के सिद्धांत के साथ-साथ हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा दिया, लेकिन 1962 में चीन द्वारा भारत पर हमला करने से पंडित जी भी बहुत दुःखी हुए और कुछ लोगों का तो ये भी मानना है कि उनकी मौत का कारण यह सदमा भी था।
पंडित जी विज्ञान के मदद से जिस तरह से देश को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया और दुर्दिष्टता दिखाया वो काबिले तारीफ थी।

मगर अजब आज कुछ नेता और संगठन सिर्फ अपने स्वार्थ के लिये नेहरूजी को बदनाम करते हैं तो विश्व भर के नेहरू प्रेमियों को दुख होता है और सबसे बड़ा नुकसान उस देश के छवि को होता है जिस देश निर्माण नेहरू ने क़िया था।

✍ शिल्पी सिंह

मोदी सरकार के चार साल :

मोदी जी के 4 साल की सरकार में उन्होंने कुछ नही किया जो भी करते थे अपने लिए अच्छा खाया अच्छा विदेश घूमा।

मोदी सरकार के चार साल को कांग्रेस ‘विश्वासघात दिवस’ के रूप में मना रही है। इस मौके पर कांग्रेस ने ‘विश्वासघात’ के नाम से एक बुकलेट जारी किया है। बुकलेट में चार सालों के दौरान मोदी सरकार की नाकामियों के बारे में बताया गया है। बुकलेट जारी करते हुए कांग्रेस महासचिव अशोक गहलोत ने कहा कि आजादी के बाद बीते चार साल देश के सबसे खराब दौर रहे हैं। गहलोत ने देश के हर गांव में बिजली पहुंचाने के दावे पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा, “देश में करीब 6 लाख गांव हैं, अगर 18 हजार गांवों में मोदी जी ने बिजली पहुंचाई तो फिर 5 लाख 82 हजार गांवों में बिजली किसने पहुंचाई? मोदी जी झूठ बोलने की सारी हदें पार कर चुके हैं।” कांग्रेस महासचिव ने कहा कि देश में चार सालों में डर का माहौल पैदा हुआ है। मोदी सरकार के चार साल पूरे होने के दिन भी पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़े हैं। 13 मई से 26 मई के बीच पेट्रोल के दाम में 3.86 रुपये और डीज़ल के दाम में 3.26 रुपये की वृद्धि हो गई है। कर्नाटक चुनाव ख़त्म होते ही अख़बारों ने लिख दिया था कि चार रुपये प्रति लीटर दाम बढ़ेंगे, करीब करीब यही हुआ है। यानी दाम बढ़ाने की तैयारी थी लेकिन अमित शाह ने बोल दिया कि सरकार घटाने पर प्लान बना रही है। एक दो दिन से ज़्यादा बीत गए मगर कोई प्लान सामने नहीं आया। हम सब समझते हैं कि तेल के दाम क्यों बढ़ रहे हैं मगर सरकार में बैठे मंत्री को ही बताना चाहिए कि विपक्ष में रहते हुए 35 रुपये प्रति लीटर तेल कैसे बिकवा रहे थे। आज के झूठ की माफी नहीं मांग सकते तो पुराने बोले गए झूठ की माफी मांग सकते हैं।

जिस तरह से सोशल मीडिया पर कुतर्कों को जाल बुना गया है, वह बताता है कि यह सरकार जनता की तर्क बुद्धि का कितना सम्मान करती है। मोदी सरकार को सत्ता में आये चार साल गुजर चुके है। अब इन चार साल में जनता बेहाल रही या खुशहाल ये अगले चुनाव में ही पता लगेगा।

मगर नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री पद की गरिमा गिराई है ऐसा कहना है राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का, उन्होंने कहा जितना नुकसान प्रधानमंत्री पद का खुद मोदी जी ने गिराया है वैसा किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं किया है। दरअसल, पिछले चार सालों में मोदी सरकार 11 बार पेट्रोल और डीज़ल एक्साइज ड्यूटी बढ़ा चुकी है। इस दौरान अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम कम थे। लेकिन अब जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं तो सरकार उस तेज़ी से एक्साइज ड्यूटी नहीं घटा रही है। सरकार ने सिर्फ गुजरात चुनाव से पहले ड्यूटी कम की थी और उसकी जगह भी 2% सेस लगा दिया था।

मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने प्रेस को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं। उन्होंने कहा कि बीजीपी ने देश को सबसे ज्यादा मेहनत करने वाला प्रधानमंत्री दिया है, जो 15 से 18 घंटे तक काम करते हैं।

जवाब में कांग्रेस ने कहा मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर कांग्रेस ने योजनाओं को लेकर केंद्र सकार को घेरा है। कांग्रेस ने ट्वीट किया, “4 साल पहले वादा किया, योजनाओं के विज्ञापन पर खूब पैसा भी बहाया लेकिन योजना पर खर्च नहीं किया और पैसा बेकार पड़ा रहा। क्या इसे खोटी नीयत, खोटा विकास नहीं कहते?”

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि 1996 के बाद से मोदी सरकार के पिछले 4 साल के दौर में सबसे ज्यादा सैनिक और आम नागरिकों की जान गई है। आजाद ने कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा ऐसा क्षेत्र है जिस पर पीएम मोदी ने चुनाव प्रचार के समय ढेर सारी बातें की थी और उन्हें इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन वे इस मुद्दे पर नाकाम रहे हैं।

मोदी सरकार के चार साल पूरे हो गए हैं। सरकार के 4 साल पूरे होने के मौके पर बीजेपी जश्न मना रही है और सरकार की उपलब्धियों को गिना रही है। वहीं मोदी सरकार को हर मोर्चे पर नाकाम बता रहा है। बीएसी सुप्रीमो मायावती ने कहा कि इन चार सालों में केंद्र सरकार हर मोर्चे पर नाकाम रही है। कुल मिलाकर सब की राय ये है कि मोदीजी ने 4 साल में देश का बंटाधार ही किया है और चार 4 साल मोदी जी ने जनता के लिए कुछ नही किया सिर्फ अपने लिए जीए है।

शिल्पी सिंह

विपक्षी एकता से घबराये अमित शाह, कहा भाजपा को होगा चुनाव में नुकसान :

विपक्षी दलों का एक मंच पर आना बीजेपी के लिए चिंता का कारण बन गया है। इस बात को अब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी माना है। शुक्रवार को पत्रकारों से बातचीत में अमित शाह ने कहा कि समाजवादी पार्टी, बीएसपी और कांग्रेस का एक साथ आना बीजेपी के लिए चुनौती है और उन्हें उत्तर प्रदेश में इससे नुकसान हो सकता है।

अमित शाह ने कहा कि, “अगर बीएसपी और समाजवादी पार्टी गठबंधन बना कर चुनाव लड़ेंगी, तो यह हमारे लिए एक चुनौती होगी।

बीजेपी की दिक्कत उत्तर प्रदेश ही नहीं है, महाराष्ट्र में भी उसके लिए दिक्कत है। और, यह बात अमित शाह के इस बयान से साफ हो जाती है जब उन्होंने कहा कि, “हम महाराष्ट्र में गठबंधन के पुराने साथी शिवसेना से अलग नहीं होना चाहते हैं, हम उन्हें एनडीए से बाहर नहीं करना चाहते हैं। लेकिन अगर शिवसेना अपनी अलग राह चुनना चाहती है, तो फिर हम क्या कर सकते हैं। हम हर स्थिति के लिए तैयार हैं।”

लेकिन विपक्षी दलों के एकजुट होने पर बीजेपी की चिंता अमित शाह के बयानों में साफ नजर आई। उन्होंने सफाई दी कि, “वे लोग 2014 में भी हमारे खिलाफ लड़े थे, लेकिन हमें रोकने में नाकामयाब रहे थे। उन लोगों की अपने-अपने राज्यों में उपस्थिति है। अगर वे एकसाथ आते हैं तो भी वे हमें हरा पाने में सफल नहीं होंगे।” लेकिन अमित शाह जानबूझकर यह कहने से बचे कि 2014 में तो सभी दल अलग-अलग थे और वोटों का बंटवारा हुआ था, लेकिन अगर 2019 में वे गठबंधन बनाकर मैदान में बीजेपी के खिलाफ आए तो उन्हें झटका लग सकता है।

गौरतलब है कि बीजेपी को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने में उत्तर प्रदेश ने बड़ी भूमिका निभाई थी, जहां की 80 में से 73 सीटें उसे और उसके सहयोगी दलों को मिली थीं, लेकिन हाल के लोकसभा उपचुनाव में जब एसपी-बीएसपी एक साथ मैदान में उसके खिलाफ आए तो उसे उसके गढ़ गोरखपुर और फूलपुर सीटों पर करारी शिकस्त खानी पड़ी थी।

बीजेपी के यह आभास हो गया है कि अगले लोकसभा चुनाव में उसके हाथ उत्तर प्रदेश से ज्यादा सीटें नहीं आने वाली, इसीलिए अमित शाह ने कहा कि, “2019 में बीजेपी ऐसी अस्सी सीटें जीतेगी जहां वह बीते चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सकी थी।” उन्होंने कहा, “हमलोग ऐसी सीटों पर जीत हासिल करेंगे जोकि पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल और अन्य जगहों पर हैं।”

गौरतलब है कि कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की सरकार के शपथ समारोह में 14 विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए थे, इनमें कांग्रेस के अलावा उत्तर प्रदेश की एसपी, बीएसपी और आरएलडी, महाराष्ट्र की एनसीपी, दिल्ली की आप, आंध्र प्रदेश की तेलुुगु देशम, बिहार की आरजेडी, सीपीआई और सीपीएम के साथ पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस ने हिस्सा लिया था।

लेकिन विपक्षी दलों की एकजुटता से पैदा हुई घबराहट अमित शाह के बयानों में साफ दिखी।बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि, “विपक्षी पार्टियां एक जैसी सोच वाले दलों के साथ आ रही हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि वे केवल अपने दम पर एनडीए को 2019 में मात नहीं दे पाएगी। ये सब हमारे खिलाफ 2014 में लड़े थे, लेकिन हमें रोक नहीं पाए। अगर वे एकसाथ भी आते हैं तो भी हमें हरा नहीं पाएंगे।’

✍ शिल्पी सिंह

गोवा में भाजपा सरकार खतरे में, गठबंधन दल ने नाता तोड़ने की दी धमकी :

कर्नाटक में बहुमत परीक्षण में भाजपा की हुई किरकिरी अभी तक लोग भूले भी नहीं थे कि लग रहा है कि भाजपा को अब गोवा में क्रिकेट का सामना करना पड़ सकता है कर्नाटक हाथ से निकलने के बाद बीजेपी सरकार पर गोवा में खतरे के बादल मंडरा रहे है,राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल गोवा फारवर्ड ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द से जल्द खनन मामले को नहीं सुलझाया गया तो पार्टी राज्य सरकार को समर्थन देने पर पुनर्विचार कर सकती है।

गोवा फारवर्ड के अध्यक्ष व शहरी व ग्रामीण नियोजन मंत्री विजय सरदेसाई ने यहां कहा कि उनसे जल्द से जल्द इस संकट को सुलझाने की गुजारिश करता हूं। अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो हम अपने समर्थन के बारे में दोबारा सोचेंगे।

40 सीटो वाली गोवा विधानसभा के लिए 2017 में हुए चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी जिसमें कांग्रेस ने 17 भाजपा ने 14 गोवा फॉरवर्ड ने 3 महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी ने 3 एनसीपी ने एक और निर्दलीय ने 2 सीट जीत दर्ज की थी जिसके बाद देश के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने इस्तीफा दे दिया और किसी तरह भाजपा ने जोड़-तोड़ कर सरकार बनाई जिसमें भाजपा के 14 विधायक गोवा फॉरवर्ड के तीन महाराष्ट्रवादी गोमांतक के तीन और एक एनसीपी के और दो निर्दलीय विधायकों ने समर्थन से सरकार बनाया। एनसीपी ने बीजेपी को समर्थन देने के कारण अपने विधायक को पार्टी से से निकाल दिया और वह भी निर्दलीय के रूप में सरकार को समर्थन दिया।

अब यदि गोवा फारवर्ड सरकार से समर्थन वापस लेती है फिर भाजपा को सरकार बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा क्योंकि भाजपा गठबंधन के 20 सीट ही रह जायेंगे और महाराष्ट्रवादी गोमांतक और भाजपा के रिश्ते में तल्खी हमेशा बनी रहती है।

अब यदि कांग्रेस इस मौके का फायदा उठाते हुए महाराष्ट्रवादी गोमांतक और गोवा फॉरवर्ड से गठबंधन कर और तीन निर्दलीय विधायकों से बातचीत कर सरकार बनाने की तरफ कदम बढ़ाती है तो निश्चित तौर पर भाजपा के लिए यह सबसे बड़ा झटका होगा क्योंकि गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर भी बीमार चल रहे हैं और वह 2017 के तरह सक्रिय नहीं हैं इसलिए अगर बहुमत सिद्ध करने की बात गोवा में उठती है तो निश्चित तौर पर भाजपा को काफी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो चुकी है कि कांग्रेस इस मौके का फायदा उठाने के लिए रणनीति बना रही है और कांग्रेस के हाईकमान इसको लेकर राजनीतिक विश्लेषकों से चर्चा कर अन्य दलों के विधायकों से जुड़ने का कोशिश कर रहे हैं।

✍ शिल्पी सिंह

राहुल की लोकप्रियता में बढ़त तो मोदी की लोकप्रियता काफी तेजी से हुई कम :

26 मई को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अपनी चौथी सालगिरह मनाने जा रही है। इन 4 सालों के दौरान बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे पीएम मोदी की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आयी है। ये गिरावट विशेषकर पिछले एक साल के दौरान देखने को मिली है।

एबीपी न्यूज के लिए सीएसडीएस द्वारा किये गये ताजा सर्वे में पीएम मोदी की लोकप्रियता में तेजी से ढलान देखने को मिल रही है। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी के साथ बढ़ा है। 2019 के लोकसभा चुनावों के ध्यान में रखकर किये गये सीएसडीएस के सर्वे में राज्यवार लोकसभी सीटों की तस्वीर पेश की गयी है।

2019 से पहले यह साल मोदी सरकार के लिए सेमीफाइनल माना जा रहा है। साल के अंत में कई राज्यों में चुनाव होने हैं। सर्वे में इन राज्यों में भी पार्टियों की स्थिति की तस्वीर पेश की गयी है। सर्वे में दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी पिछड़ती नजर आ रही है। सर्वे के मुताबिक 230 सीटों वाले मध्यप्रदेश में आज चुनाव हों तो यहां बीजेपी को भारी झटका लग रहा है। बीजेपी को 34% और कांग्रेस को 49% वोट शेयर मिलने का अनुमान है। जबकि और अन्य के खाते में 17% वोट शेयर जा सकता है। राज्य में साल 2013 में बीजेपी को 165, कांग्रेस को 58 और अन्य को 7 सीटें मिली थीं। बीजेपी को 45%, कांग्रेस को 36% और अन्य को 19% वोट शेयर मिला था। दरअसल बीजेपी के लिए मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों ही काफी अहम राज्य है। जहां पिछले दो बार से ज्यादा इन दो राज्यों पर बीजेपी का कब्ज़ा है। अब सर्वे के मुताबिक, कांग्रेस धीरे धीरे इन दो राज्यों की तरफ विजय हासिल करती नज़र आ रही है। राजस्थान की बात करे तो बीजेपी को 39%, कांग्रेस को 44% और अन्य के खाते में 17% वोट शेयर जाने की उम्मीद है।

वहीँ पिछले चुनाव पर नज़र डाली जाए तो बीजेपी को 45 फीसद, कांग्रेस को 33 फीसद और अन्य दलों को 22 फीसद वोट मिले थे। अगर ऐसा सर्वे के इर्द-गिर्द ही चुनावी नतीजे आये तो बीजेपी के लिए दोनों राज्यों में सरकार गंवाना ठीक वैसा ही होगा जैसा सीपीआईएम का त्रिपुरा और बंगाल में हुआ और खुद कांग्रेस इसका बड़ा उदाहरण रही है। जो राज्य दर राज्य चुनाव हारती गई और मोदी सरकार हर उस राज्य में सरकार बनाती गई जहां वो पहले थी ही नहीं।
सर्वे में अगर मध्यप्रदेश की बात करें तो शिवराज का राज भी अब आखिरी साँसे ले रहा है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश में हार और गुजरात और यूपी में कमजोर होता संगठन साफ तौर पर भाजपा और मोदी के लिये खतरा बन चुका है। कांग्रेस विपक्षी एकता को लेकर चलने में कामयाब हो जाए तो यूपी में भी भाजपा का सूपड़ा साफ हो जायेगा वही बिहार में कांग्रेस+राजद के गठबंधन का जनाधार काफी तेजी में बढ़ता हुआ नजर आ रहा है। इन सब को देखे तो भाजपा की सबसे मजबूत गढ़ उत्तर भारत की भाजपा के पकड़ से दूर जाता दिख रहा है क्योंकि महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यो में पहले ही भाजपा मुश्किल में नजर आ रही है।

राहुल गाँधी की आक्रमकता और अध्यक्ष बनने के बाद सक्रियता भी कही न कही लोगो के एक बेहतर विकल्प के रूप में राहुल गाँधी का मजबूत कर रही है।

दक्षिण भारत मे कर्नाटक के अलावा भाजपा कही नही है और कर्नाटक में अब जेडीएस और कांग्रेस के गठबंधन के बाद भाजपा के लिये वहां पर भी पिछली लोकसभा के प्रदर्शन को दोहराना काफी मुश्किल होगा।

इसलिये 2019 में जो ये समझ रहे हैं कि भाजपा नही हार सकती है वो राज्यवार विश्लेषण करके देख लें भाजपा के लिये सरकार बचाना बहुत कठिन लग रहा है।

✍ शिल्पी सिंह

पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि होने से हर तरफ हो रही मोदी सरकार की आलोचना :

मोदी सरकार के तमाम दावों के बावजूद पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें लगातार बढ़ती नज़र आ रही हैं। बुधवार को एक बार फिर कीमतों में उछाल देखने को मिला। बढ़ती कीमतों का सिलसिला लगातार पिछले दस दिनों से जारी है।

पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार वृद्धि होने के कारण सरकार की चौतरफा आलोचना होना शुरू हो गया है। जिस सरकार का 2014 में नारा था “बहुत हुई पेट्रोल और डीजल की महंगाई की मार अबकी बार मोदी सरकार” उसी सरकार में पेट्रोल आजादी के बाद सबसे महंगा बिक रहा है जिसको लेकर अब ना सिर्फ राजनीतिक दल बल्कि आम आदमी भी सवाल उठाने लगे हैं।

सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना इस बात को लेकर हो रही है कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का कीमत लगातार गिर रही है फिर सरकार यहां पर टैक्स बढ़ा कर अधिक कीमत जनता से क्यों वसूल रही है। जब 2014 से पहले कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय मार्केट में 117 डॉलर प्रति बैरल था तब भारत में पेट्रोल की कीमत ₹73 हुआ करती थी वही जब अब अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल है तब कच्चे तेल की कम हुई कीमत का फायदा होने की जगह उलट नुकसान ही हो रहा है और अब पेट्रोल ₹85 वही डीजल ₹73 प्रति लीटर मिल रहा है।

पेट्रोल और डीजल की लगातार मूल्य वृद्धि को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस लगातार सरकार पर हमलावर है और देश के विभिन्न इलाकों में वह इसको लेकर विरोध प्रदर्शन कर रही है एनएसयूआई से लेकर कांग्रेस की सारी संगठन इसको लेकर अपना विरोध दर्ज करवाई है वहीं आम आदमी पार्टी,राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी के साथ-साथ अन्य विपक्षी दल भी इसको लेकर सरकार की आलोचना कर रहे हैं।

पेट्रोल और डीजल के दाम में वृद्धि होने का सबसे बड़ा कारण सरकार के द्वारा लिया जा रहा टैक्स है। टैक्स 2014 से लेकर अगर देखा जाए तो मनमोहन सरकार के तुलना में मोदी सरकार में बहुत ही अधिक हो गया है।

मई 2014 में पेट्रोल 9.20 रूपए प्रति लीटर और डीजल पर 3.46 रूपए प्रति लीटर उत्पाद शुल्क लगता था, अब पेट्रोल पर 212 प्रतिशत इजाफे के साथ 19.48 रूपए और डीज़ल पर 443 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 15.33 रूपए प्रति लीटर उत्पाद शुल्क लग रहा है।

पेट्रोल और डीजल के बढ़ती महंगाई को लेकर सरकार चाहे जो भी बहाना बना ले लेकिन पेट्रोल और डीजल की बढ़ती महंगाई का असर आम लोगों के सीधे जनजीवन पर पड़ता है जिस कारण से सरकार को इसका खामियाजा निश्चित तौर पर भुगतना होगा और इसी को ध्यान में रखते हुए सारी विपक्षी दल इसको लेकर आक्रमक होते हुए जनता के बीच सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में जुट चुकी है जिसका निश्चित तौर पर आने वाले चुनाव में भाजपा को काफी नुकसान होगा।

कांग्रेस के नेता लगातार ट्विटर और प्रेस के माध्यम से मनमोहन सरकार और मोदी सरकार के दौरान अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत और पेट्रोल-डीजल की कीमत का तुलना कर सकरार को घेर रहे हैं।

जनता भी अब सवाल कर रही है कि आखिर सरकार इतना टैक्स क्यों बढ़ा रही है ? जब सारा चीज जीएसटी के अंदर लाया गया तो पेट्रोलियम पदार्थों को क्यों जीएसटी से बाहर रख आम जनता को लूट रही है ?

निश्चित तौर पर जिस तरह से पेट्रोल-डीजल के दामों में लगातार वृद्धि होने से आम जनों में गुस्सा बढ़ रहा है उससे भाजपा को काफी नुकसान हो सकता है, कांग्रेस इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर 2018 के विधानसभा चुनावों में इसका फायदा जरूर लेगी।

✍ शिल्पी सिंह

कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण समारोह के मंच पर मोदी के खिलाफ एकजुट देश 11 दल :

कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण समाहरो में पूरब से लेके पशिचम तक और उत्तर से दक्षिण तक गैर भाजापा नेता पहुँचे,जेडीएस के एच डी कुमारास्वामी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली और इसके साथ ही कर्नाटक के सियासी नाटक का पटाक्षेप हो गया लगता है, हालांकि बहुमत परीक्षण अभी बाकी है। लेकिन इस नाटक के अंतिम दृश्य में जिस नए रंगमंच की नेपथ्य ध्वनि सुनाई दी, उससे 2019 की राजनीतिक पटकथा पढ़ी जा सकती है। इस मंच में कई राज्यों के क्षत्रप अगले लोकसभा के लिए ताल ठोंकने को आतुर दिखे, तो कुछ नेताओं ने महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत दिए। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान मंच पर विपक्षी एकजुटता की झलक भी देकने को मिली। बेंगलुरु में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में गैर-बीजेपी दलों के तमाम दिग्गज नेता शामिल हुए हैं। बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफे और कर्नाटक में बीजेपी का परचम लहराने से रोकने के बाद गैर बीजेपी दलों के लिए ये जश्न का है। समारोह में कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नेताओं के शरीक होने की उम्मीद है। इसके जरिए 2019 के आमचुनाव से पहले भाजपा को विपक्षी एकजुटता का एक संदेश दिया गया है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, यूपीए अध्यक्ष एवं उनकी मां सोनिया गांधी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के भी समारोह में शरीक हुए। इसके अलावा माकपा महासचिव सीताराम येचुरी, बिहार विधानसभा में विपक्षी नेता तेजस्वी यादव और नेकां के नेता फारूक अब्दुल्ला के भी उपस्थित थे। बसपा प्रमुख मायावती और सपा नेता अखिलेश यादव भी समारोह में शरीक हुए। इस बीच, द्रमुक नेता एमके स्टालिन ने बेंगलुरू की अपनी यात्रा रद्द कर दी है। इसकी बजाय वह तमिलनाडु में तूतीकोरीन जाएंगे, जहां कल पुलिस गोलीबारी में नौ लोग मारे गए। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित नहीं रहेंगे। कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला ने उन्हें सीएम पद की शपथ दिलाई। वहीं, कांग्रेस जी परमेश्वर ने भी उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

इस दौरान मंच पर विपक्षी एकजुटता की झलक भी दिखी। इससे पहले कर्नाटक में कांग्रेस के प्रभारी महासचिव के सी वेणुगोपाल ने बताया था कि राज्य में पार्टी अध्यक्ष जी परमेश्वर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। वेणुगोपाल ने बताया कि कांग्रेस के रमेश कुमार अगले विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) होंगे, जबकि विधानसभा उपाध्यक्ष पद जद (एस) के खाते में जाएगा। कुमारस्वामी एक हफ्ते के अंदर कर्नाटक में शपथ लेने वाले दूसरे मुख्यमंत्री हैं। दरअसल, 19 मई को फ्लोर टेस्‍ट से पहले ही बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्‍पा ने मुख्‍यमंत्री पद से इस्‍तीफा दे दिया था। जिसके बाद राज्‍यपाल के सामने कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ने सरकार बनाने का दावा पेश किया था।

✍ शिल्पी सिंह

कर्नाटक हार के बाद तिलमिलाए अमित शाह :

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कर्नाटक चुनाव के बाद पहली बार मीडिया से बात करते हुए कहा कि कर्नाटक में अगर विधायक बंधक नहीं होते तो वहां हमारी सरकार होती। प्रेस कॉन्फ्रेंस के शुरु होने से पहले ही अमित शाह और उनके साथियों ने यह साफ कर दिया था कि वह कर्नाटक चुनाव के अलावा किसी मुद्दे पर बात नहीं करेंगे। वह कॉफ्रेंस के दौरान लगातार यही कहते रहे कि अगर बहुमत परीक्षण से पहले कांग्रेस अपने विधायकों को होटल और स्वीमिंग पूल से बाहर छोड़ देती तो जनता ही उन्हें बता देती कि कहां वोट करना है। कर्नाटक चुनाव में बहुमत हासिल करने को विफल हुई बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने आज प्रेस कांफ्रेंस करते हुए कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा। इस बात का जवाब देते हुए कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद आनंद शर्मा ने जवाबी प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए जवाब दिया की अमित शाह जी ने प्रेस कांफ्रेंस की और ये सही बात है कि उनको थोड़ी भी लज्जा नहीं है। यदि थोड़ी भी शर्म होती तो वो कर्नाटक और पूरे देश की जनता से माफी मांगते कर्नाटक के प्रकरण ने पूरे देश और पूरी दुनिया के सामने भारतीय जनता पार्टी के दोहरे मापदंड, सत्ता की भूख को दिखा दिया। कर्नाटका चुनाव के दौरान पूर्ण रूप से सरकारी तंत्र का दुरुपयोग हुआ, इनकम टैक्स की रेड करायी गयी, केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल हुआ श्री नरेन्द्र मोदी और श्री अमित शाह जी ये बात याद रखें कि उनके दोहरे मापदंड, जबान, मूल्य और मान्यताएं देश के लोग स्वीकार नहीं करेंगे। बता दें कि बीजेपी को कर्नाटक चुनाव में सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं मिला था। बीजेपी के पास 104 विधायक थे और सरकार बनाने के लिए 112 विधायकों की ज़रूरत थी। ऐसे में बीजेपी कांग्रेस-जेडीएस के विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रही थी। जिसके मद्देनज़र कांग्रेस-जेडीएस ने अपने विधायकों को रिज़ॉर्ट भेज दिया था। हालांकि, जब अमित शाह से यह सवाल पूछा गया कि क्यों उनकी सरकार ने कर्नाटक चुनाव के फ़ौरन बाद पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में इज़ाफा करने का फैसला किया, इसपर शाह सवाल पूछने वाले एनडीटीवी के पत्रकार पर भड़क गए और पत्रकार पर एजेंडा चलाने का आरोप लगाया। शाह ने कहा, “मैं केवल कर्नाटक के बारे में बात करूंगा हालांकि मैं आपका एजेंडा समझता हूं। हम इस सवाल का जवाब भी देंगे लेकिन आज नहीं”।

कांग्रेस ने अमित शाह के इसी रवैये को खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की संज्ञा दी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने कहा कि बीजेपी की हालत खंभा नोंचने वाली खिसियानी बिल्ली जैसी हो गई है। शर्मा ने कहा है कि बीजेपी को दूसरी पार्टियों के विधायक चुराने में महारत हासिल है। बीजेपी ने अपनी कर्मों के कारण इस चुनाव में अपने चेहरे पर कालिख पोती है। कर्नाटक में कांग्रेस द्वारा बीजेपी को दी गई करारी शिकस्त के चलते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह तिलमिला गए हैं। क्यूंकि कांग्रेस-जेडीएस की एकजुटता के आगे उनकी सभी रणनीतियां फेल हो गई, जो इससे पहले कभी नहीं हो पाया था। पेट्रोल की कीमतों पर अमित शाह का अजीबोगरीब बयान
कर्नाटक के घटनाक्रम को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अध्‍यक्ष अमित शाह ने सोमवार (21 मई) को दिल्‍ली स्थित बीजेपी मुख्‍यालय में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस की। कांग्रेस सहित विपक्ष की एकजुटता की पहल को खास तवज्जो नहीं देते हुए अमित शाह ने कहा कि उनकी पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में बड़े बहुमत से जीतेगी। उन्होंने कहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी विपक्षी दल अलग अलग राज्यों में बीजेपी के खिलाफ लड़े थे और उनकी पार्टी तब भी जीती थी और यही बात 2019 में होगी जब वह उससे भी बड़े बहुमत से जीतेगी। हालांकि इस दौरान जब पत्रकारों ने अमित शाह से जब पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों पर सवाल किए तो उन्होंने अजीबोगरीब जवाब दिए।एनडीटीवी के संवाददाता अखिलेश शर्मा ने जब बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह से पूछा कि कर्नाटक चुनाव के समय पेट्रोल-डीजल के दाम स्‍थिर थे लेकिन अब उसमें तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है, इस पर अमित शाह ने कहा, ”मैं आपका (मीडिया) एजेंडा जानता हूं। मैं इस पर भी जवाब दूंगा। लेकिन आज मैं केवल कर्नाटक के विषय में बात कर रहा हूं।” बता दें कि कर्नाटक में चुनाव के बाद से इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम ने पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ानी शुरू कर दी हैं। इससे पहले 19 दिनों तक कीमतों को स्थिर रखा गया था। सार्वजनिक तेल कंपनियों ने कर्नाटक में चुनावी प्रक्रिया के दौरान 19 दिन के विराम के बाद 14 मई को कीमतों में दैनिक संशोधन को बहाल किया। इसके बाद से इनकी कीमत में लगातार बढ़ोतरी जारी है।

✍ शिल्पी सिंह

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