
अक्सर बीजेपी को देखते हैं कि वो कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रहती है लेकिन उन आरोपो को न्यायपालिका ने कई बार खारिज कर दिया है लेकिन अब बीजेपी के भ्रष्टाचार की पोल खुलने लगी है जिससे बीजेपी बैकफुट पर जाती नजर आ रही है बीजेपी के शासन में आम आदमी के पैसो को उद्योगपतियो को दे दिया जाता है ऐसा विपक्ष कही बार आरोप भी लगा चुका है लेकिन अब धीरे धीरे उसकी परते पर जनता के समकक्ष आने लगी हैं
हरियाणा में 21 अक्टूबर को चुनाव है ऐसे मे खट्टर सरकार के खिलाफ लगातार आक्रोश जनता में बढ रहा है वही उनके कार्यकाल में हुए घोटालो की परते भी खुलने लगी हैं
भले ही इस चुनाव में मुख्यमंत्री मनोहर लाल पारदर्शी सरकार का दावा इस सरकार के दौरान करीब आधा दर्जन घोटाले ऐसे हैं, जिनमें हजारों करोड़ का गोलमाल हुआ है। इनके तार कई बड़े लोगों से जुड़ते हैं लेकिन फिलहाल चंद छोटे अधिकारियों-कर्मचारियों पर गाज गिराकर सरकार अपनी पीठ ठोक रही है। पांच साल के कार्यकाल पर नजर डालें, तो कई झोल खुलकर सामने आते हैं।
- प्राइवेट बसों के टेंडर में घोटाला
खट्टर सरकार में 510 बसों के टेंडर 37 से 41 रुपये प्रति किलोमीटर के रेट से किए गए जबकि बाद में 190 बसों के टेंडर हुए तो 21-22 रुपये प्रति किलोमीटर के रेट सामने आए। रेट में इतना ज्यादा अंतर होने से बात पकड़ी गई। जांच विजिलेंस को सौंप दी गई। साथ ही मामला हाईकोर्ट भी चला गया। विजिलेंस ने बस ऑपरेटरों से बात करने की जिम्मेदारी निभाने वाली चार सदस्यीय निगोशिएशन कमेटी को पूरे मामले के लिए दोषी ठहरा दिया।
सवाल यह है कि जब फाइनेंस और टेक्निकल कमेटी भी इस टेंडर प्रक्रिया में शामिल थी तो वह कैसे साफ बच कर निकल गईं। फिर रेट अप्रूवल के लिए फाइल परिवहन मंत्रालय के साथ मुख्यमंत्री ऑफिस तक गई लेकिन वहां आंच किसी पर नहीं आई। परिवहन विभाग के निदेशक से लेकर मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव और परिवहन मंत्री तक कर्मचारियों की बैठकों में कहते रहे कि कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। जिन दो महकमों- परिवहन विभाग और हाउसिंग बोर्ड के अफसरों पर घोटाले में शामिल होने के आरोप हैं, वे दोनों ही कैबिनेट मिनिस्टर कृष्णलाल पंवार के पास हैं। सवाल पूछने पर पंवार यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि विजिलेंस जांच में जो दोषी मिले, उन पर कार्रवाई की गई है।
इस मामले में खामी हर स्तर पर हुई। नियमानुसार 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की खरीद-फरोख्त के मामले वित्तमंत्री की अध्यक्षता में बनी हाई पावर परचेज कमेटी में जाते हैं, लेकिन यह मामला वहां गया ही नहीं। बड़े बस ऑपरेटरों ने लाखों रुपये देकर कम रेट वालों को टेंडर वापस लेने के लिए मना लिया और खुद ऊंचे रेट भरकर कॉन्ट्रैक्ट ले लिया। यह स्कीम यदि सिरे चढ़ जाती तो 10 साल के एग्रीमेंट के मुताबिक सरकार को तकरीबन एक हजार करोड़ की चपत लगती।
शक इसलिए और गहरा होता है कि जिन ऑपरेटरों पर केस दर्ज हुआ, उनमें एक मंत्री के करीबी पानीपत की पॉल ट्रेवल लाइंस के प्रोपराइटर प्रीतपाल सिंह और जश्गून ट्रेवल्स के प्रोपराइटर नैंसी शामिल हैं। यमुनानगर के लिए 15 बसों के टेंडर में इन दोनों ने 5-5 बसों के लिए टेंडर एक ही कंप्यूटर और एक रेट 36.60 रुपये में भरे थे। इस पर जब परिवहन मंत्री से सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि मित्रता किसी के साथ भी हो सकती है। स्थानीय होने के नाते पॉल ट्रैवल्स से जान-पहचान होना अलग बात है। खुद सीएम ने मीडिया के सामने यह स्वीकार किया- हां, गड़बड़ी हुई है। सीएम ने कहा कि 510 बसों के टेंडर रद्द कर दिए हैं। सरकार ने हाईकोर्ट में सौंपी रिपोर्ट में भी गड़बड़ी की बात मानी है।
- पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप घोटाला
स्कॉलरशिप सहायता योजना में सोनीपत- रोहतक-झज्जर में 26 करोड़ का घोटाला सामने आया। इसका खुलासा भी विजिलेंस जांच में हुआ। अनुसूचित जाति एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग में यह सारा गोलमाल चल रहा था। अनुसूचित जाति एवं पिछड़ा वर्ग के पोस्ट मैट्रिक, यानी 10वीं से ऊपर के विद्यार्थियों की हायर एजुकेशन के लिए केंद्र की ओर से दी जाने वाली स्कॉलरशिप में इन तीन जिलों में तीन साल में 26 करोड़ का घोटाला हो गया। घोटाले में 11 अधिकारियों-कर्मचारियों और 4 प्राइवेट लोगों के नाम सामने आए। रोहतक विजिलेंस थाने में एफआईआर भी दर्ज की गई।
विजिलेंस की इस जांच से पहले हुई विभागीय जांच में करीब 18 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आ चुका था। इसमें फर्जी आधार नंबर और नाम भेजकर स्कॉलरशिप के नाम पर बड़ा खेल खेला जा रहा था। विद्यार्थियों के नाम स्कॉलरशिप लेने वाले 485 शिक्षण संस्थान फर्जी निकले। इस पूरे खेल में विभाग के डिप्टी डायरेक्टर से लेकर डाटा एंट्री ऑपरेटर तक शामिल थे। इसके बाद यमुनानगर और पंचकूला में भी 88 लाख का घोटाला सामने आ गया। इसमें भी अनुसूचित जाति एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के एक डिप्टी डायरेक्टर समेत चार कर्मचारियों के अलावा सात प्राइवेट लोग शामिल पाए गए।
- बिजली निगम घोटाला
यहां 112 करोड़ 99 लाख रुपये का मीटर खरीद घोटाला सामने आया। विजिलेंस जांच में चीफ इंजीनियर और तीन एसई समेत सात अधिकारियों को दोषी माना गया। बिजली निगम की एमएम विंग ने साल 2014-15 में दो कंपनियों से सिंगल फेज मीटर खरीदे थे, जिसमें यह गड़बड़ी मिली।
- वाहनों का ओवरलोडिंग घोटाला
साल 2014 में बीजेपी सरकार बनते ही 2015 में सरकार ने पहाड़ों में खनन की इजाजत दे दी थी। खनन कार्य शुरू होते ही महीना लेकर ओवरलोडेड वाहन निकालने के गिरोह सक्रिय हो गए। इसके तहत हजारों करोड़ रुपये की वसूली बताई जा रही है जिसके तार भी कई बड़े लोगों से जुड़तेहैं। विधानसभा में इस पर चर्चा की मांग उठी लेकिन सरकार नेचर्चा नहीं होने दी।
- जीएसटी घोटाला
फर्जी बिलों के जरिये हुआ जीएसटी घोटाला हजारों करोड़ का है। हरियाणा व्यापार मंडल की मानें तो फर्जी सी-फाॅर्म की जानकारी के अनुसार 21 हजार 693 सी-फाॅर्म रद्द हुए जिसमें 6,500 करोड़ का चूना राज्य को लगा। राज्य भर में 65 केस दर्ज हुए जिनमें 26 पानीपत के विभिन्न थानों में दर्ज हैं। ये आंकड़े जून तक के हैं।
- दवा घोटाला
खट्टर सरकार में सरकारी अस्पतालों के लिए दवा खरीद में भी 200-300 करोड़ के घोटाले का आरोप सामने आया। हालांकि, स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने इससे इनकार किया। आरटीआई में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (हरियाणा) के निदेशक से मिली सूचना के आधार पर दावा किया गया कि सरकारी अस्पतालों में 808 करोड़ की दवाएं और उपकरण खरीदे गए, जबकि इस अवधि में एनएचएम का बजट 1,400 करोड़ रुपये का था।