Saturday, August 15, 2026
Home Blog Page 386

कर्नाटक चुनाव का नाटकीय हाल, किसी को बहुमत नही मगर कांग्रेस-जेडीएस के चाल से भाजपा परेशान

कर्नाटक चुनाव के जैसे-जैसे नतीजे आ रहे थे, वैसे-वैसे प्रदेश में नई सरकार के गठन को लेकर पूरा घटनाक्रम नाटकीय और अनिश्चित होता जा रहा था। और दोनों पक्षों द्वारा सरकार बनाने का दावा पेश करने के बाद अब आखिरकार गेंद राज्यपाल के पाले में है।

नतीजे आने के बाद बनी स्थिति के अनुसार, बीजेपी के पास 104 विधायक हैं, कांग्रेस के पास 78, जेडीएस गठबंधन के पास 38, एक निर्दलीय और एक विधायक कर्नाटक प्रज्ञावंथा जनता पार्टी का है।

224 में से फिलहाल 222 सदस्यों की विधानसभा में किसी भी दल के पास बहुमत नहीं है। सरकार बनाने के लिए किन्हीं दो पार्टियों का साथ आना जरूरी है। इसलिए रूझान आने के थोड़ी देर बाद ही कांग्रेस ने जेडीएस को मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव देकर शह और मात के इस खेल में पहली बड़ी चाल चल दी थी और जेडीएस ने इसे स्वीकार भी कर लिया।

इतना तो तय है कि अगर बीजेपी सरकार बना भी लेती है तो उसके लिए बहुमत जुटाना बहुत मुश्किल होगा क्योंकि किसी भी पार्टी को तोड़ने के लिए दो-तिहाई विधायकों का निकलना दल-बदल कानून के हिसाब से जरूरी होता है और ऐसा होने की संभावना बहुत कम है।

एक दूसरी संभावना भी है। अगर कांग्रेस या जेडीएस के कम से कम एक दर्जन विधायक विश्वास मत के दौरान अनुपस्थित रहते हैं या अयोग्यता का खतरा उठाते हुए पार्टी के व्हिप के खिलाफ जाकर वोट करते हैं तो ही बीजेपी की सरकार चल सकती है।

क्या बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव के लगभग एक साल पहले खरीद-फरोख्त का आरोप सहने का खतरा उठाने के लिए तैयार है? क्या उसे लोकसभा सीटों की परवाह नहीं? पार्टी की अब तक की भाव-भंगिमा को देखकर ऐसा निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

यह बिल्कुल 2014 के दिल्ली विधानसभा चुनाव जैसी स्थिति है जब बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होते हुए बहुमत से दूर थी और कांग्रेस के समर्थन से आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाई थी। सरकार गिरने के बाद भी बीजेपी जनता में जाने वाले गलत संदेश की वजह से आम आदमी पार्टी के विधायकों को अपने पाले में करने से हिचकिचाती रही क्योंकि लोकसभा चुनाव आने वाले थे। लेकिन अब तो केंद्र में सरकार भी उनकी है और राज्य में राज्यपाल भी। इसलिए थोड़ा संशय होना लाजिमी है।
यह संशय उस समय भी था जब नतीजे आ रहे थे। थोड़ी ही देर बाद ऐसा लगने लगा कि बीजेपी को बहुमत मिल जाएगा। एक समय तो बीजेपी रुझानों में बहुमत के आंकड़े को पार भी कर गई थी, लेकिन फिर एक-एक कर उसकी संख्या कम होने लगी और वह 104 पर अटक गई।

राज्यपाल के पास सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए भी बारी-बारी से बीजेपी के सीएम उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा और कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के दावेदार एचडी कुमारस्वामी पहुंच गए। हर तरफ अनिश्चितता और कोलाहल जैसा माहौल बन गया था।सब की निगाह राजपाल पे है औऱ अभी भी है।

✍ शिल्पी सिंह

भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी सत्ता से रह जाएगी दूर! कांग्रेस और JDS साथ मिलकर सरकार बनाने को तैयार, कुमार स्वामी होंगे CM!

कर्नाटक चुनाव के रुझानों में बीजेपी की सीटें बहुमत के आंकड़े से कम हो गई हैं। बहुमत के लिए बीजेपी को 112 सीटें चाहिए, लेकिन रुझानों के अनुसार, बीजेपी को 106, कांग्रेस को 73 और जेडीएस को 41 सीटें मिल रही हैं।
कर्नाटक चुनाव के रुझानों में त्रिशंकु विधानसभा के आसार के बीच राज्य की अगली सरकार को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं। इस बीच केरल के सीएम पिन्नारई विजयन ने कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस को साथ आकर सरकार बनाने की सलाह दी है। मीडिया से बात करते हुए विजयन ने कहा कि बीजेपी को सत्ता से रोकने के लिए जेडीएस और कांग्रेस को एक साथ आकर सरकार बनाना चाहिए।
कर्नाटक चुनाव के रुझानों में बीजेपी की सीटें बहुमत के आंकड़े से कम हो गई हैं। बहुमत के लिए बीजेपी को 112 सीटें चाहिए, लेकिन रुझानों के अनुसार, बीजेपी को 106, कांग्रेस को 73 और जेडीएस को 41 सीटें मिल रही हैं।
कर्नाटक विधानसभा चुनाव के ताजा नतीजों और रुझानों से राज्य में त्रिशंकु विधानसभा के आसार नजर आ रहे हैं। रुझान अगर नतीजों में बदलते हैं तो राज्य में बीजेपी या कांग्रेस दोनों को ही सरकार बनाने के लिए जेडीएस के समर्थन की जरूरत होगी। हालांकि, जेडीएस सुप्रीमो और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और उनके बेटे एचडी कुमारास्वामी की तरफ से अभी कोई बयान नहीं आया है। लेकिन बताया जा रहा है कि दोनों ही अपने घर पर पार्टी नेताओं के साथ बैठकर चुनाव नतीजों पर नजर बनाए हुए हैं। कहा जा रहा है कि देवगौड़ा अंतिम नतीजों के बाद ही इस परिणाम और अपनी पार्टी के रुख पर कोई बात करेंगे।
कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हमारी एचडी देवगौड़ा और कुमारस्वामी से फोन पर बातचीत हुई है और उन्होंने हमारे प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है।
कर्नाटक चुनाव के नतीजों के बाद पैदा हुई स्थिति को देखते हुए कांग्रेस ने जेडीएस को समर्थन देने का ऐलान किया है। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद, अशोक गहलोत और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मीडिया से बात करते हुए इस बात की जानकारी दी। बहुमत से कुछ कदम दूर खड़ी भाजपा के लिए सबसे बड़ा सदमा होगा कि जेडीएस और कांग्रेस मिलकर साथ में सरकार बना लें। पिछले चुनावों से सबक लेते हुए कांग्रेस ने पहले से ही इसकी तैयारी कर ली थी और दिल्ली से गुलाम नबी आजाद को भेज कर जेडीएस से संपर्क साधा। गुलाम नबी आजाद ने जेडीएस के साथ हालांकि बड़ी संभावना जताई जा रही है कि जेडीएस सिर्फ इस शर्त पर मानी है कि कुमार स्वामी मुख्यमंत्री होंगे। भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस संभवतः इस शर्त को भी स्वीकार रही है। मिलकर सरकार बनाने का ऑफर किया है। वर्तमान स्थिति में कांग्रेस और जेडीएस मिलने पर 114 सीटें हो जाएंगी जो बहुमत के आंकड़े 112 से ज्यादा है। आपको बता दें कि भले ही अब तक के मजगणना में भारतीय जनता पार्टी वोटों हासिल करने में सबसे आगे चल रही है लेकिन कांग्रेस का वोट प्रतिशत बीजेपी से आगे चल रहा है। इसके बाद ही जो अब ताजा जानकारी सामने आ रही है उसके मुताबिक जेडीएस ने भी कांग्रेस पार्टी का गठबंधन करने का यह ऑफर स्वीकार कर लिया है। जिसके साथ ही अब देखना दिलचस्प होने वाला है कि बहुमत न मिलने पर तो बीजेपी का सरकार बनाना पूरी तरह से असंभव है।
जेडीएस प्रवक्ता दानिश अली ने कहा है कि कांग्रेस ने एचडी कुमारास्वामी को सीएम बनाने की पेशकश की थी, जिसे जेडीएस ने मंजूर कर लिया है। इसके बाद जेडीएस ने कांग्रेस के साथ राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करने का फैसला किया है।

✍ सिंह शिल्पी

15 को आयेगा कर्नाटक का नतीजा मगर कर्नाटक से राहुल का हुआ उदय :

कर्नाटक चुनाव हो गए। 2600 से ज्यादा उम्मीदवारों की किस्मत EVM में कैद हो गई और अब सिर्फ कर्नाटक ही नहीं, पूरे देश को इन चुनावों के नतीजों का इंतजार है। वैसे तो 15 मई को होने वाली मतगणना के बाद ही पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठा है, लेकिन कर्नाटक वासियों और राजनीतिक-चुनावी विश्लेषकों से बातचीत से जो निचोड़ निकल रहा है, वह यह है कि इस चुनाव में कांग्रेस का पलड़ा बीजेपी के मुकाबले भारी रहा है। लेकिन, कुछ विश्लेषक यह भी मानते हैं कि कांग्रेस नंबर एक पार्टी बनकर तो उभरेगी, लेकिन पूर्ण बहुमत से दूर रहेगी। दरअसल वे यह कह रहे हैं कि इन चुनावों में किसी को बहुमत नहीं मिलेगा। ऐसी सूरत में देवेगौड़ा की पार्टी जेडीएस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाएगी। मगर सबका यही कहना है कि देवेगौड़ा की डील अमित शाह के साथ हो चुकी है, और जरूरत पड़ने पर वे बीजेपी की ही मदद करेंगे लेकिन JDS के प्रवक्ता और देवगौड़ा ने मीडिया से बातचीत में कांग्रेस के तरफ अपना झुकाव बताया है और कहा है कि फल कांग्रेस को ही करनी पड़ेगी।

सबसे पहली बात यह कि इस चुनाव से साबित हो गया कि मोदी का जादू अब टूट चुका है। 2018 के मोदी वह नहीं रहे जो 2014 में नजर आते थे। 2014 में तो हालत यह थी कि अगर वे पत्थर भी छू लें, तो सोना हो जाए। वह लोगों के खाते में 15 लाख देने की बात करते थे, और लोग आंख बंद करके उन पर विश्वास कर रहे थे। वह हर साल दो करोड़ नौकरियां देना का ऐलान करते, तो युवा खुशी से झूमने लगते थे। मोदी स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन और भी जाने क्या-क्या सपने बेचते, और देश के लोग इस सपने में झूम-झूम उठते मोदी को अपनी भाषण कला पर बड़ा गर्व हुआ करता था, और भक्त भी वाह-वाह करते नहीं थकते थे। इसमें संदेह नहीं कि हाथ घुमा-घुमाकर वह शब्दों का जादू चला लेते हैं। लेकिन कर्नाटक उनका हर भाषण झूठे तथ्य और विरोधियों पर हमलों के पुलिंदे के अलावा कुछ दिखा ही नहीं। जब तक मोदी की साख रही, उनके भाषणों का जादू भी चलता रहा, लेकिन अब साख भी जा रही है, और साथ ही जा रहा है भाषणों का जादू।

2018 में राहुल गांधी एक बेदाग चेहरे के तौर पर सामने आए हैं। वह एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जो सच्ची और सीधी बात करता है। मोदी रेडियो पर मन की बात करते हैं, लेकिन राहुल गांधी के भाषणों में दिल की बात होती है। राहुल खुले दिल से और खुलेआम संघ और बीजेपी की आलोचना करते हैं। देश में आज जो माहौल है, उसमें खुलेआम संघ की आलोचना करने की हिम्मत राहुल गांधी ने दिखाई है, कि यह लड़ाई विचारधारा की है, जिसमें क तरफ संघ की संकीर्ण विचारधारा है तो दूसरी तरफ कांग्रेस की सेक्युलर विचारधारा। और अपने वैचारिक विरोधी और प्रतिद्वंदी को खुलेआम चुनौती देने की हिम्मत भी अकेले राहुल गांधी ने ही दिखाई है।पुरानी कहावत है कि अगर नेता ही हिम्मत वाला न हो तो, वह नेता कैसा? संघ और बीजेपी की विचारधारा पर तीखे हमले करते हुए खुलेआम उन्हें चुनौती देकर राहुल गांधी ने अपनी दादी इंदिरा गांधी के साहस की याद दिला दी है।

2018 के राहुल गांधी भी 2014 के राहुल गांधी नहीं रहे। वह एक परिपक्व और समझदार नेता के तौर पर उभरे। उन्हें भाषण देना भी आ गया है। उनकी राजनीतिक सूझबूझ से आम देशवासी प्रभावित हो रहे हैं। अब राहुल गांधी घबराते नहीं हैं। बड़े से बड़े राजनीतिक मुद्दे को वह आसानी से बखूबी हल कर लेते हैं। बेंग्लुरु में 10 मई को हुई उनकी प्रेस कांफ्रेंस इसकी मिसाल है कि वे मुश्किल स्थितियों का सामना भी खुलकर करते हैं। नतीजे 15 मई को आ जाएंगे, इस दौरान कयासों का दौर जारी रहेगा, लेकिन बीते करीब दो पखवाड़े में मोदी का ऊंट राहुल के पहाड़ के नीचे आता दिखा। तो क्या 2019 में सेक्युलर धड़े के नेता राहुल गांधी होगे।

✍ सिंह शिल्पी

एक राहुल गाँधी से लड़ता आरएसएस, बीजेपी और गोदी मीडिया :

वैसे तो इतिहास गवाह है आरएसएस और उसकी राजनितिक संगठन बीजेपी सदैव गाँधी परिवार के नेताओ पर तथ्यहीन हमला करने में आगे रही है और उनके खिलाफ एक लम्बी लड़ाई लड़ी है जिसमे अंततः सदैव उसे हार ही मिली है।

चाहे वो पंडित नेहरू के बारे में झूठ बोलकर, फेक फोटो डालकर या इतिहास को तोड़मरोड़ कर उनका चरित्रहनन करने की कोशिश हो।

या चाहे वो इंदिरा गाँधी के राजनीती में आने पर उन्हें गूंगी गुड़िया कहकर राजनीती में अपरिपक्व बताकर उनका विरोध करना हो या फिर राजीव गाँधी को राजनितिक तौर पर अज्ञानी कहना हो हर जगह आरएसएस ने अपना घिनौनापन दिखाया है।

आरएसएस का विरोध करने का सबसे घिनौना तरीका सोनिया गाँधी जी के खिलाफ रहा जब आरएसएस के लोगो ने फेक फोटोशॉप और झूठी कहानी की रचना करके लोगो में विद्वेष पैदा करने की कोशिश की।

जब से राहुल गाँधी ने राजनीती में कदम रखा है तब से ही आरएसएस उन्हें बच्चा कहकर तथ्यहीन चुटकुला, पप्पू जैसा शब्द दिया लेकिन उनपर कभी तथ्य के साथ कोई आरोप नही लगा पाई आरएसएस की राहुल के खिलाफ लड़ाई थोड़ी लंबी और मजबूती तौर पर है क्योंकि अन्य नेता जहाँ सिर्फ गरीबो का कल्याण और देश के विकास पर ही ध्यान देते थे।

वही राहुल गरीबो और किसानों के कल्याण तथा देश के विकास के साथ-साथ आरएसएस के जडो पर हमला करके आरएसएस को बेनकाब कर रहे हैं ।
जिस कारण आरएसएस बौखला गई है तभी तो प्रधानमंत्री जैसे पद पर रहने के बाबजूद भी मोदी दिन-रात सिर्फ राहुल गाँधी की मजाक उड़ाने और तथ्यहीन बात कर उनकी व्यक्तित्व को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं।

✍ सिंह शिल्पी

कर्नाटक के एग्जिट पोल में किसी को बहुमत नही मगर भाजपा को कम सीट मिला तो मोदी का तस्वीर हुआ गायब :

कर्नाटक में मतदान थम चुका है और इसी के साथ शुरू हो चुका है चैनलों का एग्जिट पोल। जो ये बता रहा है की कौन सी पार्टी कर्नाटक में सरकार बनाने जा रही है। किसी एग्जिट पोल में कांग्रेस को आगे बताया जा रहा है तो किसी में बीजेपी। इसे लेकर टाइम्स नाउ ने अपना एग्जिट पोल नतीजा बता दिया है इसी के साथ कर्नाटक चुनाव में बीजेपी का चेहरा पीएम मोदी स्क्रीन से धीरे से हटा लिए गए है। बीजेपी कर्नाटक चुनाव पीएम मोदी के चेहरे पर लड़ रही थी ऐसा खुद बीजेपी ने अपने हर रैली में कहा मगर गोदी मीडिया के लोग पीएम मोदी की नाराज़गी का इतना ध्यान रखते है की शुरूआती रुझाने में जब बीजेपी को कम सीटें मिलनी शुरू हुई तो पीएम मोदी की तस्वीर हटा ली गई।

बता दें कि कर्नाटक में 2,600 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। 4.96 करोड़ से अधिक मतदाता उनका फैसला करेंगे। इन मतदाताओं में 2.52 करोड़ से अधिक पुरुष, करीब 2.44 करोड़ महिलाएं और 4,552 ट्रांसजेंडर शामिल हैं। राज्य में 55,600 से अधिक मतदान केंद्र बनाए गए थे। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की पार्टी जनता दल सेक्युलर ने चुनाव परिणाम आने से पहला अपना शुरुआती स्टैंड साफ कर दिया है। दरअसल जिस ढंग से एक्जिट पोल के नतीजे आ रहे हैं और उसमें कर्नाटक में इस बार त्रिशुंक विधानसभा रहने की बात कही जा रही, जिससे जेडीएस खुद को संभावित किंग मेकर की भूमिका में मानकर चल रही है। अटकलें लगतीं रहीं कि जेडीएस बीजेपी को समर्थन देकर गठबंधन सरकार बनवा सकती है मगर जेडीएस ने ऐसी किसी भी अटकलों को खारिज कर दिया है। एनडीटीवी से बातचीत में पार्टी के प्रवक्ता दानिश अली ने कहा कहा कि बीजेपी के साथ जाने का सवाल नहीं उठता। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस सौ से कम सीट पाती है तो उसकी जिम्मेदारी है कि वह समर्थन के लिए संवाद करे। बता दें कि कर्नाटक में अब तक नौ एक्जिट पोल हुए हैं। सभी पोल राज्य में त्रिशुंक विधानसभा होने के संकेत दे रहे हैं। किसी भी पार्टी को बहुमत के लिए 122 सीट जरूरी है। एक्जिट पोल्स में कांग्रेस भले ही बड़ी पार्टी के रूप में उभरती दिख रही है मगर उसे बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। दरअसल चुनावी नतीजों को लेकर अटकलें पहले से ही लगाई जाने लगी है।

मगर इस बीच सबसे ज्यादा चालाकी का काम किया है टाइम्स नाउ जिसने कम सीट होने चलते पीएम मोदी की तस्वीर हटा दी है। बीजेपी कर्नाटक चुनाव पीएम मोदी के चेहरे पर लड़ रही थी ऐसा खुद बीजेपी ने अपने हर रैली में कहा मगर गोदी मीडिया के लोग पीएम मोदी की नाराज़गी का इतना ध्यान रखते है की शुरूआती रुझाने में जब बीजेपी को कम सीटें मिलनी शुरू हुई तो पीएम मोदी की तस्वीर हटा ली गई। फैसला 15 मई को आएगा लेकिन बीजेपी की हताशा अभी से ही आने वाले परिणाम की झलक दिखा रही है। दरअसल आज सुबह जब बीजेपी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बी एस येदियुरप्‍पा वोट देकर बाहर आ रहे थें तब उनके चहरे पर गहरी हताशा नजर आयी। ऐसा लग रहा था मानों उनके अंदर की उम्मीद ने दम तोड़ दिया हो।

✍ शिल्पी सिंह

जेल में भगत सिंह से नेहरू की मुलाकात को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने झूठ बोला?

9 मई को कर्नाटक के बिदर में एक रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा, ‘जब शहीद भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और वीर सावरकर देश की आजादी के लिए जेल में लड़ रहे थे. क्या कोई कांग्रेस नेता उनसे मिलने गया था?’ उन्होंने कहा, ‘लेकिन, कांग्रेस नेता जेल में बंद भ्रष्ट लोगों से मिलते हैं.’ जाहिर है कि प्रधानमंत्री का इशारा दिल्ली स्थित एम्स में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और लालू प्रसाद यादव की मुलाकात की ओर था.

ये दस्तावेजों में दर्ज है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लाहौर जेल में 8 अगस्त, 1929 को भगत सिंह और उनके साथियों से मुलाकात की थी, जो प्रशासन के दुर्व्यवहार के खिलाफ जेल में भूख हड़ताल कर रहे थे. लाहौर से प्रकाशित ट्रिब्यून अखबार के सायंकालीन संस्करण के पहले पन्ने पर पंडित जवाहर लाल नेहरू, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की मुलाकात की खबर प्रकाशित की है. खबर की हेडलाइन, “Pt. Jawaharlal Interviews Hunger Strikes” है. खबर की तस्वीर यहां देखी जा सकती है, जिसे पढ़ा जा सकता है. खबर कहती है, “पंडित जवाहर लाल नेहरू एमएलसी डॉक्टर गोपीचंद के साथ लाहौर जेल गए और बोर्स्टल जेल में लाहौर षड्यंत्र केस में भूख हड़ताल कर रहे सत्याग्रहियों से मुलाकात की और उनका साक्षात्कार किया.” पंडित जवाहर लाल पहले सेंट्रल जेल गए जहां उन्होंने सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त से मुलाकात की और भूख हड़ताल के बारे में उनसे बातचीत की.” इस बातचीत के बारे में नेहरू ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखा है और ये बताया है कि वे भगत सिंह से किस तरह प्रभावित थे. नेहरू ने लिखा, ‘मैं उस समय लाहौर में था, जब भूख हड़ताल को एक महीने हो गए थे. मुझे जेल में बंद कैदियों से मुलाकात की परमिशन दी गई और मैंने इसका लाभ उठाया.’ उन्होंने लिखा, “मैंने पहली बार भगत सिंह, जतींद्र दास और अन्य लोगों को पहली बार देखा.” उन्होंने कहा, ‘निश्चित रूप से क्रांतिकारियों और गांधी के सिद्धांतों को मानने वाले कांग्रेस नेताओं के बीच मतभेद थे. लेकिन वे एक दूसरे के प्रति बहुत सम्मान रखते थे. खासतौर पर पंडित जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस का क्रांतिकारी बहुत सम्मान करते थे।

प्रधानमंत्री मोदी के लिए चुनाव जीतना बड़ी बात नहीं है। वे जितने चुनाव जीत चुके हैं या जीता चुके हैं यह रिकार्ड भी लंबे समय तक रहेगा। कर्नाटक की जीत कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन आज प्रधानमंत्री मोदी को अपनी हार देखनी चाहिए। वे किस तरह अपने भाषणों में हारते जा रहे हैं। आपको यह हार चुनावी नतीजों में नहीं दिखेगी। वहां दिखेगी जहां उनके भाषणों का झूठ पकड़ा जा रहा होता है। उनके बोले गए तथ्यों की जांच हो रही होती है। इतिहास की दहलीज़ पर खड़े होकर झूठ के सहारे प्रधानमंत्री इतिहास का मज़ाक उड़ा रहे हैं। इतिहास उनके इस दुस्साहस को नोट कर रहा है। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी के लिए नेहरू चुनौती बन गए हैं। उन्होंने खुद नेहरू को चुनौती मान लिया है। वे लगातार नेहरू को खंडित करते रहते हैं। उनके समर्थकों की सेना व्हाट्स अप नाम की झूठी यूनिवर्सिटी में नेहरू को लेकर लगातार झूठ फैला रही है। नेहरू के सामने झूठ से गढ़ा गया एक नेहरू खड़ा किया जा रहा है। अब लड़ाई मोदी और नेहरू की नहीं रह गई है। अब लड़ाई हो गई है असली नेहरू और झूठ से गढ़े गए नेहरू की। आप जानते हैं इस लड़ाई में जीत असली नेहरू की होगी। नेहरू से लड़ते लड़ते प्रधानमंत्री मोदी के चारों तरफ नेहरू का भूत खड़ा हो गया। नेहरू का अपना इतिहास है। वो किताबों को जला देने और तीन मूर्ति भवन के ढहा देने से नहीं मिटेगा। यह ग़लती खुद मोदी कर रहे हैं। नेहरू नेहरू करते करते वे चारों तरफ नेहरू को खड़ा कर रहे हैं। मोदी के आस-पास अब नेहरू दिखाई देने लगे हैं। उनके समर्थक भी कुछ दिन में नेहरू के विशेषज्ञ हो जाएंगे, मोदी के नहीं। भले ही उनके पास झूठ से गढ़ा गया नेहरू होगा मगर होगा तो नेहरू ही। भगत सिंह और नेहरू को लेकर प्रधानमंत्री ने जो ग़लत बोला है, वो ग़लत नहीं बल्कि झूठ है। नेहरू और फील्ड मार्शल करियप्पा, जनरल थिम्मैया को लेकर जो ग़लत बोला है वो भी झूठ था। कई लोग इस ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि प्रधानमंत्री की रिसर्च टीम की ग़लती है। आप ग़ौर से उनके बयानों को देखिए। जब आप एक शब्दों के साथ पूरे बयान को देखेंगे तो उसमें एक डिज़ाइन दिखेगा। भगत सिंह वाले बयान में ही सबसे पहले वे खुद को अलग करते हैं। कहते हैं कि उन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है और फिर अगले वाक्यों में विश्वास के साथ यह कहते हुए सवालों के अंदाज़ में बात रखते हैं कि उस वक्त जब भगत सिंह जेल में थे तब कोई कांग्रेसी नेता नहीं मिलने गया। अगर आप गुजरात चुनावों में मणिशंकर अय्यर के घर हुए बैठक पर उनके बयान को इसी तरह देखेंगे तो एक डिज़ाइन नज़र आएगा। प्रधानमंत्री के चुनावी भाषणों को सुनकर लगता है कि नेहरू का यही योगदान है कि उन्होंने कभी बोस का, कभी पटेल का तो कभी भगत सिंह का अपमान किया। वे आज़ादी की लड़ाई में नहीं थे, वे कुछ नेताओं को अपमानित करने के लिए लड़ रहे थे। क्या नेहरू इन लोगों का अपमान करते हुए ब्रिटिश हुकूमत की जेलों में 9 साल रहे थे? इन नेताओं के बीच वैचारिक दूरी, अंतर्विरोध और अलग अलग रास्ते पर चलने की धुन को हम कब तक अपमान के फ्रेम में देखेंगे। इस हिसाब से तो उस दौर में हर कोई एक दूसरे का अपमान ही कर रहा था। राष्ट्रीय आंदोलन की यही खूबी थी कि अलग अलग विचारों वाले एक से एक कद्दावर नेता थे। ये खूबी गांधी की थी। उनके बनाए दौर की थी जिसके कारण कांग्रेस और कांग्रेस से बाहर नेताओं से भरा आकाश दिखाई देता था। गांधी को भी यह अवसर उनसे पहले के नेताओं और समाज सुधारकों ने उपलब्ध कराया था। मोदी के ही शब्दों में यह भगत सिंह का भी अपमान है कि उनकी सारी कुर्बानी को नेहरू के लिए रचे गए एक झूठ से जोड़ा जा रहा है। नेहरु तो भगत सिंह से मिलने गए थे , इसके सबूत हैं . अखबार की कतरनें हैं . किताबें हैं . जेल के पन्ने हैं लेकिन संघ से संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार भगत सिंह से मिलने गए थे क्या ? 1925 में संघ की स्थापना हो गई . 1929-1930 में भगत सिंह दो साल तक लाहौर जेल में रहे . हो सकता है इन दो सालों संघ प्रमुख भगत सिंह से कई बार मिले हों । किसी के पास ऐसी कोई जानकारी है तो बताएं कि कितनी बार और कब -कब संघ प्रमुख हेडगेवार उनसे मिलने गए थे ? संघ प्रमुख की तरफ से भगत सिंह को बचाने के लिए किन -किन शहरों में आंदोलन किया गया था ? लाहौर जेल से लौटने के बाद हेडगेवार ने भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए कहां शाखा लगाई थी ? आपके हिसाब से हो सकता है कि लाहौर सेंट्रल जेल में नेहरु और भगत सिंह की मुलाकात का इतिहास लिखने वाले सारे इतिहासकार ‘वामपंथी’ हों और उन्होंने इतिहास के साथ छेड़छाड़ की हो . हो सकता है कि नेहरु ने भी अपनी किताब में भगत सिंह के से अपनी मुलाकात के बारे में झूठ लिख दिया हो लेकिन 1929 के ट्रिब्यून अखबार के रिपोर्टर ने तो सच ही लिखा होगा। लाहौर जेल में बंद भगत सिंह और उनके साथियों के प्रति कांग्रेस नेताओं की बेरुखी की इमोशनल कथा बांचने से पहले मोदीजी इस बार ये कहकर डिस्क्लेमर लगा दिया था कि ‘अगर आपमें से किसी को जानकारी है तो जरुर बताना. मुझे नहीं है .मैंने जितना इतिहास पढ़ा है , मेरे ध्यान में नहीं आया. फिर भी आपमें से किसी को जानकारी हो तो मैं सुधार करने के लिए तैयार हूं। अब जिन्हें लाहौर जेल में बंद वीर भगत सिंह और उनके साथियों से नेहरु की मुलाकात की जानकारी थी , उन्होंने तो इतिहास और अखबार के पन्ने निकालकर खिदमत में पेश कर दिया है . नेहरु की लिखी किताब में भगत सिंह और उनके साथियों से मुलाकात का विस्तार से जिक्र तो है ही , उस समय के अखबार में खबर भी है . तो क्या पीएम मोदी अब अपने इतिहास ज्ञान को सुधारेंगे ? कहेंगे कि मैंने गलत इतिहास पढ़ लिया ?

शिल्पी सिंह

नरेन्द्र मोदी जी ने कभी कहा है कि उनके पिता पक्के कांग्रेसी थे और कांग्रेस ने उनके परिवार को सम्भाला था :

नरेन्द्र मोदी जी ने कभी कहा है कि उनके पिता पक्के कांग्रेसी थे और कांग्रेस ने उनके परिवार को सम्भाला था

एक हकिकत और सच्चाई शायद देश के प्रधान मन्त्री ने आज तक अपने मूंह से न कहा होगा कि उनके पिता स्व. दामोदरदास मोदी कांग्रेस के एक सक्रिय कार्यकर्ता और उनका कांग्रेस से वास्ता 1970 से 1980 तक रहा।

1973 मे जब गुजरात के वाडनगर के रेलवे स्टेशन का निर्माण हुआ तो नरेन्द्र मोदी के पिता का इन्दिरा गांधी के समीप होने के कारण उन्हे उक्त रेलवे स्टेशन के टी स्टाल का ठेका आसानी से मिल गया बाद मे कांग्रेस के साथ सक्रियता के कारण उनके दुसरे बेटे प्रहलाद मोदी को सस्ते गल्ले के दुकान का भी लाइसेन्स मिल गया था।

ठीक इसी ढंग से दामोदारदास मोदी ने कांग्रेस के साथ सक्रियता बनाते हुए वे अपने बडे पुत्र सोमा भाई और छोटे बेटे पंकज मोदी को गुजरात के प्रदेश सरकार की नौकरी दिलाने मे सफल रहे और ध्यान रहे कि उस समय इंदिरा गाँधी का बोल बाला चरम पर रहा I
क्या कारण रहा कि दामोदारदास मोदी ने नरेन्द्र मोदी के लिये कोई सिफारिस कांग्रेस से क्यों नही की, सुत्रो की माने तो दामोदारदास मोदी के साथ किन्ही कारणो से नरेन्द्र मोदी के साथ पटती नही थी I
अगर देखा जाये तो दामोदारदास मोदी के परिवार का भरण पोषण 1970-1980 के बीच इन्दिरा कांग्रेस के बदौलत हो पाई जब कि नरेन्द्र मोदी प्रधान मन्त्री बनने के बाद यह पूछते रहे कि कांग्रेस ने पिछले 60 वर्षो मे क्या किया, जब कि वे अपने को एक चाय वाला इन्ही कांग्रेस के देन के कारण कहते फिरते है, हालांकि पिता के साथ पटरी न खाने की वजह से नरेन्द्र मोदी ने कभी भी वाडनगर स्टेशन पर चाय नही बेची थी।

जो व्यक्ती अपनी शुरुवाती जीवन से ही अपने परिवार के किसी काम मे न आया हो और सारा जीवन अपने परिवार से दूरी बना के चला हो ऐसे व्यक्ती देश का भला क्या कर सकता है, सिवाय अपने भले को, आज जो बातो-बातो मे नरेन्द्र मोदी कांग्रेस को गाली देने का काम कर रहे है असल मे वो सब गाली अपने पिता को ही दे रहे है।

नोट : ऊपर दी गई सभी जानकारी www.dailyo.in से लिया गया है।

शिल्पी सिंह

मोदी प्रधानमंत्री सिर्फ चुनाव प्रचार और विदेश यात्रा के लिये ही बने हैं :

अब ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री का दो ही काम है एक चुनाव के लिए प्रचार करना और दूसरा विदेश यात्रा करना विदेश से आओ चुनाव का प्रचार करो चुनाव प्रचार खत्म करो विदेश जाओ बस यही दो काम नरेंद्र मोदी को आता है इसके अलावा उन्हें देश के किसी भी समस्याओं को लेकर कोई भी काम करने के लिए कोई दिलचस्पी नहीं है।

नरेंद्र मोदी ऐसे PM बन गए हैं जिनके बारे में देश ही नहीं बल्कि विश्व भर में यह कहा जाने लगा है कि यह PM सिर्फ विदेश यात्रा और भाजपा का चुनाव प्रचार के लिए ही है। कई लोग तो अब PM का मतलब प्रधानमंत्री के जगह प्रचार मंत्री कहते हैं। आखिर कोई PM इस तरह देश को अनेकों समस्याओं में छोड़कर विदेश यात्रा और प्रचार के लिए कैसे जा सकता है कई लोग इस पर टिप्पणी करते हैं कई जानकार लोग इसको लेकर सवाल उठाते हैं लेकिन भाजपा के द्वारा बनाई गई एक ट्रोल आर्मी जो सोशल मीडिया पर उन लोगों चरित्र हनन करती है उन लोगों को गाली गलौज देती है जो मोदी और मोदी सरकार के कामों पर सवाल उठाते हैं वो उनको गाली देकर, धमकी देकर या सरकारी संस्थानों से दबाब दिलवाकर चुप करवा देते हैं।

कर्नाटक चुनाव से पहले ही नरेंद्र मोदी 5 देशों की यात्रा से वापस आए थे वह यात्रा में उस समय थे जब देश महिला सुरक्षा को लेकर चिंतित था उत्तर प्रदेश से लेकर कश्मीर गुजरात से लेकर आसाम और बिहार से लेकर मध्य प्रदेश तक में हर तरफ छोटी-छोटी बच्चों के साथ बलात्कार की घटनाओं को लेकर पूरा देश चिंतित था और उस को लेकर प्रदर्शन कर रहा था तब हमारे प्रधानमंत्री विदेशों में भाषण दे रहे थे और वह लच्छेदार भाषण से लोगों को 2019 में वोट करने के लिए कह रहे थे देश के महापुरुषों को आपस में लड़ा रहे थे झूठा इतिहास बता रहे थे नेहरू को कोस रहे थे कांग्रेस के 70 सालों पर सवाल उठा रहे थे लेकिन वह एक बार भी महिला सुरक्षा को लेकर चिंतित देश के सवालों का जवाब देना मुनासिब नहीं समझ रहे थे और फिर कर्नाटक चुनाव में जिस तरह से उन्होंने बाकी कामों को छोड़ अपना पूरा समय प्रचार में दिया वह भाजपा का प्रचार मंत्री ही कर सकता है भारत का प्रधानमंत्री नहीं और और इस दौरान जिस तरह से उन्होंने शब्दों का उपयोग किया वह कहीं ना कहीं भारतीय प्रधानमंत्री पद के लिए शोभा नहीं देता है देश के पूर्व स्वर्गीय प्रधानमंत्री की पत्नी देश की सबसे पुरानी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और विपक्ष की सबसे बड़ी नेता पर बार-बार टिप्पणी करना देश के प्रमुख विपक्षी दल के अध्यक्ष प्रदेश के विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी पर बेवजह और बेतुका बयान बाजी करना और नेहरू जी को लेकर झूठ बोलना जिससे नेहरु जी का कोई संबंध नहीं रहा हो ऐसी बातों को करना देश के पूर्व सेना अध्यक्ष और सेना से जुड़े लोगों को लेकर झूठ बोलना और देश के सबसे बड़े वीर भगत सिंह को लेकर झूठ कह के लोगों को भड़काना ऐसा काम करना पीएम पद के व्यक्ति को शोभा नहीं देता है मगर शायद भूल गए हैं कि वह RSS के प्रचार मंत्री नहीं प्रधानमंत्री हैं।

अब कर्नाटक चुनाव प्रचार खत्म हो गया है 12 मई को वोटिंग होगी और 10 मई के रात के बाद प्रचार प्रसार के लिए अनुमति नहीं मिल सकती थी इसलिए उन्होंने अपना रास्ता कर्नाटक से सीधे एक नए देश की तरफ से अर्थात नेपाल की तरफ बढ़ा लिया है दिल्ली में देश के कामों का जायजा लेने के जगह वो विदेश निकल गए। लगातार रुपया का अवमूल्यन होना,पेट्रोलियम पदार्थ के महंगाई से देश का परेशान होना, युवाओं को रोजगार नहीं मिलना शिक्षा व्यवस्था में तरह तरह के घोटालों का सामने आना के बावजूद भी मंत्रालय से जुड़ी रिपोर्टों को देखने के बजाए नरेंद्र मोदी प्रचार के तुरंत बाद एक नए देश के भ्रमण के लिए निकल जाते हैं और सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें कर्नाटक चुनाव में नेपाल में प्रचार करने से फायदा हो सकता है और नेपाल से जुड़े हुए लोग कर्नाटक में अधिक रहते हैं और हर बार चुनाव में कोई न कोई कनेक्शन निकलता है भारत के पड़ोसी देश नेपाल गए हैं।

अब नेपाल में जुमलेबाजी कर जब Pm लौटेंगे तब या तो नई देश की यात्रा का प्लान बनायेंगे या फिर चुनाव अभियान में लग जायेंगे।

✍ शिल्पी सिंह

जुमलो की खुलती पोल से बौखलाए मोदी, राहुल पर कर रहे बेतुका हमला :

एक आदमी लाखों का सूट बूट पहनकर कहता है की मैं गरीब हूँ,और हम उसे गरीब मान लेते है। सीबीआई, एन आइ ए जैसी एजेंसियां जिस आदमी के हाथों की कठपुतली हैं वह आदमी कह रहा है की मुझे सताया जा रहा है। और हम मान लेते हैं जो संसद मे पूर्ण बहुमत मे है बीस से ज्यादा राज्यों मे सरकार है वह कहता है मुझे काम नही करने दिया जा रहा है
और हम मान लेते हैं। जो भ्रष्टाचार मे जेल मे रह चुके लोगों को टिकट देता है फिर कहता है मै भ्रषटाचार के खिलाफ लड़ रहा हूं। और हम मान लेते हैं जिसके शासन मे सबसे ज्यादा हमारे सैनिक शहीद हुए हैं वह कहता है दुश्मन हमसे कांप रहा है और हम मान लेते हैं। जिसके राज मे सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है और वह कहता है हमने किसानों की आय दुगुना कर दी है। और हम मान लेते हैं जो आदमी ग्रेजुएट युवाओं के पकौड़ा तलने को रोजगार कहता है और हम मान लेते हैं। जिसके राज्य मे सबसे ज्यादा बलात्कार हो रहे हैं और वह कहता है हम बेटी बचाव अभियान.चला रहे हैं और हम मान लेते हैं। जो सुंदर भविष्य का सपना दिखाकर सत्ता मे आया हो और चार सौ साल पहले के भूतकाल मे हमे घुमा रहा हो और हम उसकी बातों में फंस जाते हैं।

मोदीजी आप 15 मिनट भारतीय गणराज्य के प्रधान मंत्री की तरह बोल कर दिखाओ। जैसी सभ्य और शालीन भाषा में आपके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री बोला करते थे।
दरअसल आपके ये बचकाने चैलेंज उन गंभीर सवालों के जवाब हैं जो राहुल ने उठाए थे. राहुल गांधी ने कहा था कि मुझे 15 मिनट राफेल और नीरव पर बोलने दो तो प्रधानमंत्री सामने खड़े नहीं रह पाएंगे।
मगर आपने राफेल और नीरव को इग्नोर कर के 15 मिनट को पकड़ लिया। बैसे आपके भक्तों को आपकी यही अदा पसंद है। और आप भी जानते हो किन बेतुकी बातों पर भक्त ज्यादा तालियां बजाते हैं। अपने भक्तों की खुद से अपेक्षाओं को भगवन खूब समझते हैं। आपको पता है कि भक्तगण आपसे राहुल के सबालों का जबाब नहीं एंटरटेनमेंट चाहते हैं तो वही आप करते हैं।

राहुल गांधी कागज़ देखकर पढ़ते हैं या नहीं मुझे जानकारी नहीं है परन्तु मैं इतना कह सकती हूँ कि मोदीजी अगर आप कागज देख कर पढते तो भारत के प्रधानमंत्री के पद की गरिमा बनी रहती क्योंकि तब आप तक्षशिला को पाकिस्तान की जगह भारत में बताने से बच सकते थे, चंद्रगुप्त को मौर्य की जगह गुप्त वंश की वंशावली में जोड़ने से बच सकते थे ,श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इंग्लैंड में मरवाने की बेवकूफी से बच सकते थे , उनकी अस्थियां न लाने का इल्जाम नेहरूजी पर लगाने से बच सकते थे। आज़ादी के वक्त डॉलर और रुपये की वैल्यू एक बताकर लोगों को गुमराह करने से भी बच सकते हैं। भारतीय मतदाताओं की संख्या 600 करोड़ बताने से बच सकते थे। एक हफ्ते में 8 लाख 50 हजार शौचालय बनाने से बच सकते थे। और तो और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को मोहनलाल कहने से बच सकते थे।
खुद ही सोचिए मोदीजी, कागज़ में कुछ लिखकर लाने के कितने लाभ हैं!!
दरअसल जबसे गुजरात में 99 के फैरे में फंसे हैं तब से साहेब टेंशन में है ऊपर से गोरखपुर की हार ने हिला दिया है। मोदीजी अब हल्की फुल्की कॉमेडी करके भक्तों को बहलाए रखना ही आपके पास एकमात्र ऑप्शन है। सो करते रहिए।

मोदी जी,
कैसा भाषण है आपका ?
राहुल जी ऐसे है,वैसे है !
कॉंग्रेस ने यह किया,वो किया!
यह सब कहने के लिए 15 से 21
रैलियाँ बढ़ाईं ?
अपने MLAs के बारे मे भी कुछ कहो जो सब बलात्कारी,भ्रष्टाचारी है!
कभी अपनी भी कुछ उपलब्धियाँ गिनवाओ ?
विपक्ष की बुराइयाँ गिनवाने को ही आप भाषण कहते है ? आइए मोदी जी के डिजिटल इंडिया में घूमते हैं, जगह जगह देखते हैं!
बच्चे भुखमरी से परेशान हैं!
युवा रोजगार के लिए तड़प रहा है!
किसान भाव के लिए आत्महत्या कर रहा है!
मध्यमवर्गीय प्राणी का जीवन यापन दुर्लभ हो गया है!
दलित रोजाना मारा जा रहा है!
छोटा दुकानदार सबसे ज्यादा परेशान हैं! सरकार चलाने के लिये दिमाग चाहिये होता है, मुँह नही और मोदी जी के पास दिमाग हे नही सिर्फ़ मुँह है ! कोई शक ??

मोदी जी तो अब मर्यादाओं की सारी सीमाएं लांघने पर आमादा हैं.।
और तो और, अब तो वो सड़क छाप गुंडों की तरह उस कांग्रेस को धमकी देने पर आमादा हो गया जिसकी शालीनता के आगे अंग्रेज हमारे गुलाम देश को आज़ाद कर हिंदुस्तान से ही भागने पर मजबूर हुए।
होश में आइये मोदीजी, “कांग्रेस और कांग्रेसियों को धमकाना बंद करिये, जिनके पूर्वज अंग्रेजों के आगे मिमिया चुके हो आज उसका वंशज कांग्रेस को धमका रहा हैं ये बड़ी शर्म की बात हैं।

मोदी कहते है कि देश में सबसे ज्यादा युवा है लेकिन वो ये कभी नहीं कहते की सबसे ज्यादा युवा बेरोजगार हमारे देश में हीं है! जबरदस्ती कब तक कहलवाओगे अच्छे दिन का जुमला मोदीजी ..देश की जनता आप के जुमलो को समझ गयी ..भाजपा का असली चेहरा और नीयत दोनो को पहचान गयी अच्छे दिन कहाँ है।
मित्रों,
कर्नाटक में धुँआधार चुनाव प्रचार के दौरान…
क्या नरेन्द्र मोदी ने एक बार भी पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों का ज़िक्र किया?
नहीं…!
क्या मोदी ने एक बार भी ‘नोटबंदी’ और ‘जीएसटी’ का ज़िक्र किया?
नहीं…!
क्या एक बार भी हरेक को 15-15 लाख रुपये देने की बात की?
नहीं…!
क्या एक बार भी बताया कि चार साल में कितना काला धन वापस आ चुका है?
नहीं!
क्या एक बार भी बताया कि सालाना दो करोड़ रोज़गार का क्या हुआ?
नहीं…!
क्या एक बार भी बताया कि उनकी नीतियों की वजह से अर्थव्यवस्था का सत्यानाश हो चुका है?
नहीं…!

क्यों कुछ भी नहीं बताया भाई? इन सभी मोर्चों पर तो आपकी सरकार ने शानदार उपलब्धियाँ हासिल की हैं! फिर मुँह से बोल क्यों नहीं फूटे!
अरे, आपका तो सारा ध्यान ही राहुल गाँधी का चरित्रहनन करके उनका प्रचार करने पर था! क्या जनता ने आपको सिर्फ़ राहुल गाँधी के बारे में बात करने के लिए सत्ता तक पहुँचाया था? अंग्रेजो की गुलामी करने वालो संघियो तुम लोगो को सड़क पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटना चाहिए।
नफरत तुम लोग फैलातें हो और भुगतना बेचारे गरीबो को पड़ता है,जो राजनीति से कोसों दूर होते है।राष्ट्र निर्माण नही तुम लोग राष्ट्र को खतरे में डाल रहे है।तुम सब अंग्रेजो के वफादार कुत्ते थे,और रहोगे।

✍ शिल्पी सिंह

राहुल ने कहा, मेरी माँ ने इटली से आकर भारतीयता को अपनाया है,भरतीय होने पर गर्व करती है :

राहुल गाँधी ने आज कहा मैं नरेंद्र मोदी की तरह नहीं हूं जिन्होंने 4 साल में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। मोदी की तरह मैं पत्रकारों के सवालों से डरता नहीं हूँ।

कर्नाटक में 224 सदस्यों वाली विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं। 12 मई को मतदान होगा, जबकि 15 मई को नतीजे आएंगे। गुरुवार शाम के बाद यहां चुनाव प्रचार थम जाएगा। ऐसे में प्रचार के अंतिम दिन राहुल बेंगलुरू में प्रेस कॉन्फेंस कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि पीएम ने कर्नाटक के लिए कुछ भी नहीं किया। राहुल गांधी ने कर्नाटक बीजेपी के द्वारा उनकी मां और पूर्व कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को उनके इटली वाले नाम से पुकारे जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा को करारा जवाब दिया है। मंगलवार (8 मई) को बीजेपी कर्नाटक के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से सोनिया गांधी को ‘मिस एंटोनियो माइनो’ लिखकर संबोधित किया गया था। ट्वीट में लिखा गया था कि आज मिस एंटोनियो माइनो यहां कर्नाटक में आखिरी किला बचाने के लिए हैं। मैडम माइनो, कर्नाटक को ऐसे शख्स से सीखने की जरूर नहीं है जो देश के 10 कीमती वर्ष बर्बाद करने के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार है। इस पर राहुल गांधी ने कहा-

मेरी मां इटैलियन हैं, उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा भारत में भी जिया है। मैं देखता हूं कि वह कई भारतीयों से ज्यादा भारतीय हैं। मेरी मां ने इस देश के लिए बलिदान दिया है, वह इसकी पीड़ा से गुजरी हैं। यह प्रधानमंत्री की क्वॉलिटी बताता है जब वह इस तरह की टिप्पणियां करते हैं।”

राहुल गांधी ने बेंगलुरु में पत्रकारों से बात करते हुए बीजेपी और पीएम मोदी पर और भी हमले बोले। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री वही बोलते हैं जो उनके दिल में होता है। बेशक वह अब आश्वस्त हैं और वह सही हैं कि वह कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और 2019 हारने जा रहे हैं।

राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि मोदी अपने अंदर से गुस्सा हैं। वह उनसे ही नहीं, सबसे गुस्सा हैं। उन्हें कहा कि यह उनकी समस्या नहीं है।कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला है। उन्होंने कहा है, “पीएम देश में दलितों का मुद्दा नहीं उठा रहे हैं। वह इसके बजाय हमारी (कांग्रेस की) बात कर रहे हैं। लेकिन हम तो दलितों की ही बात करेंगे।” उन्होंने इस पर जवाब दिया, “पीएम मोदी ने मुद्दा भटकाने की कोशिश हर बार करते है।” ऐसे में प्रचार के अंतिम दिन राहुल बेंगलुरू में प्रेस कॉन्फेंस कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पीएम ने कर्नाटक के लिए कुछ भी नहीं किया। वह भ्रष्टाचार की बात करते हैं, जबकि येदियुरप्पा भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जा चुके हैं। रेड्डी बंधुओं ने यहां के लोगों का खूब पैसा लूटा है।

राहुल बोले, “पीएम मुद्दा भटका रहे हैं। राहुल यहीं नहीं रुके। वह बोले, “बीजेपी हिंदू का मतलब नहीं जानती। मैं मंदिर-मस्जिद जाता रहा हूं। वह हिंदू शब्द से वाकिफ नहीं है, इसलिए मुझे चुनावी हिंदू कहती है।

पीएम चीन गए लेकिन डोकलाम पर एक लफ्ज नहीं बोले। वह बिना एजेंडा के वहां गए थे, जबकि असल एजेंडा डोकलाम था। उनके मुताबिक, वह आगे बोले निजी हमले करके बीजेपी ने दिखा दिया कि उनमें गंभीरता नहीं है।

राहुल गांधी ने पत्रकारों से सवाल किया क्या प्रधानमंत्री का निजी हमले करना ठीक है? ये चुनाव मेरे पीएम बनने के लिए नहीं है। बीजेपी 2019 का चुनाव हार जाएगी। कर्नाटक में कांग्रेस ही बाजी मारेगी। ये कर्नाटक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा के बीच की जंग है। असलियत है कि वे बुरी तरह से घबरा चुके हैं और उन्हें अपनी हार का अहसास हो गया है।

पीएम ने कहा था- मातृ भाषा में कर्नाटक की उपलब्धि बताएं बता दें कि एक रैली के दौरान प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी से कहा था कि वो बिना कागज देखे 15 मिनट कर्नाटक सरकार की उपलब्धियां बताएं. वो चाहें तो अपनी मातृभाषा में भी बोल सकते हैं। राहुल गांधी,ने बोला कि ‘मोदी जी में भी गुस्सा है, हर किसी के लिए गुस्सा है. वो मुझे चुनौती के तौर पर देखते हैं इसलिए मुझ पर ज्यादा गुस्सा करते हैं।उनका गुस्सा उनकी अपनी समस्या है, वो मेरी समस्या नहीं है. मेरी समस्या है कि कैसे इस देश के लोगों के लिए काम किया जाए।

राहुल ने कहा बीजेपी में गंभीरता नहीं है।

राहुल गांधी ने कहा, ”मुझे पर, सिद्धारमैया जी पर और खड़गे जी पर निजी हमले करके बीजेपी ने दिखा दिया है कि कर्नाटक के लिए उनमें गंभीरता नहीं है. वीरप्पा मोइली जी ने पूरे राज्य में घूमकर कांग्रेस का घोषणापत्र तैयार किया वहीं बीजेपी ने बंद कमरे में घोषणापत्र बनाया और आधा हमारा कॉपी कर लिया.

राहुल ने कहा मुझे पूरा विश्वास है कि कांग्रेस इस चुनाव को जीतने जा रही है। राहुल ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अत्याचार निश्चित तौर पर राजनीतिक मुद्दा है।क्या देश की महिलाओं से बलात्कार होता रहे और वो चाहते हैं कि राजनीतिक दल इस पर चुप रहें?

ध्यान रहे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि रेप जैसे मसलों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। राहुल गांधी ने कहा कि रेड्डी ब्रदर्स ने 35000 रुपये कर्नाटक की जनता से चोरी किये हैं. एक तरफ ईमानदार सिद्धारमैया जी हैं और दूसरी तरफ जेल से निकले हुए लोग हैं। जहाँ तक मेरा मानना है कि यह तो जनता को अहसास करना चाहिए।देश के लिए मर मिटनेवाले गांधी परिवार से देशभक्ति का सबूत मागा जा रहा है। राहुल गाँधी ने बेंगलुरु में सिद्धारमैया और कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ प्रेस कांफ्रेंस की. कांफ्रेस में उन्होनें भाजपा पर मैनिफेस्टो की नक़ल करने जैसे कई संगीन आरोप लगाए हैं।

साथ ही में राहुल ने प्रधानमंत्री पर चुटकी लेते हुए ट्वीट किया ‘माफ कीजिएगा, समय की कमी के चलते प्रेस कॉन्फ्रेंस में हर किसी को सवाल पूछने का मौका नहीं मिला। लेकिन मैं पीएम मोदी की तरह नहीं हूं जिन्होंने चार साल में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। मैं ऐसे प्रेस कॉन्फ्रेंस करता रहूंगा’

✍ शिल्पी सिंह

Lestest News