Saturday, August 15, 2026
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कुमारस्वामी के शपथ में दिखेगी विपक्ष की ताकत :

मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण करने जा रहे कुमारस्वामी अपने दिल्ली दौरे पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कर उनसे सरकार गठन की प्रक्रिया पर चर्चा की और उन्हें शपथ ग्रहण समारोह का न्योता दिया।

कर्नाटक में राहुल गांधी ने राजनीति की बिसात पर जो चालें चलीं, उससे न केवल उनकी पार्टी सत्ता में दोबारा लौटकर आयी, बल्कि प्रतिद्वंद्वी बीजेपी के बड़े-बड़े सूरमा सहित वे सभी धराशायी हो गए, जो राहुल को हल्के में ले रहे थे। कांग्रेस अध्यक्ष ने जेडीएस को अपने साथ जोड़कर ‘2019 का समीकरण’ भी अपने पक्ष में कर लिया है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान जेडीएस को कांग्रेस और राहुल गांधी बीजेपी की बी टीम कहकर कटघरे में खड़ा कर रहे थे। हो ना हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के प्रति नरमी और कई सीटों पर जेडीएस उम्मीदवारों के खिलाफ कमजोर बीजेपी उम्मीदवार कुछ ऐसी तस्वीर पेश कर रहे थे कि बीजेपी और जेडीएस के बीच कांग्रेस को पराजित करने के लिए कोई अंदरूनी समझौता हो चुका है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा थी कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में बीजेपी जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बना लेगी। कुमारस्वामी पहले भी एक बार बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बन चुके थे, इसलिए इस कयास को बल मिल रहा था ।

एक तरफ मुख्यमंत्री पद की मुंहमांगी मुराद पूरी हो रही थी, तो दूसरी तरफ बीजेपी से दूर रहकर पार्टी की सेक्यूलर छवि भी सुरक्षित। जेडीएस की साझेदार बीएसपी की अध्यक्ष मायावती ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। कुमारस्वामी ने समर्थन स्वीकार कर लिया और सरकार बनाने को तैयार हो गए।

कर्नाटक में कांग्रेस जेडीएस गठबंधन सरकार के नामित मुख्यमंत्री कुमारस्वामी बुधवार को शपथ लेगें. इस दौरान देश के प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं के भी शपथ समारोह में शामिल होंगे। इस कार्यक्रम में देश भर के पांच मुख्यमंत्री हिस्सा लेने पहुंचेगे. जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी, केरल के सीएम पिनाराई विजयन, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव शामिल रहेंगे।

बीजेपी अब दोराहे पर खड़ी है। उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे। सांप-छछूंदर की स्थिति। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह वाराणसी में दर्दनाक हादसे के बावजूद दिल्ली में कर्नाटक जीत का जश्न मना चुके थे। कर्नाटक की जीत को अभूतपूर्व जीत करार दे चुके थे। ऐसे में सरकार बनाने का दावा पेश न करना भी उनके लिए आत्महत्या करने के बराबर था। लिहाजा, उन्होंने कर्नाटक में उस खेल को हरी झंडी दिखा दी, जिसे राजनीति में ‘अनैतिक’ कहा जाता है। लेकिन इस बार कर्नाटक की पिच और कांग्रेस की टीम थोड़ी अलग निकली। राहुल ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि अब कांग्रेस पहले वाली कांग्रेस नहीं है, बल्कि यह उनकी कांग्रेस है, जो मैदान से लेकर कानून के कटघरे तक खेलना और जीतना जानती है। यह संदेश बाकी विपक्षी दलों के लिए भी था, कि भाजपा से लड़ने और जीतने की क्षमता किसी दल में है, तो वह सिर्फ कांग्रेस ही है।

बहरहाल, राहुल के चक्रव्यूह में खुद को घिरता देख, बीजेपी ने अंतत: मैदान से हटने का निर्णय लिया। राहुल की कांग्रेस ने बीजेपी के विजयरथ को रोक दिया। लाख कोशिशों के बावजूद बीजेपी 112 की संख्या नहीं जुटा पायी और बीएस येदियुरप्पा को शपथ ग्रहण के दो दिन बाद ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

शिल्पी सिंह

21 मई 1991 की वो काली रात :

देश आज पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी को याद कर रहा है। 27 साल पहले आज ही के दिन उनकी हत्या कर दी गई थी।

अपने पिता की 27वीं पुण्यतिथि पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक भावुक संदेश भी ट्विटर पर लिखा। उन्होंने कहा, ‘मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि जो लोग नफरत पालते हैं, जिंदगी भर नफरत की कैद में रहते हैं। आज उनकी पुण्यतिथि पर मैं उन्हें धन्यवाद कहना चाहता हूं कि उन्होंने मुझे सभी लोगों से प्यार और सम्मान करना सिखाया। यह एक पिता की तरफ से अपने बेटे को सबसे मूल्यवान उपहार है। राजीव गांधी, हम सब आपसे प्यार करते हैं और आप हमेशा हमारे दिल में रहेंगे।’

स्व. राजीव गांधी की हत्या को आज 27 साल पूरे हो गए। तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक आत्मघाती हमला ने बम विस्फोट कर उनकी जान ले ली थी। वे वहां जब वो एक चुनावी रैली को संबोधित करने जा रहे थे। 21 मई 1991 को रात तकरीबन 10 बजकर 15 मिनट पर राजीव गांधी रैली स्थल पर पहुंचे। वे कार की अगली सीट पर बैठे थे और उन्होंने उतरते ही सबका अभिवादन किया। मंच की ओर बढ़ते हुए एक महिला आत्मघाती हमलावर धनु ने उन्हें माला पहनानी चाही, तो सब इंस्पेक्टर अनुसुइया ने उसे रोक दिया। हालांकि राजीव गांधी के कहने पर उसे माला पहनाने के लिए आने दिया गया। धनु ने उन्हें माला पहनाई और जैसे ही वो उनके पैर छूने के लिए नीचे झुकी, उसने अपने कमर से बंधे बम का बटन दबा दिया। एक जोरदार धमाका हुआ और फिर सबकुछ सुन्न हो गया। इस धमाके ने राजीव गांधी की जान ले ली।

वो लौट कर घर ना आए वे घर से निकले थे मुस्‍कुराते हुए और शाम होते होते महज कुछ चीथडे घर आए, कोई निजी दुश्‍मनी नहीं थी, था तो बस मुल्‍क की नीतियों पर विवाद, यह तथ्‍य सामने आ चुका है कि तमिल समस्या को ले कर वेलुपल्‍ली प्रभाकरण जब दिल्‍ली आया तो राजीव गांधी ने उससे सशस्‍त्र संघर्ष, तमिल शरणार्थियों के भारत में प्रवेश जैेस मसले पर करार चाहा, जिसे उसने इंकार कर दिया था, राजीव गांधी को यह बात पसंद आई नहीं और उन्‍होंने उसे दिल्‍ली के पांच सितारा होटल में कमरे में बंदी बना लिया था, उसे तभी छोडा गया जब वह भारत सरकार की शर्ते मााने को राजी हुआ, हालांकि वह एक धोखा था बस कैद से निकलने का, भारत में भी कई शक्तियां काम कर रही थी, और फिर 21 मई को दुनिया के सबसे दर्दनाक हमले में एक ऐसा व्‍यक्ति मारा गया जिसके द्वार दी गई देश की दिशा से आज भारत की ख्‍याति दुनियाभर में हैं, भले ही किसी को भारतीय होने पर शर्म आती हो, लेकिन कंप्‍यूटर, जल मशिन जैसी कई ऐसी योजनाएं हैं जिसने आज भारत का झंडा दुनिया में गाडा है।

सियासती जुमलों से अलग राजीव गांधी का कार्यकाल देश के विकास का बडा मोड महसूस हुआ, एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसके पास सपना था, दूरगामी योजना थीं, जुमले नहीं थे, अब आप चर्चा कर सकते हैं उनकी मंडली की, गलत फैसलों की , लेकिन इस बात को नहीं भूलना कि जो मुल्‍क अपने शहीदों को सम्‍मान नहीं देता, उसके भविष्‍य में कई दिक्‍कतें आती है। राजीव गांधी देश का ऐसा शख्स जिसने भारत को दुनिया से जोड़ा। इस मॉडर्न सोच ने भारतवर्ष को एक नई ऊर्जा और एक नई शक्ति दी। जो कभी राजनीति में आना नहीं चाहते थे। राजनीति में आने से पूर्व वे इंडियन एयरलाइन्स में एक पायलट थे। भारतीय राजनीति की दुर्गा कही जाने वाली इन्दिरा गाँधी की असामयिक मृत्यु के बाद पूरे देश की नज़रें राजीव पर थी मानो एक आखिरी उम्मीद हो कि ‘राजीव तो है’ देश को सशक्त प्रधानमंत्री की आवश्यकता थी। बेमन राजीव गांधी को लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए राजनीति में आना पड़ा। राजीव गांधी बहुत कुछ अर्थों में ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल थे। हालांकि उनकी इस छवि में कालान्तर में कुछ विवाद भी उत्पन्न हुए थे। अपने श्रेष्ठ प्रशासन व निर्णय शक्ति की बदौलत इस जनप्रिय नेता ने काफी ख्याति प्राप्त की।

उन्होंने एक बार रैली में भाषण देते हुए कहा था कि दिल्ली से 1 रुपये चलता है और लखनऊ तक पहुंचते-पहुंचते 50 पैसे हो जाता है। प्रधानमंत्री होते हुए भ्रष्टाचार पर ये उनकी बेबाक राय थी जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। 21 मई 1991 को मद्रास से 50 कि०मी० दूर श्रीपेरूंबुदुर में एक चुनावी सभा के दौरान सुरक्षा घेरे को तोड़ने के बाद फूलों की माला ग्रहण करते समय श्रीलंकाई आतंकवादी संगठन लिट्टे द्वारा आत्मघाती बम विस्फोट में उनकी नृशंस हत्या कर दी गयी। अपने चहेते युवा नेता की मृत्यु पर सारा देश जैसे स्तब्ध रह गया।

शिल्पी सिंह

सारा लहू बदन का ज़मीं को पिला दिया हमपर वतन का कर्ज था हमने चुका दिया!!

कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर। स्वर्गीय राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी राज की। वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं इसलिये अक्सर लोग कहते हैं हम में हैं राजीव।

श्री राजीव गांधी ने बीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था। स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे। वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है।

अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते है।

वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्‍होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.

चालीस साल की उम्र में विश्व के सबसे युवा प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली.

देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के हत्या के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे.

अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 411 सीटें हासिल कीं.

सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की सेवा की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी राजीनीति में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे राजनीति में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.

राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही.

बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.

उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था.

उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे 1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.

कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन 23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए.

उन पर राजनीति में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए.

उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई. इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ.

वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा. उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं.

इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गार्ड के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.

राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया. आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा। देश स्वर्गीय राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाता है।

✍ शिल्पी सिंह

मोदीक्रेसी फेल, डेमोक्रेसी पास :

भाजपा के बीएस येदुरप्‍पा सोमवार को कर्नाटक विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाए। ढाई दिन तक सीएम पद पर रहने के बाद उन्‍हें आखिरकार इस्‍तीफा देना पड़ा। कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 में भले ही कांग्रेस हार गई। लेकिन तीसरे नंबर की पार्टी जनता दल- सेक्‍युलर को सीएम पद का ऑफर देकर वह कांग्रेस हारकर ‘जीतने वाले बाजीगर’ की तरह उभरकर सामने आई। कुल मिलाकर कांग्रेस का जेडी-एस को समर्थन देने का दांव हिट रहा। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होकर भी सत्‍ता से बाहर हो गई। कांग्रेस के अध्‍यक्ष राहुल गांधी के लिए गुजरात में नैतिक जीत के बाद येदुरप्‍पा का इस्‍तीफा एक बड़ी खबर है। इससे दो बातें साबित होती हैं।

पहली- राहुल गांधी के अध्‍यक्ष बनने के बाद यह दूसरा मौका है जब कांग्रेस लूजर की तरह चुनाव नहीं लड़ा और बीजेपी से हर मोर्चे पर फाइट की। चाहे मामला चुनावी या बहुमत के आंकड़े को लेकर हुई जोड़-तोड़।

दूसरी- कर्नाटक से कांग्रेस के लिए एक और अहम बात यह निकलकर सामने आती है कि राहुल गांधी के अध्‍यक्ष बनने के बाद कांग्रेस का थिंक टैंक एक्टिव नजर आ रहा है। कर्नाटक से कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को स्‍पष्‍ट संकेत भेजा है कि कांग्रेस रणनीति बनाना जानती है और उसे जमीन पर उतारना भी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कर्नाटक फ्लोर टेस्‍ट के दौरान देखने को मिला, जहां कांग्रेस विधायक तोड़ना बीजेपी के लिए एकदम असंभव सा काम हो गया। यही कांग्रेस की सबसे बड़ी जीत है।

इसमें सबसे बड़ी खास बात रही कि कांग्रेस एकजुटता के साथ राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक कोर्ट से लेकर सदन तक मे बीजेपी को पछाड़ दिया और मणिपुर और गोवा जैसा स्थिति नही बनने दिया।

✍ शिल्पी सिंह

BJP बिना विधायकों के भी ‘सरकार’ बना सकती है क्योंकि इनके पास CBI, ED और IT सेल है, जो अमित शाह के इशारे पर काम करती हैं :

कर्नाटक के राजनीतिक घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस-जेडीएस की याचिका पर शनिवार (19 मई) को कर्नाटक विधानसभा में बहुमत परिक्षण कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने फैसले के मुताबिक बीजेपी की येदुरप्पा सरकार को 28 घंटों के भीतर 111 विधायकों के समर्थन का जुगाड़ करना होगा।
बीजेपी के पास अभी 104 विधायकों की संख्या है। सदन में बहुमत साबित करने के लिए बीजेपी को 7 और विधायकों की ज़रूरत है। ऐसे में यह अटकलें अब तेज़ हो गई हैं कि बीजेपी विधायकों को खरीदने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। एक पार्टी देश के लोकतंत्र को लगातार कमजोर करने का काम कर रही है। सभी संवैधानिक संस्थाओं को अपनी तरह से इस्तेमाल कर रही है और कोई अफसोस, कोई सफाई भी नहीं दे रही। दरअसल, उसे सफाई देने की जरूरत ही नहीं पड़ रही क्योंकि उसका काम करने के लिए बहुत लोग हैं जो बिना कहे सफाई दिए जा रहे हैं। इनमें सिर्फ उसके समर्थक नहीं बल्कि बड़े पत्रकार, बैंकर, बुद्धिजीवी और युवा शामिल हैं जिन्हें कोई मतलब नहीं कि सरकार रोजगार क्यों पैदा नहीं कर पा रही? उन्हें नीरव, माल्या, मेहुल चौकसी, राफेल या व्यापम से भी कोई मतलब नहीं। यह वर्ग बस किसी भी कीमत पर अपनी पार्टी को जीतते हुए देखना चाहता है क्योंकि उसे समझाया दिया गया है कि ‘हम ही तुम्हारी आखिरी उम्मीद हैं।’ भाजपा का यह नया समर्थक वर्ग उसके हर गलत काम का बचाव करता नजर आता है। जैसे ही कोई सवाल करता है यह तुरंत उसे याद दिलाता है कि जैसा कांग्रेस ने किया वैसा उसके साथ हो रहा है; जो कांग्रेस ने बोया उसी को काट रही है! अरे भाई, कांग्रेस के साथ जो हो रहा है वह ठीक है पर आप यह तो देखिए कि आपके साथ क्या हो रहा है? आपके लोकतंत्र का आपकी सहमति से गला घोंटा जा रहा है और आप खुश हो रहे हैं, समर्थन में दलीलें दे रहे हैं। कल को अगर भाजपा इमरजेंसी लगा दे तब भी आप यही कहेंगे कि कांग्रेस ने भी तो लगाई थी, अब भाजपा ने लगा दी तो क्या गलत किया? कुछ गलत नहीं किया, लेकिन जिस तरह एक आदमी को इतना ताकतवर बना दिया गया है कि चुनाव के बाद अगर पार्टी को बहुमत न मिले तो कहा जाता है कि ‘अमित शाह हैं न, सरकार बना ही लेंगे!’ लोग सोचते हैं कि अमित शाह ताकतवर बन रहे हैं तो इससे हमें क्या नुकसान है! वे यह भूल रहे हैं कि जो आदमी ताकत पाने के लिए आप से हाथ मिलाएगा वह ताकत पाने के बाद पलट कर जरूर आएगा। और फिर वह अपने ‘मन की बात’ करेगा जो आपको सुननी ही पड़ेगी। भाजपा ने गोवा, मेघालय, मणिपुर और अब कर्नाटक में जिस तरह सरकार बनाई है उसने दिखा दिया कि सत्ताधारी पार्टी जब चुनावों में खेलती है तो वह सिर्फ ग्यारह खिलाड़ियों के साथ नहीं खेलती बल्कि दो अंपायरों के साथ भी खेलती है!
एक चीज याद रखिए जस्टिज काटजू ने कहा था की 90% भारतीय मूर्ख हैं, और ये बात सच भी है ।
हमारी मूर्खता का पैमाना ये है की एक आदमी लाखों का सूट बूट पहनकर कहता है की मैं गरीब हूं और हम उसे गरीब मान लेते हैं ।
सीबीआई, एन आइ ए जैसी एजेंसियां जिस आदमी के हाथों की कठपुतली हैं वह आदमी कह रहा है की मुझे सताया जा रहा है और हम मान लेते हैं ।
जो संसद मे पूर्ण बहुमत मे है बीस से ज्यादा राज्यों मे सरकार है वह कहता है मुझे काम नही करने दिया जा रहा है और हम मान लेते हैं ।
जो भ्रष्टाचार मे जेल मे रह चुके लोगों को टिकट देता है फिर कहता है मै भ्रषटाचार के खिलाफ लड़ रहा हूं और हम मान लेते हैं ।
जिसके शासन मे सबसे ज्यादा हमारे सैनिक शहीद हुए हैं वह कहता है दुश्मन हमसे कांप रहा है और हम मान लेते हैं ।
जिसके समय मे सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है और वह कहता है हमने किसानों की आय दुगुना कर दी है और हम मान लेते हैं ।
जिसके समय मे पकौड़ा तलने के लिए कहा जाता है और हम.उसे रोजगार मान लेते हैं ।
जिसके राज्य मे सबसे ज्यादा बलात्कार हो रहे हैं और वह कहता है हम बेटी बचाव अभियान.चला रहे हैं और हम मान लेते हैं ।
जो सुंदर भविष्य का सपना दिखाकर सत्ता मे आया हो और चार सौ साल पहले के भूतकाल मे हमे घुमा रहा हो और फिर भी हम खुश हैं ।
मित्रों ये सब हमारी मूर्खता की वजह से हो रहा है ।
पर भक़्त को ये सब गलत ही लगेगा।

✍ शिल्पी सिंह

विधायक खरीदने में हो रही दिक्कत से तिलमिलाए भाजपा मंत्री, प्रकाश जावडेकर :

कर्नाटक में राज्यपाल की मदद से फिलहाल बीजेपी की सरकार तो बन गयी है, पर बहुमत साबित करने के लिए विधायकों का जुगाड़ करना अभी भी चुनौती बनी हुई है।

येदियुरप्पा ने आनन-फानन में अमित शाह के भरोसे में मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली पर साथ ही हैरानी भी जताई कि पूरा दिन गुज़र जाने के बाद भी अमित शाह एक विधायक भी क्यों नही खरीद पाए।

“जब मोदी जी ने शाह को पूरा खजाना ही खोल के दे दिया है तो आखिर ये मोटा भाई क्यों कुछ नहीं कर पा रहा है!” -येदियुरप्पा ने अमित शाह की क्षमता पर सवाल उठाते हुए फ़ेकिंग न्यूज़ को बताया। वहीँ, येदियुरप्पा के आरोपों को खारिज करते हुए अमित शाह ने साफ किया है कि विधायकों के साथ डील तो हो गई थी पर SBI का सर्वर डाउन होने की वजह से ट्रांजेक्शन नही हो पाया। कर्नाटके 224 में से 222 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए थे। बीजेपी के सिर्फ 104 विधायक जीते हैं जबकि बहुमत के लिए 112 चाहिए। अब बीजेपी आठ विधायक कहां से लाएगी? जाहिर है विधायक बनाने की कोई मशीन तो है नहीं इसलिए बीजेपी कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को तोड़ने की कोशिश करेगी। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने प्रेस कांफ्रेंस कर बताया है कि ”कर्नाटक कांग्रेस ने अपने विधायको को बंधक बना के रखा है, फोन ले लिए हैं न्यूज़ नही देखने दे रहे है। यहां तक कि परिवार वालों से भी बात नहीं करने दे रहे। ये रिसोर्ट पॉलिटिक्स नही बल्कि डरावनी राजनीति है।”

कर्नाटक चुनाव परिणाम के अगले दिन यानी 16 मई को एच डी कुमारस्वामी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया था कि जेडीएस के प्रत्येक विधायक को 100 करोड़ रुपए ऑफर किए जा रहे है। और अगर ऐसी स्थिति में कांग्रेस-जेडीएस अपने विधायकों को छिपाए हुए हैं तो दिक्कत क्या है? सवाल तो ये भी उठता है कि केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कांग्रेस नेताओं से संम्पर्क करने की कोशिश ही क्यों करे रहे हैं? प्रकाश जावड़ेकर को कांग्रेस नेताओं के फोन बंद होने से क्या दिक्कत है? आप को बता दें कि भले ही पूर्ण बहुमत से चंद कदम दूर रह जाने के बावजूद कर्नाटक विधानसभा में भाजपा सरकार का वर्चस्व कायम हो गया हो लेकिन बीएस येदियुरप्पा द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से भाजपा को लगातार हमलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा ही एक हमला भाजपा के ही नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने किया है। दरअसल, कर्नाटक में राज्यपाल द्वारा भाजपा के हित में लिया गया फैसला जेठमलानी को नागवार गुजरा है। उन्होंने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

कल शाम 4 बजे होगा बहुमत परीक्षण, बीजेपी इसके लिए तैयार नही, लगा बड़ा झटका, गिर सकती है येदयुरप्पा की सरकार :

कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने के बाद भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं. लेकिन विवाद अभी थमा नहीं है। कर्नाटक में बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता देने के बाद उपजे विवाद पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि कर्नाटक में शनिवार यानी कल ही फ्लोर टेस्ट कराया जाएगा। यानी अब तय हो गया कि कर्नाटक में बीजेपी को बहुमत साबित करने के लिए अब 14 दिनों का समय नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट की 3 सदस्यीय बेंच के सामने बीजेपी और कांग्रेस-जेडीएस के पक्ष में दलीलें रखी गईं। सबसे पहले बीजेपी की तरफ से सुप्रीम कोर्ट को वह लेटर उपलब्ध कराया गया जिसे येदियुरप्पा की तरफ से राज्यपाल को भेजा गया था। कर्नाटक में जारी सियासी संग्राम के बीच सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार शाम 4 बजे शक्ति परीक्षण का आदेश दिया। सर्वोच्च अदालत में तीन जजों की पीठ ने 24 घंटे के अंदर बहुमत परीक्षण और शपथ ग्रहण की समीक्षा कराने के 2 सुझाव दिए थे। पीठ ने कहा कि सरकार बनाने के लिए राज्यपाल को किस पार्टी को बुलाना चाहिए था, इसका फैसला बाद में किया जाएगा। कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर द्वारा विश्वास मत परीक्षण के आदेश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि 24 घंटे के अंदर बहुमत परीक्षण ही इस वक्त सर्वोत्तम विकल्प नजर आ रहा है। कोर्ट ने कर्नाटक के डीजीपी को शक्ति परीक्षण के लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कराए जाने का भी निर्देश दिया। कांग्रेस के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने फ्लोर टेस्ट की विडियोग्राफी करवाने की भी मांग की। पीठ ने इसका फैसला लेने का अधिकार राज्यपाल के विवेक पर छोड़ा। यह सुनवाई कांग्रेस-जेडीएस की याचिका पर हुई, जिसमें दोनों पार्टियों ने राज्यपाल वजुभाई वाला के फैसले को चुनौती दी थी। दोनों पार्टियों का इसमें कहना था कि राज्यपाल ने 104 सीटें होने के बाद भी बीजेपी को सरकार बनाने के लिए निमंत्रण भेजा, जबकि सरकार में बहुमत के लिए 112 सीटें चाहिए थीं। कर्नाटक के सियासी नाटक को लेकर आज (18 मई) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने राज्यपाल वजुभाई का फैसला पलटते हुए कहा कि शनिवार (19 मई) को शाम चार बजे शक्ति परीक्षण कराया जाएगा। फ्लोर टेस्ट में जो भी दल बहुमत साबित करने में सफल रहेगा, सरकार उसी की बनेगी। सुनवाई के दौरान भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर से मुकुल रोहातगी वकील थे, जबकि कांग्रेस का पक्ष अभिषेक मनु सिंघवी ने रखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बेहतर ये होगा कि शनिवार को फ्लोर टेस्ट हो ताकि किसी को कोई वक्त ना मिले बजाए इसके कि राज्यपाल के येदियुरप्पा को आमंत्रित करने के फैसले की वैधता पर सुनवाई हो. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साबित हो गया कि येदियुरप्पा के पास विधायकों की पर्याप्त संख्या नहीं है। यह बात कोर्ट के फैसले के बाद अभिषेक मनु सिंघवी ने कही। उन्होंने कहा कि येदियुरप्पा की तरफ से राज्यपाल को दिए गए जो पत्र सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए उसमें लगता है कि सरकार बनाने के लिए जरूरी विधायकों का सर्मथन नहीं था। इसीलिए हमें भरोसा है कि हम 100 फीसदी इस परीक्षण को जीतेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा में एक एंग्लो-भारतीय विधायक को नामित करने के राज्यपाल के फैसले पर रोक लगा दी है। कांग्रेस ने इस पर रोक लगाने की मांग की थी।

✍ शिल्पी सिंह

“ये मोदी है, लेने के देने पड़ जायेंगे” के बाजारू बोल से भाषाई गुंडागर्दी तक गिर चुके प्रधान मंत्री की जुबान।

सीमा पार करोगे तो ये मोदी है, लेने के देने पड़ जायेंगे”

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी बीते 6 मई को हुबली कर्नाटक की एक सभा मे बोलते हुए प्रधानमंत्री ने, सड़क छाप भाषा में किसी छुटभैय्ये मोहल्लावीर की तरह कांग्रेसी नेताओं को, जितनी बेशर्मी से धमकाया था उतनी ही बेशर्मी के साथ उसका वीडियो, “इसको कहते हैं दमदार प्रधानमंत्री” के कैप्शन के साथ उनके अंधसमर्थको ने सोशल मीडिया में फैलाया हुआ है!

“ये मोदी है, लेने के देने पड़ जायेंगे” के बाजारू बोल से भाषाई गुंडागर्दी तक गिर चुके प्रधान मंत्री की जुबान से, विरोधियों के लिए, शाब्दिक कूड़ा करकट झड़ना कोई नयी बात नहीं है! उनके स्कूली सनद में दर्ज श्रेणी और अंक की जानकारी देशवासियों को भले आज तक न हो पाई हो मगर व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के सबसे मेधावी ये साहेबान और इतिहास ज्ञान, सांस्कृतिक बोध और दर्शन सिद्धान्त की वैचारिक उल्टियां करने वाले माननीय महोदय का सीना झूठ बोलने के मामले में यकीनन 56 इंच है!

2014 के बहुउच्चारित और बहुप्रचारित मगर अब आडवाणी जी की तरह देश की ” धरोहर” हो चुके “अच्छे दिन” के विश्वप्रसिद्ध “जुमला ब्राण्ड” कारपेट पर चल कर, संसद की सीढ़ियों में दण्डवत होने का हाईवोल्टेज अभिनय करने वाले इस कथित प्रधान सेवक के पास असंसदीय और अमर्यादित शब्दों के मायाजाल के अलावा कभी कुछ ठोस, दिखाने को रहा ही नहीं है!

पिछले 70 साल के कांग्रेसी हिसाब किताब में अपना कार्यकाल भी घुसा देने वाले, देश के पहले अद्वितीय और अभूतपूर्व प्रधानमंत्री, अपने हर पब्लिक उचाव में अपने कार्यकाल की उपलब्धियां बताने की बजाय “फांसी चढा देना”, “गोली मार देना” , “मेरी जान को खतरा” जैसे भावनात्मक वाक्यों के सहारे लोगों के दिलों में दाखिल होने का देशी जुगाड़ तलाशते रहते है!
पिछले चार साल से कारपोरेटी ऋण से उऋण हो रही इस सरकार के मुखिया की नीति और कार्यक्रमों की कोई चर्चा सरकार पोषित मीडिया में तो होने से रही, हां एक दो मीडिया संस्थान जिन्हें अक्सर कांग्रेसी या वामपंथी कह कर खारिज कर दिया जाता है, वहां सरकार पर थोड़े बहुत साल जरूर उठते रहते है मगर वो भी अपनी अधिकतर ऊर्जा मुख्य सेवक के झूठ और जुमलों को काउंटर करने में ही जाया करते है! इधर वामी इंटेलेक्चुएल्स का एजेंडा कुछ ऐसा होता है कि उनके मुद्दों से मोदी सरकार घिरने की बजाय और ज्यादा आक्रमक हो जाती है!

कुछ तटस्थ इंटेलेक्चुएल्स को छोड़ दिया जाय तो इस सरकार के कार्यकाल का पिछली सरकार के कार्यों के साथ कोई तुलनात्मक और आलोचनात्मक विश्लेषण कभी होता ही नहीं है! ऐसे में स्वयं प्रधानमंत्री के लिए विरोधियों की कमर से नीचे वार करने का भरपूर अवसर होता है मगर वो ऐसे वार करने में भी शब्द और लहजा ऐसा चुनते है कि जैसे गली कोई गुंडा तैश में आकर देख लेने की धमकी दे रहा हो! कुल मिला कर देश की राजनैतिक फ़िज़ा कुछ ऐसी है कि देश का मुखिया, जानबूझ कर भाषायी ओछरन देश पर उड़ेल देता है जिसे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का बड़ा हिस्सा चाटने लगता है और कुछ हिस्सा उसकी बदबू पर डियोडरेंट स्प्रे करने लगता है।

282 सांसदों के लावलश्कर के साथ पूर्ण बहुमत हासिल सरकार के माननीय मुखिया और सत्ताधारी पार्टी के अति सुविख्यात अध्यक्ष, पब्लिक मीटिंग के दौरान धमकी भरे शब्दों की ऐसी खट्टी डकारें मारते है जैसे वो सरकार नहीं मुम्बई का कोई आपराधिक गैंग चला रहे हो! अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान बन्द कमरें में अपने पिठ्ठू पत्रकारों के तयशुदा सवालों का जवाब देने वाले 56 इंची सीने में इतना भी कलेजा नहीं है कि वो एक खुली प्रेस कांफ्रेंस करके जनता से सीधे सम्वाद कर सकें!

सरकार की उपलब्धियां दिखाने की बजाय अपने शब्दों और भाषा के ओछेपन से राजनैतिक विरोधियों को आतंकित करने की कोशिश करने वाले प्रधानमंत्री महोदय की जुबान से झड़ने वाले शब्द जिन्हें सुहाते है, वो उनकी चरण वंदना बेशक करें मगर चाल, चरित्र और चेहरा की आड़ में घटिया शब्दावली और भाषा के शोर के अलावा उनकी कोई उपलब्धि हो तो मुझे भी अवगत करावें ताकि उनके वरिष्ठ पीएम इन वेटिंग लौहपुरुष के और उनके वरिष्ठ पार्टी साथियों के श्राप से इस गुजराती जोड़ी को मुक्ति दिलाने के लिए कोई श्लोक या मंत्र पढ़ने का हौसला मुझे भी मिल सके! बाकी इतिहास को तो माननीय प्रधानमंत्री के क्रांतिकारी जुमलों और शब्दगुंडई को सम्हाल के रखना ही है!

✍ शिल्पी सिंह

दो दिन के लिये छत्तीसगढ़ दौरे पर राहुल, कई कार्यक्रमों में करेंगे शिरकत :

एक तरफ जहां कर्नाटक में सरकार बनाने को लेकर रस्साकशी चल रही है. दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने अगले मिशन की तैयारी में लग गए हैं।

आज से राहुल गांधी अपने दो दिवसीय दौरे पर छत्तीसगढ़ जाएंगे। जहां वो कई तरह कार्यक्रमों में भाग लेंगे।

राहुल अपने दो दिवसीय दौरे में किसानों और आदिवासियों के बीच पार्टी का आधार मजबूत करने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होंगे. छत्तीसगढ़ में इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं. उसी समय मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी चुनाव होंगे.

कांग्रेस के छत्तीसगढ़ प्रभारी पीएल पूनिया ने बताया कि राहुल गांधी का दो दिवसीय छत्तीसगढ़ दौरा हो रहा है. वह किसानों, आदिवासियों और समाज के दूसरे वर्गों के लोगों से मिलेंगे, उनका एक रोड शो भी होगा.

उन्होंने दावा किया, ‘‘रमन सिंह सरकार के कुशासन से किसान, मजदूर, आदिवासी और दूसरे सभी वर्गों के लोग परेशान हैं, लोग इस सरकार से मुक्ति चाहते हैं. कांग्रेस अध्यक्ष के दौरे से पार्टी की उम्मीदों को बहुत बल मिलेगा.’’

पुनिया के मुताबिक, राहुल 17 मई को पंचायतीराज सम्मेलन का रायपुर में उद्घाटन करेंगे. इसके बाद वह सीतापुर में किसान सम्मेलन में भाग लेंगे. 17 मई को पेंड्रा में जन अधिकार सभा को संबोधित करेंगे.

वह 18 मई को बिलासपुर संभाग के 24 विधानसभा के बूथ प्रभारियों से संवाद करेंगे, इसके बाद वह दुर्ग संभाग के 20 विधानसभा क्षेत्रों के बूथ प्रभारियों से बातचीत करेंगे. 18 मई की शाम को दुर्ग में गांधी और पटेल की प्रतिमा में मार्ल्यापण करने के बाद राहुल रोड शो करेंगे, यह रोड शो दुर्ग से रायपुर एयरपोर्ट तक होगा.

याद हो कि 2013 में थोड़ा आया अंतर से कांग्रेस सरकार बनाने से चूक गई थी जिसका कारण कांग्रेस का मध्यप्रदेश और राजस्थान के कारण छतीसगढ़ चुनाव पर कम ध्यान देना बताया गया था। इसलिये राहुल इस बार ऐसी गलती दोहराना नही चाहते हैं। क्योंकि कांग्रेस जिस तरह से एक के बाद एक राज्यो में पराजय का सामना कर रही है उसके बाद कार्यकर्ताओं में काफी निराशा है और मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत को मुहर लग रहा है इसलिये राहुल अब भाजपा शासित राज्यो में भाजपा को उखाड़ फेंकने की संकल्प के साथ छतीसगढ़ से अभियान की शुरुआत कर रहे हैं।

✍ शिल्पी सिंह

लाख कोशिश करने के बाद भी भाजपा बहुमत से दूर :

कर्नाटक का सियासी पारा भी चढ़ने लगा है. बेंगलुरु में मौजूद कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि बीजेपी उनके विधायकों को धमका रही है. उन पर दबाव बना रही है, उसे लोकतंत्र में भरोसा नहीं, आजाद ने कहा कि अगर राज्यपाल ने संवैधानिक मूल्यों का पालन नहीं किया और हमें सरकार बनाने के लिए निमंत्रित नहीं किया, तो यहां खूनी संघर्ष होगा.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस विधायकों के असंतुष्ट होने की अफवाहें फैलाई जा रही हैं, लेकिन वास्तव में बीजेपी असंतुष्ट है.इस बीच कांग्रेस विधायक अमरेगौड़ा ने कहा है कि बीजेपी ने उन्हें कैबिनेट मंत्री के पद का ऑफर दिया था, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया.

अमरेगौड़ा लिंगनागौड़ा पाटिल बयापुर कर्नाटक के कुश्तगी से विधायक हैं. आजाद ने कहा कि राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बीजेपी के पास बहुमत का आंकड़ा नहीं है. बीजेपी के पास 104 सीटें हैं, हमारे (कांग्रेस-जेडीएस) पास 117 सीटें हैं. राज्यपाल पक्षपाती नहीं हो सकते हैं.

कर्नाटक में फिलहाल त्रिशंकु विधानसभा के आसार दिख रहे हैं यानी किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जो आंकड़ा नजर आ रहे हैं वो इस प्रकार है- बीजेपी-104, कांग्रेस-78, JDS-37 अन्य-3 224 में से 222 सीटों पर चुनाव हुआ है यानी बहुमत के लिए 112 सीट चाहिए, जो किसी भी पार्टी के पास नहीं है।

हालांकि कांग्रेस ने JDS को मुख्यमंत्री पद ऑफर करते हुए बिना शर्त समर्थन देने को तैयार है। लेकिन बीजेपी शांत तो बैठने वाली है नहीं…जाहिर है अब विधायकों की खरीद फरोख्त शुरू होगी, धनबल, बाहूबल का प्रयोग होगा। एक राजनीतिक पार्टी दूसरे राजनीतिक पार्टी के विधायकों को खरीदने का प्रयास करेगी, सभी राजनीतिक दल अपने-अपने विधायकों को बचाने का प्रयास करेंगे। बीजेपी जहां बहुमत के आंकड़े छूने में नाकाम रही है तो कांग्रेस ने बिना मौका गंवाए जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) को समर्थन देने का ऐलान करते हुए उन्हें सीएम पद का ऑफर दे दिया है। वहीं बीजेपी ने भी सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है। ऐसे में अब राज्यपाल के विवेक पर ही सबकुछ निर्भर करता है। आमतौर पर राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं, लेकिन हाल में हुए गोवा, मेघालय और मणिपुर विधानसभा चुनावों में चुनाव के बाद बने नए गठबंधन को सरकार बनाने का मौका दिया जा चुका है।

इसलिए कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार बनने के ज़्यादा आसार नज़र आ रहे हैं। गठबंधन सरकार की संभावना भले ही ज़्यादा हों लेकिन बीजेपी भी राज्य में सत्ता पर काबिज़ होने के लिए सारे जतन करती दिखाई दे रही है। बीजेपी द्वारा विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की आशंका भी जताई जा रही है। बीजेपी 104 पर सिमट गई है । कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर (78+38=116 )दावा पेश किया लेकिन राज्यपाल ने ठुकरा दिया काश राज्यपाल ने गोवा , मणिपुर और मेघालय में भी यहीं किया होता ?

अब बीजेपी के पास एक ही रास्ता है कि अब कांग्रेस या जेडीएस के विधायको से अलग अलग मिलकर उन्हे CBI, ED और IT का डर दिखाकर अपनी ओर मिला ले या कम से कम 8 विधायको को खरीद ले । बीजेपी के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं होगी उसने पहले भी उत्तराखंड और अरुणाचल में ऐसा कर चुकी है । या दूसरा रास्ता ये हो सकता है कि बीजेपी पूरी JDS पार्टी के पीछे ही CBI , ED या IT को लगा दे तो BJP और JDS (104+38=142) की सरकार बन जाये । यदि बीजेपी को कर्नाटक में सरकार बनानी है तो इन सभी असंवैधानिक रास्तो में से किसी न किसी रास्ते को अपनाना होगा ।

इन सभी खेल के बीच राज्यपाल की भूमिका भी अहम होगी । यह तो निश्चित है कि कर्नाटक में सरकार चाहे जिसकी बने जीत तो केवल धर्म की ही हुई है इसलिए अगले पाँच साल तक कर्नाटक में आधिकाँस काम धर्म के विकास का ही होगा जैसे कि 2014 से राष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है।

✍शिल्पी सिंह

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