Saturday, August 15, 2026
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Madhya Pradesh Assembly Election 2023 Result: चुनावी नतीजे के बाद मध्य प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री कौन?

madhya pradesh assembly election 2023

चार राज्यों के चुनावी नतीजे 3 दिसंबर को सामने आ जाएंगे. तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने जीत के दावे कर रहे हैं. वहीं पिछले दिनों एग्जिट पोल में देखा गया कि कोई भी तस्वीर साफ नजर नहीं आई. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh Assembly Election 2023 Result) में जहां कांग्रेस कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनाने के दावे कर रहे हैं वहीं बीजेपी के नेता भी इसको लेकर अपनी बात रख रहे हैं.

बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कई सवालों के जवाब दिए. आपको बता दें कि कैलाश विजयवर्गीय को भी इस बार बीजेपी नेतृत्व ने चुनाव मैदान में उतारा है हालांकि उनकी टक्कर कांग्रेस के संजय शुक्ला के साथ है और कैलाश विजयवर्गीय भी आज आसानी से जीतते नजर नहीं आ रहा है.

मीडिया ने कैलाश विजयवर्गीय से कई तरह के सवाल किए, जिसमें एक सवाल अहम था कि क्या केंद्रीय नेतृत्व एक बार फिर से शिवराज सिंह चौहान को मौका देगा या फिर उनसे नाराज है?

कैलाश विजयवर्गीय ने जवाब देते हुए कहा है कि उनका नेतृत्व फैसला करेगा कि मध्य प्रदेश में सरकार बनाने की स्थिति में अगर उनकी पार्टी आती है तो मुख्यमंत्री कौन होगा. उन्होंने कहा कि यहां हर कोई कार्यकर्ता है तथा शिवराज सिंह चौहान से नेतृत्व के नाराजगी के सवाल पर उन्होंने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है, यह सिर्फ कहानी है नेतृत्व के पास किसी से नाराज होने का समय नहीं है.

आपको बता दें कि तीन दिसंबर को मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के भी नतीजे आ जाएंगे. कमलनाथ मध्य प्रदेश में अगली सरकार कांग्रेस की बनने के दावे कर रहे हैं तो वहीं बीजेपी एक बार फिर से सत्ता पर काबिज होने के लिए बेकरार नजर आ रही है.

हालांकि सरकार किसकी बनती है यह तो नतीजे के बाद ही साफ होगा.

Abhisar Sharma को लंबी पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया

Abhisar Sharma

दिल्ली पुलिस ने मंगलवार तड़के कई पत्रकारों (Abhisar Sharma And Other) के घरों पर छापे मारे. रिपोर्ट के अनुसार यह कार्यवाही न्यूज क्लिक (News Click) से जुड़े पत्रकारों के घर पर हुई. दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल द्वारा समाचार पोर्टल के खिलाफ सख्त गैर कानूनी गतिविधियां अधिनियम UAPA के तहत एक नया मामला दर्ज किया गया है.

चीन से धन प्राप्त करने के आरोपी के बीच यह दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा और प्रवर्तन निदेशालय की जांच के दायरे में है. 30 से अधिक जगहों पर ऐसी कार्यवाही हुई. पत्रकार अभिसार शर्मा और भाषा सिंह ने अपने-अपने घरों पर दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई की पुष्टि की थी.

हाल ही में कई रिपोर्टें आई थी जिसमें यह दावा किया गया था की न्यूज़ पोर्टल को चीन से फंडिंग मिलती है. हालांकि अभी इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन जिस तरह न्यूज़ पोर्टल से जुड़े पत्रकारों के घर पर छापे मारे गए हैं उसको लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें हो रही है. कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं और इसको स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला बता रहे हैं, वहीं कुछ लोग इस कार्रवाई का समर्थन भी कर रहे हैं.

कुछ लोगों का मानना है कि वह आवाज़ें जो अभी भी अपने यूट्यूब चैनलों के माध्यम से या फिर अपने न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से सरकार से सवाल पूछ रही है, जनता से जुड़े हुए मुद्दों पर आवाज उठा रही हैं, उन आवाजों को कहीं ना कहीं दबाने की कोशिश हो रही है. अभिसार शर्मा जैसे पत्रकारों को निशाने पर इसीलिए लिया जा रहा है ताकि इन्हें डराया धमकाया जा सके.

इसके ठीक विपरीत कुछ लोगों का मानना है कि यह पत्रकारिता पर हमला बिल्कुल भी नहीं है. क्योंकि पिछले दिनों विपक्ष के गठबंधन द्वारा कुछ पत्रकारों के बहिष्कार की बात की गई थी उस वक्त अभिसार शर्मा तथा इनके जैसे तमाम पत्रकारों ने उस बहिष्कार का समर्थन किया था श, इसलिए पूछताछ का समर्थन कर रहे हैं लोगों का कहना है कि जब विपक्ष ने बहिष्कार किया उस वक्त वह पत्रकारिता पर हमला नहीं था तो फिर फंडिंग की जांच के लिए पूछताछ हो रही है इसको पत्रकारिता पर हमले से क्यों जोड़ा जा रहा है या फिर लोकतंत्र से क्यों जोड़ा जा रहा है?

हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अगर आरोप लगे हैं तो बिल्कुल जांच होनी चाहिए, पूछताछ होनी चाहिए. लेकिन न्यूज क्लिक के मालिकों से पूछताछ होनी चाहिए ना कि उससे जुड़े हुए पत्रकारों से पूछताछ होनी चाहिए.

वही जिन जिन एंकरों और पत्रकारों को सरकार समर्थक माना जाता है उन एंकरों और पत्रकारों ने अभिसार शर्मा तथा अन्य पत्रकारों से पूछताछ का समर्थन किया है. सोशल मीडिया के जरिए कहीं ना कहीं वह यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि अभिसार शर्मा तथा बाकी लोगों ने चीन से फंडिंग लेकर सरकार का विरोध किया है.

इनका कहना है कि मोदी विरोध तक तो ठीक है लेकिन मोदी का विरोध करते-करते अभिसार शर्मा जैसे पत्रकार देश का विरोध कर रहे हैं? अभी किसी तरह की जांच पूरी हुई नहीं है. पुलिस की तरफ से अभिसार शर्मा तथा बाकी के पत्रकारों को लेकर कोई बयान नहीं दिया गया है. लेकिन सरकार का समर्थन करने वाले एंकर और पत्रकार सरकार के समर्थकों और कार्यकर्ताओं को यह बताने की कोशिश सोशल मीडिया के जरिए कर रहे हैं कि अभिसार शर्मा तथा बाकी लोगों ने चीन से फंडिंग ली है.

लगातार साथ छोड़ रहे हैं Scindia के साथी

scindia

मध्य प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों ने तैयारी शुरू कर दी हैं. इस चुनाव का अहम चेहरा केंद्रीय मंत्री सिंधिया (Scindia) भी होंगे, लेकिन फिलहाल उनके लिए सब कुछ ठीक नहीं दिखाई दे रहा है. बताया जा रहा है कि सिंधिया के लिए यह चुनाव काफी मुश्किल होने वाला है. इसके पीछे की वजह बताई जा रही है उनके सहयोगियों का साथ छोड़कर वापस कांग्रेस में जाना.

समंदर पटेल के बाद पिछले दिनों सिंधिया के सहयोगी प्रमोद टंडन वापस कांग्रेस में शामिल हो गए. प्रमोद टंडन को रामकिशोर शुक्ला और दिनेश मल्हार के साथ इंदौर में पार्टी की राज्य इकाई के प्रमुख कमलनाथ ने औपचारिक रूप से कांग्रेस में फिर से शामिल करवाया.

प्रमोद टंडन तब बीजेपी में शामिल हुए थे जब सिंधिया और उनके करीबी कई कांग्रेस विधायक मार्च 2020 में पार्टी बीजेपी में शामिल हो गए थे. प्रमोद टंडन सिंधिया के काफी करीबी माने जाते हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वह ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनसे पहले उनके पिता स्वर्गीय माधव राव सिंधिया के कट्टर समर्थक और वफादार थे.

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर दिखाए जाने वाले तमाम सर्वे में कांग्रेस बीजेपी पर बढ़त बनाती हुई नजर आ रही है. ग्वालियर चंबल को लेकर भी जो सर्व आ रहे हैं उसमें कांग्रेस बीजेपी पर भारी नजर आ रही है और यह सिंधिया के लिए किसी झटके से काम नहीं है, क्योंकि सिंधिया भी इसी क्षेत्र से आते हैं और अगर यहां पर विधानसभा चुनाव में बीजेपी हारती है तो यह सिंधिया के लिए बहुत बड़ा झटका होगा.

आज बेंगलुरु में 26 दलों के बैठक में गठबंधन के नाम, नेता और संयोजक के नामों का हो सकता है ऐलान 

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में जारी विपक्ष की दो दिवसीय बैठक का मंगलवार को दूसरा दिन है। इसी बीच संभावनाएं जताई जा रही हैं कि UPA की अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी को विपक्षी मोर्चे का भी प्रमुख बनाया जा सकता है।

खबर है कि सोमवार को इस संभावित गठबंधन के नाम को लेकर भी चर्चाएं हुईं। कुल 26 दल बैठक में शामिल हुए थे।एक मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि सोनिया गांधी को विपक्षी दलों का प्रमुख बनाया जा सकता है। वहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार संयोजक की भूमिका में नजर आ सकते हैं।

सोमवार को दलों के नेता रात्रि भोज में शामिल हुए, जहां मंगलवार की बैठक का एजेंडा तय किया गया। दूसरे दौर की बैठक सुबह 11 बजे से शुरू होकर शाम 4 बजे तक जारी रहेगी।

कहा जा रहा है कि चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने गठबंधन के नाम को लेकर भी मंथन किया। इस दौरान सभी पार्टियों ने सुझाव दिया कि नाम में ‘भारत’ शब्द होना चाहिए। साथ ही न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर भी चर्चा की गई है। खबर है कि मीटिंग में शामिल होने वाले विपक्षी दल सीटों पर साझा उम्मीदवार उतारने की बात पर भी सहमत हो गए हैं। बेंगलुरु के ताज वेस्ट एंड होटल में आयोजित भोज में कांग्रेस की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी साथ बैठकर बातचीत करती नजर आईं। खबर है कि दोनों की मुलाकात के चलते विपक्षी दलों की बैठक भी 20 मिनट की देरी से शुरू हुई। खास बात है कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के रिश्तों में बीते कुछ समय से तनाव है। इसकी बड़ी वजह पश्चिम बंगाल की राजनीति को माना जाता है। दोनों ही दल एक-दूसरे पर लगातार निशाना साधते रहे हैं।

कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, बिहार के मुख्यमंत्री एवं जनता दल (यू) के शीर्ष नेता नीतीश कुमार, द्रमुक नेता एवं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे शामिल रहे।साथ ही झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता एवं झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, आम आदमी पार्टी के नेता एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और कुछ अन्य नेता इस बैठक में शामिल हैं। इस बीच, एनसीपी के मुख्य प्रवक्ता महेश तपासे ने मुंबई में बताया कि पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार मंगलवार को बेंगलुरु में विपक्षी दलों की बैठक का हिस्सा बनेंगे।

 

कर्नाटक में सिद्धारमैया का शपथ ग्रहण आज, डिप्टी CM बनेंगे शिवकुमार, 28 मंत्री ले सकते हैं शपथ, विपक्षी एकता पर नजर

कांग्रेस अब शनिवार को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डी के शिवकुमार के साथ 28 लोगों को मंत्री पद की शपथ दिलाकर राज्य मंत्रिमंडल के गठन में देरी से बचने के लिए फुर्ती दिखाने की कोशिश कर रही है. मनोनीत मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद शनिवार को शपथ लेने वाले मंत्रियों की सूची को अंतिम रूप देने के लिए शुक्रवार को दिल्ली वापस लौटे. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव के सी वेणुगोपाल ने कहा था कि मंत्रियों के एक समूह के साथ सीएम और डिप्टी सीएम शपथ लेंगे.

कांग्रेस के सूत्रों ने कहा कि सीएम और डिप्टी सीएम के साथ 28 मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है. पार्टी अब सरकार गठन में देरी नहीं करना चाहती है. लिस्ट को अंतिम रूप दिया जा रहा है और आलाकमान से इसे मंजूरी दी जाएगी. बाद में शामिल करने के लिए लगभग चार कैबिनेट मंत्री पद खाली रखे जा सकते हैं. कांग्रेस ने गुरुवार को सिद्धरमैया को कर्नाटक का अगला मुख्यमंत्री नामित किया और सीएम पद के प्रबल दावेदार पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी. इसके बाद सिद्धरमैया ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश किया.

सिद्धरमैया और शिवकुमार आज दोपहर साढ़े 12 बजे अपने-अपने पद की शपथ लेंगे. सिद्धरमैया दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. कर्नाटक के चुनाव नतीजों की घोषणा के एक दिन बाद 14 मई को सीएलपी की बैठक हुई थी जिस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को नए मुख्यमंत्री का फैसला करने के लिए अधिकृत करते हुए एक पंक्ति का प्रस्ताव पारित किया गया था. उस दिन आए तीन केंद्रीय पर्यवेक्षकों ने भी विधायकों की राय ली थी, जिसे उन्होंने खड़गे के साथ साझा किया था. राज्य की 224 सदस्यीय विधानसभा के लिए 10 मई को हुए चुनावों में कांग्रेस ने 135 सीट जीतकर शानदार जीत हासिल की. जबकि सत्तारूढ़ भाजपा और पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा के नेतृत्व वाले जनता दल (सेक्युलर) ने क्रमशः 66 और 19 सीट हासिल की.

 

इससे पहले कांग्रेस ने कई दिनों की मैराथन बैठकों और गहन मंथन के बाद ऐलान किया कि कर्नाटक की सत्ता का ताज सिद्धरमैया के सिर पर सजेगा और प्रदेश पार्टी अध्यक्ष डी. के. शिवकुमार नई सरकार में उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालेंगे. कई दिनों तक चली अनिश्चितता पर विराम लगाते हुए पार्टी के संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने यह घोषणा की. उन्होंने कहा कि शिवकुमार नयी सरकार में एकमात्र उपमुख्यमंत्री होने के साथ अगले लोकसभा चुनाव तक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर भी बने रहेंगे. सिद्धरमैया और शिवकुमार को कर्नाटक में कांग्रेस के लिए बड़ी ‘पूंजी’ बताते हुए उन्होंने कहा कि दोनों की जोड़ी का विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत में महत्वपूर्ण योगदान रहा।

 

किसके नाम पर तैयार हुआ कांग्रेस आलाकमान?

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कर्नाटक का विधानसभा चुनाव कांग्रेस प्रचंड बहुमत के साथ जीतने में कामयाब हो गई. संघ तथा बीजेपी को इस बात का बिल्कुल भी अनुमान नहीं था कि उनकी कर्नाटक में इतनी बुरी हार होगी. प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों और रोड शो से भी बीजेपी को कर्नाटक में कोई फायदा नहीं मिला और कांग्रेस के सामने बीजेपी को बुरी हार झेलनी पड़ी.

अब कर्नाटक में मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान होना है. कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया में से कोई एक कर्नाटक के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाला है. मीडिया में दोनों को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. डीके शिवकुमार कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष थे और उनके नेतृत्व में कांग्रेस को इतनी बड़ी जीत मिली है, जिसमें तमाम कांग्रेस के नेताओं की मेहनत भी शामिल है.

मीडिया में सूत्रों के हवाले से खबर फैलाई जा रही है कि सीबीआई और ईडी के शिकंजे से बचने के लिए या फिर आगे चलकर कोई विवाद जन्म ना ले कॉन्ग्रेस पार्टी इस चीज से बच रही है और इसी कारण डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री शायद ना बनाया जाए.

हालांकि मीडिया में सूत्रों के हवाले से ढाई ढाई साल के फार्मूले को भी तवज्जो मिल रही है और इसको लेकर कहा जा रहा है कि डीके शिवकुमार का कहना है कि अगर ढाई ढाई साल के फार्मूले पर मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो सबसे पहले उन्हें मौका मिलना चाहिए.

हालांकि इस तरह के कोई भी बयान डीके शिवकुमार या फिर कांग्रेस नेतृत्व की तरफ से नहीं दिए गए हैं. मीडिया में इन सारी बातों के कयास लगाए जा रहे हैं.

कांग्रेस में हमेशा देखा गया है कि सभी से राय लेकर मुख्यमंत्री पद का फैसला होता है और कर्नाटक को लेकर भी यही हो रहा है. अभी तक डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया की तरफ से किसी भी तरह का ऐसा बयान नहीं आया है, जिससे ऐसा समझा जाए कि किसी भी तरह की गुटबाजी कर्नाटक कांग्रेस के अंदर है.

कर्नाटक के एग्जिट पोल कितने भरोसेमंद? किसकी बन रही है सरकार?

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कर्नाटक में मतदान खत्म हो चुके हैं. मतदान के खत्म होते ही एग्जिट पोल भी आ चुके हैं. कर्नाटक के चुनाव प्रचार में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने ही कोई कसर नहीं छोड़ी. बीजेपी ने जहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे कर्नाटक का चुनाव जीतने की कोशिश की, वहीं कांग्रेस की तरफ से जनता को गारंटी दी गई.

लेकिन जिस तरह के एग्जिट पोल के नतीजे आए हैं उससे साफ नजर आ रहा है कि कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस की गारंटी पर भरोसा जताया है. राहुल गांधी ने जिस तरह से भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कर्नाटक में चुनाव प्रचार का आगाज किया था उसका परिणाम अब दिखाई दे रहा है.

224 सीटों वाले कर्नाटक में कांग्रेस को 122 से 140 सीटें मिलती हुई दिखाई दे रही हैं. वहीं बीजेपी को 62 से 80 और जेडीएस को 20 से 25 सीटें मिलती हुई दिखाई दे रही हैं तथा तीन सीटें अन्य के खाते में जाती ही नजर आ रही हैं.

मीडिया में जितने भी एग्जिट पोल दिखाए जा रहे हैं उसमें बीजेपी किसी में भी सरकार बनाती हुई नजर नहीं आ रही है, जबकि अधिकतर एग्जिट पोल में कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से कहीं अधिक सीटें पाती ही नजर आ रही है.

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सबसे बड़ी बात यह है कि आज तक न्यूज़ चैनल पर सुधीर चौधरी भी राहुल गांधी की तारीफ करते नजर आ रहे हैं. वह बता रहे हैं कि राहुल गांधी ने इस बार काफी अलग तरह से चुनाव प्रचार किया है, जिसका फायदा कांग्रेस को मिलता हुआ दिखाई दे रहा है.

आपको बता दें कि चुनाव प्रचार जब से कर्नाटक में शुरू हुआ था उसी वक्त से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि बीजेपी कर्नाटक में पूरी तरीके से फेल साबित हुई है और एंटी इनकंबेंसी का सामना उसे करना पड़ सकता है और एग्जिट पोल में भी ऐसा ही कुछ नजर आ रहा है.

आपको बता दें कि कर्नाटक में 224 विधानसभा क्षेत्रों के लिए 2,615 उम्मीदवार मैदान में हैं. वोट डालने के लिए 58,545 मतदान केंद्र बनाए गए. कुल 42, 48,028 नए मतदाताओं को चुनाव में वोट देने के लिए अधिकृत किया गया है. राज्य में करीब 5.3 करोड़ मतदाता हैं.

क्या है एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के इस्तीफे के मायने?

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एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार ने पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने का फैसला ले लिया है. उन्होंने अपने इस्तीफे में कई भावनात्मक बातें कहीं हैं. पवार ने कुछ दिनों पहले इसको लेकर इशारा भी किया था.

उनके ऐलान के बाद पार्टी ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया है. सभी नेता शरद पवार को मनाने में जुट गए हैं. सवाल यह है कि आखिर शरद पवार ने क्यों इस्तीफे का एलान किया? अब एनसीपी का नया अध्यक्ष कौन होगा? अजित पवार ओं सुप्रिया सुले में कौन मारेगा बाजी?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र की सियासत में यह बड़ी राजनीतिक घटना है. शरद पवार का नाम महाराष्ट्र में काफी बड़ा है. इसके अलावा वह देश के भी बड़े नेता हैं. ऐसे में उनके एनसीपी अध्यक्ष पद छोड़ने का ऐलान करना बड़ा सियासी संदेश भी है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के अंदर उठ रहे विरोध और बार-बार भतीजे अजीत पवार की बगावती बयान बाजी के बीच शरद पवार अपनी ताकत परखना चाहते हैं. वह यह देखना चाहते हैं कि आखिर जिस पार्टी को उन्होंने खड़ा किया, आज उसमें उनके साथ कितने लोग खड़े हैं. इसका असर भी देखने को मिलने लगा है. बड़ी संख्या में एनसीपी के नेता उन्हें मनाने में जुट गए हैं.

एनसीपी पर प्रभुत्व को लेकर पवार के घर में ही लड़ाई चल रही है. एक तरफ शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले हैं तो दूसरी तरफ उनके भतीजे अजीत पवार. ऐसे में पार्टी में पावर को लेकर परिवार में घमासान है. संभव है कि शरद पवार अपने इस फैसले के जरिए परिवार के विवाद को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं.

कौन जीत रहा है कर्नाटक का राजनीतिक रण?

Amit Shah Rahul Gandhi

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में अब 2 हफ्ते से भी कम का वक्त बचा हुआ है. इस चुनाव के दो प्रमुख दावेदार भाजपा और कांग्रेस हैं. इन दोनों के सामने इस वक्त चुनौतियां बिल्कुल अलग हैं. दोनों पार्टियों में से किसी की कोई गलती उनके लिए सांप सीढ़ी का खेल बन सकती है. लेकिन जितने भी राजनीतिक सर्वे आ रहे हैं उसमें भाजपा इस लड़ाई में काफी पीछे दिखाई दे रही है और कर्नाटक का रण कांग्रेस आसानी से जीती हुई नजर आ रही है.

लेकिन इन सबके बीच यदि भाजपा या उसके विधायक anti-incumbency का सामना कर रहे हैं तो कांग्रेस ऐसी जमीन पर चल रही है जो पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है. क्योंकि भाजपा से कांग्रेस में आए हुए कई नेता टिकट की जुगाड़ में है और अगर कांग्रेस यह चुनाव आसानी से जीत भी जाती है तो क्या वह अपने विधायकों को अपने पाले में बनाए रख पाएगी, इस की चुनौती भी कांग्रेस के सामने होगी.

कर्नाटक का विधानसभा चुनाव सांप्रदायिक रंग भी ले रहा है. अमित शाह ने एक जनसभा में यह भी कहा कि अगर कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार चुनी जाती है तो राज्य में सांप्रदायिक दंगे होंगे. हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कर्नाटक में सांप्रदायिक मुद्दे अपने चरम पर पहुंच गए हैं.

10 मई को होने वाले मतदान यह तय करेगा कि अगले 5 साल तक कर्नाटक में कौन सरकार चलाएगा. लेकिन जहां बीजेपी के नेता अपनी रैलियों में सांप्रदायिक मुद्दों को हवा दे रहे हैं, वहीं कांग्रेस जनता के मुद्दों पर चुनाव लड़ती हुई नजर आ रही है. राहुल गांधी ने कई चुनावी वादे कर्नाटक की जनता से किए हैं. अगर वह काम कर जाते हैं तो राजनीतिक सर्वे के मुताबिक आने वाले दिनों में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बन सकती है.

यह भी पढ़े- कर्नाटक को लेकर अमित शाह द्वारा कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों में कितना दम?

कर्नाटक को लेकर अमित शाह द्वारा कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों में कितना दम?

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कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, बीजेपी में भगदड़ मची हुई है. बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री तक कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं. बीजेपी के कई नेताओं ने पिछले कुछ दिनों में पार्टी छोड़ी है. पिछले कुछ सालों में ऐसा पहली बार हुआ है कि बीजेपी में किसी राज्य में इस तरह की भगदड़ मची हो.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कर्नाटक में बीजेपी के हाथों से सत्ता जा सकती है और एक बार फिर से कांग्रेस कर्नाटक में सरकार बना सकती है. हालांकि चुनाव के बाद ही तस्वीर साफ होगी कि आखिर कर्नाटक में कौन किस पर भारी है.

इस बीच कर्नाटक में 40% कमीशन का मुद्दा काफी बड़ा होता जा रहा है. पिछले दिनों कांग्रेस ने इस पर बीजेपी सरकार पर काफी आरोप लगाए हैं और राहुल गांधी ने भी 40% कमीशन को लेकर बीजेपी पर हल्ला बोला है. इस 40% कमीशन को लेकर अब अमित शाह का बयान आया है.

देश के गृह मंत्री और बीजेपी नेता अमित शाह ने एक बयान दिया है. एक मीडिया चैनल से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा है कि बीजेपी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने वाले कर्नाटक बीजेपी के नेता जीत नहीं पाएंगे. उन्होंने कहा है कि कांग्रेस के करप्शन को छुपाने के लिए 40 फ़ीसदी कमीशन के आरोप लगाए गए हैं.

कर्नाटक विधानसभा चुनाव को लेकर अमित शाह ने कहा है कि हम कर्नाटक जीतने जा रहे हैं. पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएंगे. हालांकि इससे पहले बंगाल के विधानसभा चुनाव को लेकर और हरियाणा के विधानसभा चुनाव को लेकर भी अमित शाह ने ऐसा ही दावा किया था. लेकिन बंगाल और हरियाणा में बीजेपी को वह नतीजे नसीब नहीं हुए, जिसकी उसे उम्मीद थी.

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